भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 210

गीतावली २०४ और त्याग आदिका अभाव होनेपर भी इसी अनुरागके कारण तुलसी दासके भी भाग्य खुल गये हैं॥ ६॥ [ ३१ ] रीति चलिबेकी चाहि, प्रीति पहिचानिकै। आपनी आपनी कहैं, प्रेम-परबस अहैं, मंजु मृदु बचन सनेह-सुधा सानिकै ॥ १ ॥ साँवरे कुँवरके बराइकै चरनके चिह्न, बधू पग धरति कहा धौं जिय जानिकै। जुगल कमल-पद-अंक जोगवत जात, गोरे गात कुँवर महिमा महा मानिकै ॥ २ ॥ उनकी कहनि नीकी, रहनि लषन-सी की, तिनकी गहनि जे पथिक उर आनिकै। लोचन सजल, तन पुलक, मगन मन, होत भूरिभागी जस तुलसी बखानिकै ॥ ३ ॥ ग्रामके नर-नारी राम, लक्ष्मण और सीताजीके चलनेकी रीति देखकर और उनकी प्रीति पहचानकर, प्रेमके वशीभूति हो, स्नेह- सुधामें डुबोकर अपनी-अपनी बुद्धिसे ये मनोहर और मृदुल वचन कह रहे हैं ॥ १ ॥ 'देखो, यह बहू न जाने क्या समझकर साँवले कुँवरके चरण-चिह्नोंको बचाकर पाँव रखती है और गोरे शरीरवाले कुँवर मनमें अत्यन्त महिमा मानकर दोनोंहीके चरणकमलोंके चिन्होंको सँभालते हुए चलते हैं' ॥ २ ॥ उन ग्राम्यपुरुषोंका कथन अच्छा है, सीता और लक्ष्मणका रहन-सहन अच्छा है, तथा जो उन पथिकोंको हृदयमें धारण कर सजल नयन, पुलकित शरीर