गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २०२ कहते हैं, ऐसा करके प्रभुने उनके चित्त चुरा लिये और उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि न रही ॥ ६ ॥ [ ३० ] देखु री सखी ! पथिक नख-सीख नीके हैं। नीले पीले कमल-से कोमल कलेवरनि, तापस हू बेष किये काम कोटि फीके हैं ॥ १ ॥ सुकृत-सनेह-सील-सुषमा-सुख सकेलि, बिरचे बिरंचि किधौं अमिय, अमीके हैं। रूपकी-सी दामिनी सुभामिनी सोहति संग, उमहु रमातें आछे अंग अंग ती के हैं ॥ २ ॥ बन-पट कसे कटि, तून-तीर-धनु धरे, धीर, बीर, पालक कृपालु सबहीके हैं। पानही न, चरन-सरोजनि चलत मग, कानन पठाए पितु-मातु कैसे ही के हैं ॥ ३ ॥ आली अवलोकि लेहु, नयननिके फल येहु, लाभके सुलाभ, सुखजीवन-से जी के हैं। धन्य नर-नारि जे निहारि बिनु गाहक हू, अपने अपने मन मोल बिनु बीके हैं ॥ ४ ॥ बिबुध बरखि फूल हरषि हिये कहत, ग्राम-लोग मगन सनेह सीय-पी के हैं। जोगीजन-अगम दरस पायो पाँवरनि, प्रमुदित मन सुनि सुरप-सची के हैं ॥ ५ ॥ प्रीतिके सुबालक-से लालत सुजन मुनि, मग चारु चरित लषन-राम-सी के हैं। जोग न बिराग-जाग, तप न तीरथ-त्याग, एही अनुराग भाग खुले तुलसी के हैं ॥ ६ ॥