भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

सीता-राम-लखन निहारि ग्रामनारि कहें, हेरि, हेरि, हेरि ! हेली हियके हरन हैं ॥ ३ ॥ प्रानहूके प्रानसे, सुजीवनके जीवनसे, प्रेमहूके प्रेम, रंक कृपिनके धन हैं। तुलसीके लोचन-चकोरके चंद्रमासे, आछे मन-मोर चित-चातकके घन हैं ॥ ४ ॥ "अरी सखि ! वे माता-पिता कैसे हैं ? और कैसे वे प्रिय कुटुम्बी लोग हैं जिन्होंने संसारसमुद्रके सुन्दर रत्नरूप इन सलोने श्याम-गौर बालकोंको वनमें भेज दिया है ? ॥ १ ॥ इनके रूपका पारावार नहीं है; इन मुनिवेषधारी राजकुमारोंकी सुन्दरता देखकर तो कामदेव भी तुच्छ जान पड़ता है। इनके साथ सौन्दर्यकी मूर्ति-जैसी एक चन्द्रमुखी बाला है जिसके नखसे लेकर शिखापर्यन्त सभी अङ्ग शोभाके आश्रय हैं ॥२॥ इनके करकमलोंमें धनुष है और कमरमें तीरोंसे भरा तरकस है तथा इनके चरण शरत्कालीन कमलसे भी सुन्दर हैं।' इस प्रकार सीता, राम और लक्ष्मणको देखकर गाँवोंकी स्त्रियाँ कहती हैं—'अरी सहेली ! देख, देख, देख, तो बड़े ही चित्तको चुरानेवाले हैं ॥ ३ ॥ ये तो प्राणोंके भी प्राण-जैसे, जीवनके भी जीवन-जैसे, प्रेमके भी प्रेम- जैसे और रंक तथा कृपणोंके भी धन-जैसे हैं। ये तुलसीदासके नेत्र- रूप चकोरके लिये चन्द्रमाके समान तथा मनरूप मोर और चित्तरूप चातकके लिये सुन्दर मेघके समान हैं ॥ ४ ॥ राग भैरव [ २७ ] देखि ! द्वै पथिक गोरे-सांवरे सुभग हैं। सुतिय सलोनी संग सोहत सुंमग हैं ॥ १ ॥