भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 212

गीतावली २०६ पुण्यों से मुक्त होकर शुद्ध हो गये]। उनकी सुन्दरताकी अधिकता देखकर वाणी शिथिल हो गयी तथा शरीररूप भूमिके दोनों नयनरूप सरोवर शोभारूप अमृतसे पूर्ण हो गये ॥ १ ॥ सुकृतरूप खेतमें सुखरूप धान बिना जोते, बोये और अच्छी तरह निराये ही फूल- फल गये। जो लाभ मुनियोंके मनोरथकी पहुँचसे भी बाहर और अत्यन्त दुर्लभ था, उसे श्रीरघुनाथजी छोटे-छोटे लोगोंके लिये भी सुलभ कर गये ॥ २ ॥ जो बेचारे कौड़ियों (तुच्छ देवताओंके दर्शन) के लिये ललचा रहे थे, उनके पाले पारस (रामदर्शन) पड़ गया। वे यह भी नहीं जानते कि 'ये हैं कौन ? और इनके साथ क्या करना चाहिये' यह भी वे भूल गये। उन्हें न बुद्धि ही रही और न विचार ही; और न कुछ बिगाड़-सुधारकी ही सुधि रही। उनके मनसे देह, गेह और स्नेहके सभी नाते निकल गये ॥ ३ ॥ देवतालोग फूल बरसाकर प्रसन्न हो-होकर कहते हैं—'अहो, ये तुच्छ लोग भी बिना प्रयासके ही खूब संसार-सागरको पार कर गये।' उस स्नेह और आनन्दका स्मरणकर तुलसीदास-जैसोंके भी अच्छी तरह अच्छे पाँसे पड़ गये ॥ ४ ॥ [ ३३ ] बोले राज देनेको, रजायसु भो काननको, आनन प्रसन्न, मन मोद, बड़ो काज भो। मातु-पिता-बन्धु-हित आपनो परम हित, मोको बीसहूकैं ईस अनुकूल आजु भो ॥ १ ॥ असन अजीरनको समुझि तिलक तज्यो, बिहिन-वावनु भले सूखेको सुनाजु भो।