भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

१६६ अयोध्याकाण्ड सोभासिंधु-संभव-से नीके नीके नग हैं। मातु-पितु-भाग बस गए परि फँग हैं॥ २॥ पाइँ पनह्यो न, मृदु पंकज-से पग हैं। रूपकी मोहनी मेल्लि मोहे अग-जग हैं॥ ३॥ मुनि-बेष घरे, धनु-सायक सुलग हैं। तुलसी हिये लसत लोने लोने डग हैं॥ ४॥ 'अरी सखि ! देख, दो अति सुन्दर सांवले-गोरे पथिक जा रहे हैं। मार्गमें उनके साथ एक अति सुन्दरी और सलोनी स्त्री भी शोभायमान है ॥ १ ॥ ये शोभारूप समुद्रके सुन्दर रत्नके समान हैं; इस समय माता-पिताके दुर्भाग्यवश फन्देमें पड़ गये हैं ॥ २ ॥ इनके चरण कमलके समान कोमल हैं, परन्तु उनमें जूतियाँ भी नहीं हैं। इन्होंने अपने रूपकी मोहनी डालकर सारे स्थावर, जङ्गम प्राणियोंको मोहित कर लिया है ॥ ३ ॥ ये मुनिवेष धारण किये हैं और इनके पास धनुष-बाण भी हैं।' इनके सुन्दर-सुन्दर डग तुलसीदासके हृदय में विराजमान हैं ॥ ४ ॥ [ २८ ] पथिक पयादे जात पंकज-से पाय हैं। मारग कठिन, कुस-कंटक-निकाय हैं॥ १॥ सखी ! भूखे-प्यासे, पै चलत चित चाय हैं। इन्हके सुकृत सुर-संकर सहाय हैं॥ २॥ रूप-सोभा-प्रेमके-से कमनीय काय हैं। मुनिबेष किये किधों ब्रह्म-जीव-माय हैं॥ ३॥ बीर, बरियार, धीर, धनुधर-राय हैं। दसचारि-पुर-पाल आली उरगाँये हैं॥ ४॥