गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 207, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२०१ अयोध्याकाण्ड पाछें गौर किसोर मनोहर लोचन-बदन उदार । कटि तूनीर कसे, कर सर-धनु, चले हरन छिति-भार ॥ ३ ॥ जुगुल बीच सुकुमारि नारि इक राजति बिनहि सिंगार । इंद्रनील, हाटक, मुकुतामनि जनु पहिरे महि हार ॥ ४ ॥ अवलोकहु भरि नैन, बिकल जनि होहु, करहु सुबिचार । पुनि कहँ यह सोभा, कहँ लोचन, देह-गेह-संसार ? ॥ ५ ॥ सुनि प्रिय-बचन चितै हित कै रघुनाथ कृपा-सुखसार । तुलसिदास प्रभु हरे सबन्हिके मन, तन रही न सँभार ॥ ६ ॥ अरी सजनी ! ये कोई राजकुमार हैं। यह दोनों ही शील और रूपके भण्डार हैं तथा मार्गमें मृदुल चरणकमलोंसे पैदल ही चल रहे हैं ॥ १ ॥ आगे तौ कमलनयन और श्याम शरीरवाले कुँवर हैं, जिनकी शोभा अतुलित और अपार है। उनके एक-एक अङ्गपर मैं सैकड़ों-करोड़ कामदेव निछावर करती हूँ ॥ २ ॥ और पीछे गौरवर्ण मनोहर किशोरावस्थावाले लाल हैं। उनके नेत्र और मुख भी बड़े ही सुन्दर हैं। वे कमरमें तरकस और हाथोंमें धनुष-बाण लेकर मानों पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही जा रहे हैं ॥ ३ ॥ दोनोंके बीचमें एक सुकुमारी नारी बिना ही शृङ्गार किये विराज रही है। ये तीनों मिलकर ऐसे जान पड़ते हैं मानों पृथ्वी इन्द्रनील, सुवर्ण और मुक्ता मणिका हार पहने हुए हों ॥ ४ ॥ इन्हें तनिक नेत्र भरकर देख लो, व्याकुल मत होओ, तनिक विचार लो—'फिर कहां यह शोभा मिलेगी ?' कहाँ हमारे नेत्र होंगे और कहाँ इस संसारमें ये घर और शरीर रहेंगे ?' ॥ ५ ॥ ये प्रिय वचन सुनकर कृपा और सुखके सारस्वरूप भगवान् रामने उनकी ओर प्रीतिपूर्वक देखा । तुलसीदास