भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

अरी सखि ! देख, ये पथिक तो नखसे सिखतक सुन्दर हैं। ये अपने नीले और पीले कमलोंमें समान कोमल शरीरोंसे तापस वेश बनाये रहनेपर भी करोड़ों कामदेवोंको फीकाकर रहे हैं ॥ १ ॥ कहीं विधाताने सुकृत, स्नेह, शील, सुषमा और सुख—इन सबको एकत्र करके तो इन्हें नहीं रचा है ? ये तो अमृतके भी अमृत हैं। इनके साथ रूपमें विद्युत्के समान एक स्त्री शोभायमान है, उसके प्रत्येक अङ्ग उमा और रमासे भी उत्कृष्ट हैं ॥ २ ॥ कमरमें ये वनवासियोके-से वस्त्र पहने तथा तरकस,'तीर और धनुष धारण किये हैं। ये बड़े ही धीर-वीर, कृपालु और सभीका पालन करने- वाले हैं। इनके चरणोंमें जूतियाँ भी नहीं हैं, ये मार्गमें अपने सुकुमार चरणकमलोंसे ही चल रहे हैं। अहो ! इनके माता-पिता न जाने कैसे कठिन हृदयके हैं, जिन्होंने इन्हें वनमें भेज दिया है ॥ ३ ॥ अरी आली ! अच्छी तरह देख लो, यही तो नेत्रोंका फल है। यह लाभका भी लाभ है और चित्तका सुखमय जीवन-सा है। वे नर-नारी धन्य हैं जो इन्हें देखकर बिना ग्राहक ही इनके हाथ अपने-आप बेमोल बिक गये हैं ॥ ४ ॥ देवतालोग फूल बरसाकर हृदयमें हर्षित हो कहते हैं, देखो, ये गाँवके लोग श्रीसीतापतिके स्नेहमें मग्न हो रहे हैं। जिसका मिलन योगियोंको भी कठिन है, इन बेचारे पामर प्राणियोंने उन्हीं प्रभुका दर्शन प्राप्त किया, प्रभुका वनगमन सुनकर इन्द्र और शचीका चित्त भी परम आनन्दित हो रहा है ॥ ५ ॥ मार्गमें राम, लक्ष्मण और सीताके जो पवित्र चरित्र होते हैं वे प्रीतिके बालकोंके समान हैं, जिन्हें सुजन मुनिजन (पिताके समान) लालन करते हैं। योग, वैराग्य, यज्ञ, तप, तीर्थ