गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २०० मग-लोग देखत करत हाय हाय हैं। बन इनको तो बाम बिधि के बनाय हैं ॥ ५ ॥ धन्य ते, जे मीन-से अवधि अंबु-आय हैं। तुलसी प्रभुसों जिन्हहुँके भले भाय हैं ॥ ६ ॥ हाय ! ये पथिक अपने कमलसदृश चरणोंसे पैरों ही चल रहे हैं। मार्ग बड़ा ही कठोर है तथा उसमें कुश और कण्टकोंका समूह भरा हुआ है ॥ १ ॥ हे सखि ! फिर भी ये भूखे-प्यासे बड़े चावसे चले जा-रहे हैं। मालूम होता है, इनके पुण्यबलसे देवता और महादेवजी इनके सहायक हैं ॥२॥ ये मानो रूप, शोभा और प्रेमकी मनोहर मूर्तियाँ ही हैं अथवा मुनिवेष धारण किये ब्रह्म, माया और जीव ही विराजमान हैं ॥ ३ ॥ ये वीर, बलवान्, धैर्यवान् और धनुर्धरोंमें अग्रगण्य हैं अथवा चौदहों भुवनोंकी रक्षा करनेवाले महा- कीर्तिशाली हरि ही हैं ॥ ४ ॥ मार्गके लोग देखकर 'हाय ! हाय ! !' करते हैं और कहते हैं कि 'इन्हें जो वनवास हुआ है सो विधाता इनके लिये बहुत ही टेढ़ा जान पड़ता है' ॥ ५ ॥ जिन लोगोंकी आयु इनके लौटनेकी अवधिरूप जलमें मीनके समान हो रही है वे धन्य हैं। तुलसीदास कहते हैं, जिनका प्रभुमें सद्भाव है वे लोग भी धन्य हैं ॥ ६ ॥ राग आसावरी [ २९ ] सजनी ! हैं कोउ राजकुमार । पंथ चलत मृदु पद-कमलनि दोउ सील-रूप-आगार ॥ १ ॥ आगे राजिवनैन स्याम-तनु, सोभा अमित अपार । डारौं वारि अंग-अंगनपर कोटि-कोटि सत मार ॥ २ ॥