गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २०५ और मनमें मग्न हो जाते हैं, उनका ग्रहण करना अच्छा है। तुलसीदास भी उनके सुयशका वर्णन् करके बड़भागी हो रहा है ॥ ३ ॥ राग केदारा [ ३२ ] जेहि जेहि मग सिय-राम-लखन गए, तहँ तहँ नर-नारि बिनु छर छरिगे । निरखि निकाई-अधिकाई बिथकित भए, बच बिय-नैन-सर सोभा-सुधा भरिगे ॥ १ ॥ जोते बिनु, बए बिनु, निफन निराए बिनु, सुकृत-सुखेत सुख-सालि फूलि फरिगे । मुनिहु मनोरथको अगम अलभ्य लाभ, सुगम सो राम लघु लोगनिको करिगे ॥ २ ॥ लालची, कौड़ीके कूर पारस परे हैं पाले, जानत न को हैं, कहां कीबो सो बिसरिगे । बुधि न बिचार, न बिगार न सुधार सुधि, देह-गेह-नेह-नाते मनसे निसरिगे ॥ ३ ॥ बरषि सुमन सुर हरषि हरषि कहैं, 'अनायास भवनिधि नीच नीके तरिगे' । सो सनेह समउ सुमिरि तुलसीहूके-से भली भाँति भले पैंत, भले पाँसे परिगे ॥ ४ ॥ राम, लक्ष्मण और सीता जिस-जिस मार्गसे होकर निकले वहाँ-वहाँके स्त्री-पुरुष बिना छरे ही छर गये [अर्थात् जिस प्रकार धान छरनेसे उसका तुष दूर हो जाता है और स्वच्छ चावल रह जाता है, उसी प्रकार मार्गस्थ स्त्री-पुरुष बिना अभ्यासके ही पाप-