गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
गीतावली २०२ कहते हैं, ऐसा करके प्रभुने उनके चित्त चुरा लिये और उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि न रही ॥ ६ ॥ [ ३० ] देखु री सखी ! पथिक नख-सीख नीके हैं। नीले पीले कमल-से कोमल कलेवरनि, तापस हू बेष किये काम कोटि फीके हैं ॥ १ ॥ सुकृत-सनेह-सील-सुषमा-सुख सकेलि, बिरचे बिरंचि किधौं अमिय, अमीके हैं। रूपकी-सी दामिनी सुभामिनी सोहति संग, उमहु रमातें आछे अंग अंग ती के हैं ॥ २ ॥ बन-पट कसे कटि, तून-तीर-धनु धरे, धीर, बीर, पालक कृपालु सबहीके हैं। पानही न, चरन-सरोजनि चलत मग, कानन पठाए पितु-मातु कैसे ही के हैं ॥ ३ ॥ आली अवलोकि लेहु, नयननिके फल येहु, लाभके सुलाभ, सुखजीवन-से जी के हैं। धन्य नर-नारि जे निहारि बिनु गाहक हू, अपने अपने मन मोल बिनु बीके हैं ॥ ४ ॥ बिबुध बरखि फूल हरषि हिये कहत, ग्राम-लोग मगन सनेह सीय-पी के हैं। जोगीजन-अगम दरस पायो पाँवरनि, प्रमुदित मन सुनि सुरप-सची के हैं ॥ ५ ॥ प्रीतिके सुबालक-से लालत सुजन मुनि, मग चारु चरित लषन-राम-सी के हैं। जोग न बिराग-जाग, तप न तीरथ-त्याग, एही अनुराग भाग खुले तुलसी के हैं ॥ ६ ॥
अरी सखि ! देख, ये पथिक तो नखसे सिखतक सुन्दर हैं। ये अपने नीले और पीले कमलोंमें समान कोमल शरीरोंसे तापस वेश बनाये रहनेपर भी करोड़ों कामदेवोंको फीकाकर रहे हैं ॥ १ ॥ कहीं विधाताने सुकृत, स्नेह, शील, सुषमा और सुख—इन सबको एकत्र करके तो इन्हें नहीं रचा है ? ये तो अमृतके भी अमृत हैं। इनके साथ रूपमें विद्युत्के समान एक स्त्री शोभायमान है, उसके प्रत्येक अङ्ग उमा और रमासे भी उत्कृष्ट हैं ॥ २ ॥ कमरमें ये वनवासियोके-से वस्त्र पहने तथा तरकस,'तीर और धनुष धारण किये हैं। ये बड़े ही धीर-वीर, कृपालु और सभीका पालन करने- वाले हैं। इनके चरणोंमें जूतियाँ भी नहीं हैं, ये मार्गमें अपने सुकुमार चरणकमलोंसे ही चल रहे हैं। अहो ! इनके माता-पिता न जाने कैसे कठिन हृदयके हैं, जिन्होंने इन्हें वनमें भेज दिया है ॥ ३ ॥ अरी आली ! अच्छी तरह देख लो, यही तो नेत्रोंका फल है। यह लाभका भी लाभ है और चित्तका सुखमय जीवन-सा है। वे नर-नारी धन्य हैं जो इन्हें देखकर बिना ग्राहक ही इनके हाथ अपने-आप बेमोल बिक गये हैं ॥ ४ ॥ देवतालोग फूल बरसाकर हृदयमें हर्षित हो कहते हैं, देखो, ये गाँवके लोग श्रीसीतापतिके स्नेहमें मग्न हो रहे हैं। जिसका मिलन योगियोंको भी कठिन है, इन बेचारे पामर प्राणियोंने उन्हीं प्रभुका दर्शन प्राप्त किया, प्रभुका वनगमन सुनकर इन्द्र और शचीका चित्त भी परम आनन्दित हो रहा है ॥ ५ ॥ मार्गमें राम, लक्ष्मण और सीताके जो पवित्र चरित्र होते हैं वे प्रीतिके बालकोंके समान हैं, जिन्हें सुजन मुनिजन (पिताके समान) लालन करते हैं। योग, वैराग्य, यज्ञ, तप, तीर्थ
गीतावली २०४ और त्याग आदिका अभाव होनेपर भी इसी अनुरागके कारण तुलसी दासके भी भाग्य खुल गये हैं॥ ६॥ [ ३१ ] रीति चलिबेकी चाहि, प्रीति पहिचानिकै। आपनी आपनी कहैं, प्रेम-परबस अहैं, मंजु मृदु बचन सनेह-सुधा सानिकै ॥ १ ॥ साँवरे कुँवरके बराइकै चरनके चिह्न, बधू पग धरति कहा धौं जिय जानिकै। जुगल कमल-पद-अंक जोगवत जात, गोरे गात कुँवर महिमा महा मानिकै ॥ २ ॥ उनकी कहनि नीकी, रहनि लषन-सी की, तिनकी गहनि जे पथिक उर आनिकै। लोचन सजल, तन पुलक, मगन मन, होत भूरिभागी जस तुलसी बखानिकै ॥ ३ ॥ ग्रामके नर-नारी राम, लक्ष्मण और सीताजीके चलनेकी रीति देखकर और उनकी प्रीति पहचानकर, प्रेमके वशीभूति हो, स्नेह- सुधामें डुबोकर अपनी-अपनी बुद्धिसे ये मनोहर और मृदुल वचन कह रहे हैं ॥ १ ॥ 'देखो, यह बहू न जाने क्या समझकर साँवले कुँवरके चरण-चिह्नोंको बचाकर पाँव रखती है और गोरे शरीरवाले कुँवर मनमें अत्यन्त महिमा मानकर दोनोंहीके चरणकमलोंके चिन्होंको सँभालते हुए चलते हैं' ॥ २ ॥ उन ग्राम्यपुरुषोंका कथन अच्छा है, सीता और लक्ष्मणका रहन-सहन अच्छा है, तथा जो उन पथिकोंको हृदयमें धारण कर सजल नयन, पुलकित शरीर
अयोध्याकाण्ड २०५ और मनमें मग्न हो जाते हैं, उनका ग्रहण करना अच्छा है। तुलसीदास भी उनके सुयशका वर्णन् करके बड़भागी हो रहा है ॥ ३ ॥ राग केदारा [ ३२ ] जेहि जेहि मग सिय-राम-लखन गए, तहँ तहँ नर-नारि बिनु छर छरिगे । निरखि निकाई-अधिकाई बिथकित भए, बच बिय-नैन-सर सोभा-सुधा भरिगे ॥ १ ॥ जोते बिनु, बए बिनु, निफन निराए बिनु, सुकृत-सुखेत सुख-सालि फूलि फरिगे । मुनिहु मनोरथको अगम अलभ्य लाभ, सुगम सो राम लघु लोगनिको करिगे ॥ २ ॥ लालची, कौड़ीके कूर पारस परे हैं पाले, जानत न को हैं, कहां कीबो सो बिसरिगे । बुधि न बिचार, न बिगार न सुधार सुधि, देह-गेह-नेह-नाते मनसे निसरिगे ॥ ३ ॥ बरषि सुमन सुर हरषि हरषि कहैं, 'अनायास भवनिधि नीच नीके तरिगे' । सो सनेह समउ सुमिरि तुलसीहूके-से भली भाँति भले पैंत, भले पाँसे परिगे ॥ ४ ॥ राम, लक्ष्मण और सीता जिस-जिस मार्गसे होकर निकले वहाँ-वहाँके स्त्री-पुरुष बिना छरे ही छर गये [अर्थात् जिस प्रकार धान छरनेसे उसका तुष दूर हो जाता है और स्वच्छ चावल रह जाता है, उसी प्रकार मार्गस्थ स्त्री-पुरुष बिना अभ्यासके ही पाप-
गीतावली २०६ पुण्यों से मुक्त होकर शुद्ध हो गये]। उनकी सुन्दरताकी अधिकता देखकर वाणी शिथिल हो गयी तथा शरीररूप भूमिके दोनों नयनरूप सरोवर शोभारूप अमृतसे पूर्ण हो गये ॥ १ ॥ सुकृतरूप खेतमें सुखरूप धान बिना जोते, बोये और अच्छी तरह निराये ही फूल- फल गये। जो लाभ मुनियोंके मनोरथकी पहुँचसे भी बाहर और अत्यन्त दुर्लभ था, उसे श्रीरघुनाथजी छोटे-छोटे लोगोंके लिये भी सुलभ कर गये ॥ २ ॥ जो बेचारे कौड़ियों (तुच्छ देवताओंके दर्शन) के लिये ललचा रहे थे, उनके पाले पारस (रामदर्शन) पड़ गया। वे यह भी नहीं जानते कि 'ये हैं कौन ? और इनके साथ क्या करना चाहिये' यह भी वे भूल गये। उन्हें न बुद्धि ही रही और न विचार ही; और न कुछ बिगाड़-सुधारकी ही सुधि रही। उनके मनसे देह, गेह और स्नेहके सभी नाते निकल गये ॥ ३ ॥ देवतालोग फूल बरसाकर प्रसन्न हो-होकर कहते हैं—'अहो, ये तुच्छ लोग भी बिना प्रयासके ही खूब संसार-सागरको पार कर गये।' उस स्नेह और आनन्दका स्मरणकर तुलसीदास-जैसोंके भी अच्छी तरह अच्छे पाँसे पड़ गये ॥ ४ ॥ [ ३३ ] बोले राज देनेको, रजायसु भो काननको, आनन प्रसन्न, मन मोद, बड़ो काज भो। मातु-पिता-बन्धु-हित आपनो परम हित, मोको बीसहूकैं ईस अनुकूल आजु भो ॥ १ ॥ असन अजीरनको समुझि तिलक तज्यो, बिहिन-वावनु भले सूखेको सुनाजु भो।
धरम-धुरोन धीर बीर रघुबीरजूको, कोटि राज सहित भरतजूको राजु भो ॥ २ ॥ ऐसी बातें कहत सुनत मग-लोगनकी, चले जात बंधु दोउ मुनिको सो साज भो । ध्याइबेको, गाइबेको, सेइबे सुमिरिबेको, तुलसीको सब भाँति सुखद समाज भो ॥ ३ ॥ [मार्गस्थ स्त्री-पुरुष कहते हैं—] राजाने राज्य देनेके लिये कहा था, इतनेहीमें वन जानेकी आज्ञा हो गयी । किन्तु इसपर रघुनाथजीका तो मुख खिल उठा और मन प्रसन्न हो गया । ये सोचने लगे—'यह बड़ा भारी काम बना, इसमें माता-पिता और भाईका भी हित है और मेरा भी परम कल्याण है, आज विधाता मुझपर बीसों बिस्वे प्रसन्न हुआ है, ॥ १ ॥ फिर इन्होंने राजतिलकको अजीर्णपरका भोजन (अनिष्टकारी) समझकर त्याग दिया तथा वनगमनको भूखेके लिये नाजके समान हितकारी समझकर स्वीकार कर लिया। इस प्रकार परम धीर-वीर, धर्मधुरीण रघुनाथजीके लिये भरतजीका राजतिलक करोड़ों राज्याभिषेकोंके समान हुआ ॥ २ ॥ मार्गस्थ पुरुषोंके द्वारा कही हुई ऐसी बातें सुनते हुए मुनियोंका सा साज सजाये दोनों भाई चले जा रहे हैं । तुलसीदासको तो ध्यान करने, गाने, सेवन करने और स्मरण करनेके लिये यह समाज सभी प्रकार सुखदायक हुआ ॥ ३ ॥ [ ३४ ] सिरिस-सुमन-सुकुमारि, सुखमाकी सींव, सीय राम बड़े ही सकोच संग लई है।
गीतावली २०८ भाईके प्रान समान, प्रियाके प्रानके प्रान, जानि बानि प्रीति रीति कृपासील मई है ॥ १ ॥ आलबाल-अवध सुकामतरु कामबेलि, दूरि करि अकई विपत्ति-बेलि बई है । आप, पति, पूत, गुरुजन, प्रिय परिजन, प्रजाहूको कुटिक दुसह दशा दई है ॥ २ ॥ पंकजसे पगनि पानह्रौं न, परुष पंथ, कैसे निबहे हैं, निबहेंगे, गति नई है ? । एही सोच-संकट-मगन मग-नर-नारि, सबकी सुमति राम-राग-रँग रई है ॥ ३ ॥ एक कहै, बाम बिधि दाहिनो हमको भयो, उत कीन्हीं पीठि, इतको सुडीठि भई है । तुलसी सहित बनबासी मुनि हमरिऔ, अनायास अधिक अघाइ बनि गई है ॥ ४ ॥ जो भाई लक्ष्मणके प्राणोंके समान और प्रियतमा सीताके प्राणोंके भी प्राण हैं उनकृपाशीलमय रघुनाथजीनेस्वभाव तथा प्रीतिकी रीति जानकर ही बड़े संकोचसे सिरससुमनके समान सुकुमारी तथा सौन्दर्यकी सीमा श्रीसीताजीको अपने साथ लिया है ॥ १ ॥ कैकेयीने अयोध्यारूप आलबालसे [राम और सीतारूप] कल्पवृक्ष एवं कल्पलताको निकालकर उसमें विपत्तिकी बेल बो दी है । इस प्रकार उसने अपने लिये तथा पति, पुत्र, गुरुजन, प्रिय-कुटुम्बियों एवं प्रजा- वर्गके लिये भी अत्यन्त कुटिल और दुःसह दशा उपस्थित कर दी है ॥ २ ॥ मार्ग बड़ा कठिन है और पैरोंमें जूते भी नहीं हैं; अतः अपने कमल-जैसे कोमल चरणोंसे उन्होंने कैसे तो अबतक निर्वाह
२०६ अयोध्याकाण्ड किया है और कैसे आगे करेंगे; यह तो एक नयी लीला देखनेमें आ रही है। मार्गके सारे नर-नारी इसी सोच और संकटमें पड़े हुए हैं, उन सभीकी बुद्धि भगवान् रामके अनुराग-रूप रंगमें रँग गयी है ॥ ३ ॥ कोई कहते हैं—'यह वाम विधाता हमारे लिये तो अनुकूल ही है, इसने उधरहै पीठ कर ली (विमुख) है तो हमारी ओर तो इसकी सुदृष्टि ही जान पड़ती (अनुकूल) है।' अतः तुलसीदासजी कहते हैं, बनवासी मुनियोंके सहित हमारी बात तो अनायास ही खूब अच्छी तरह बन गयी है ॥ ४ ॥ राग गौरी [ ३५ ] नीके कै मैं न बिलोकन पाए। सखि ! यहि मग जुग पथिक मनोहर, बधु बिधु-बदनि समेत सिधाए ॥ १ ॥ नयन सरोज, किसोर बयस बर, सीस जटा रचि मुकुट बनाए। कटि मुनिबसन-तून, धनु-सर कर, स्यामल-गौर, सुभाय सोहाए ॥ २ ॥ सुंदर बदन, बिसाल बाहु-उर, तनु-छबि कोटि मनोज लजाए। चितवत मोहि लगी चौंधी-सी, जानौं न, कौन, कहाँ तें धौं आए ॥ ३ ॥ मनु गयो संग, सोचबस लोचन मोचत बारि, कितौ समुझाए। तुलसिदास लालसा दरसकी सोइ पुरवै, जेहि आनि देखाए ॥ ४ ॥ 'अरी सखि ! इस मार्गसे जो दो मनोहर पथिक एक चन्द्रमुखी स्त्रीके सहित गये हैं, उन्हें मैं तो अच्छी तरह देख भी न सकी ॥ १ ॥ उनके नेत्र कमलके समान थे, सुन्दर किशोर अवस्था थी, सिरपर जटाओंसे रचकर मुकुट बनाये हुए थे, कमरमें मुनियोंके-से वस्त्र और गी० १४—
तरकस तथा हाथोंमें धनुष-बाण धारण किये थे । वे श्याम-गौरवर्ण और स्वभावसे ही शोभायमान थे ॥ २ ॥ उनका मनोहर मुखमण्डल था, विशाल वक्षःस्थल और भुजाएँ थीं तथा अपने शरीरकी कान्तिसे वे करोड़ों कामदेवोंको लज्जित करते थे । उन्हें देखकर मुझे तो चौंधी- सी लग गयी; मैं तो यह भी नहीं जान सकी कि वे कौन थे और कहांसे आये थे ? ॥ ३ ॥ मेरा मन तो उन्हींके साथ चला गया, नेत्र भी सोचवश जल बरसा रहे हैं । मैंने चित्तको बहुत कुछ समझाया है तो भी उनके दर्शनकी लालसा लगी हुई है, अब इसे वही पूर्ण करेगा जिसने उन्हें एक बार यहाँ लाकर दिखा दिया था' ॥ ४ ॥ [ ३६ ] पुनि न फिरे दोउ बीर बटाऊ । स्यामल-गौर, सहजसुंदर, सखि ! बारक बहुरि बिलोकिबे काऊ ॥ १ ॥ कर-कमलनि सर, सुभग सरासन, कटि मुनिबसन-निषंग सोहाए । भुज प्रलंब, सब अंग मनोहर, धन्य सो जनक-जननि जेहि जाए ॥ २ ॥ सरद-बिमल बिधु-बदन, जटा सिर, मंजुल अरुन सरोरुह-लोचन । तुलसिदास मनमय मारगमें राजत कोटि-मदन-मदमोचन ॥ ३ ॥ 'अरी सखि ! वे वीर बटोही इस मार्गसे फिर नहीं लौटे ? वे श्याम-गौर कुँवर स्वभावसे ही सुन्दर थे । क्या हम उन्हें एक बार फिर देख सकेंगी ? ॥ १ ॥ उनके कर-कमलोंमें बाण और सुन्दर धनुष थे तथा कमरमें मुनियोंके-से वस्त्र और तरकस शोभायमान थे । उनकी भुजाएँ लम्बी-लम्बी और सभी अङ्ग अत्यन्त मनोहर थे । वे माता-पिता, जिन्होने उन्हें जन्म दिया है, धन्य हैं' ॥ २ ॥
२११ अयोध्याकाण्ड तुलसीदासजी कहते हैं, जिनका शरच्चन्द्रके समान सुन्दर मुखमण्डल है, सिरपर जटाएँ हैं तथा अरुण कमलके समान अति सुन्दर नेत्र हैं, वे करोड़ों कामदेवोंके मदका मथन करनेवाले प्रभु हमारे मनोमय मार्गमें विराजमान हैं ॥ ३ ॥ राग केदारा [ ३७ ] आली ! काहू तौ बूझौ न पथिक कहाँ धौं सिधैहैं । कहाँतें आए हैं, को हैं, कहा नाम स्याम-गोरे, काज कें कुसल फिरि एहि मग ऐहैं ? ॥ १ ॥ उठति बयस, मसि भींजति, सलोने सुठि, सोभा-देखवैया बिनु बित्त ही बिकैहैं । हिये हेरि हेरि लेत लोनी ललना समेत, लोयननि लाहु देत जहाँ जहाँ जैहैं ॥ २ ॥ राम-लषन-सिय-पंथिकी कथा पृथुल, प्रेम बिथकीं कहति सुमुखि सबै हैं । तुलसी तिन्ह सरिस तेऊ भूरिभाग जेऊ, सुनि कै सुचित तेहि समैं समैहैं ॥ ३ ॥ 'अरी आली ! किसीसे पूछो तो 'ये पथिक कहाँ जायेंगे ? कहाँसे आये हैं ? कौन हैं ? इन श्याम-गौर कुमारोंके नाम क्या हैं ? और अपना कार्य समाप्त करनेपर फिर कुशलपूर्वक इसी मार्गसे लौटेंगे या नहीं ? ॥ १ ॥ इनकी उठती हुई अवस्था है, शरीरपर यौवनका रंग चढ़ रहा है, देखनेमें बड़े ही सुहावने और सरल जान पड़ते हैं, इनकी शोभा देखनेवाले बिना मोल ही बिके जा रहे
हैं। इनके साथकी जो सुघड़ ललना है वह तो देखकर ही लोगोंके चित्तको चुरा लेती है। ये जहाँ-जहाँ जायँगे, वहाँ-वहाँके लोगोंको इसी प्रकार नेत्रोंका लाभ देंगे' ॥ २ ॥ इस प्रकार सभी सुन्दरियाँ प्रेममें विह्वल होकर बटोही राम, लक्ष्मण और सीताकी भारी कथा कह रही हैं। तुलसीदास कहते हैं, जो लोग उन कथाओंको समाहित चित्तसे सुनकर उन्हींमें मन लगाये रहते हैं, वे भी उन ग्रामनारियोंके समान ही सौभाग्यवान् हैं ॥ ३ ॥ [ ३८ ] बहुत दिन बीते सुधि कछु न लही। गये जो पथिक गोरे-साँवरे सलोने, सखि ! संग नारि सुकुमारि रही ॥ १ ॥ जानि-पहिचान बिनु अपुनें, आपुनेहुतें, प्रानहुतें प्यारे प्रियतम उपही। सुधाके सनेहूके सार लै सँवारे बिधि, जैसे भावते हैं भाँति जाति न कही ॥ २ ॥ बहुरि बिलोकिबे कबहुक, कहंत, तनु पुलक, नयन जलधार बही। तुलसी प्रभु सुमिरि ग्रामजुवती सिथिल, बिनु प्रयास परीं प्रेम सही ॥ ३ ॥ 'अरी सखि ! बहुत दिन बीत गये, परंतु अभीतक जो साँवले- गोरे सुन्दर पथिक गये थे और जिनके साथ एक सुकुमारी स्त्री भी थी, उनकी कुछ भी सुधि नहीं मिली ॥ १ ॥ वे परदेशी—जान पहचान न होनेपर भी—अपनेसे, अपने प्रियजनोंसे तथा अपने
२१३ अयोध्याकाण्ड प्राणोंसे भी अधिक प्रिय जान पड़ते थे। उन्हें विधाताने अमृत और स्नेहका भी सार लेकर रचा है। वे जैसे प्रिय लगते हैं वह हमसे कहा नही जाता ॥ २ ॥ क्या उन पथिकोंको हम फिर भी देख सकेंगी,—ऐसा कहते ही उनके शरीर पुलकित हो जाते हैं और नेत्रोंसे जलकी धाराएँ बहने लगती हैं।' तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुका स्मरणकर ग्रामीण स्त्रियाँ शिथिल हो गयी हैं और बिना परिश्रम ही प्रेममें सच्ची सिद्ध हो गयी हैं ॥ ३ ॥ [ ३९ ] आली री ! पथिक जे एहि पथ परौं सिधाएं। ते तौ राम-लखन अवधतें आए ॥ १ ॥ संग सिय सब अंग सहज सोहाए। रति-काम-ऋपति कोटिक लजाए ॥ २ ॥ राजा दसरथ, रानी कौसिला जाए। कैकेयी कुचाल करि कानन पठाए ॥ ३ ॥ बचन कुभामिनीके भूपहि क्यों भाए ? हाय ! हाय ! राय बाम बिधि भरमाए । ४ ॥ कुलगुर सचिव काहू न समुझाए। कांच-मनि लै अमोल मानिक गवाँए ॥ ५ ॥ भाग मग-लोगनिके, देखन् जे पाए। तुलसी सहित जिन गुन-गन गाए ॥ ६ ॥ अरी आली ! परसों जो पथिक इस मार्गसे गये थे, उनका नाम राम-लक्ष्मण था और वे अयोध्यापुरीसे आये थे ॥ १ ॥ उनके साथ सीताजी थीं। वे स्वभावसे ही सब अङ्गोंसे शोभायमान थे। उन्हें देखकर करोड़ों रति, कामदेव और ऋतुराज (बसन्त)
गीतावली २१४ लज्जित होते थे ॥ २ ॥ उन्हें राजा दशरथ और रानी कौसल्या जन्म दिया है। कैकेयीने कुचाल करके उन्हें वनमें भेज दिया ॥ ३ ॥ भला, उस दुष्टा स्त्रीके वचन राजाको क्यों अच्छे लगे ? हाय ! हाय ! ! राजाको वाम विधाताने भ्रममें डाल दिया ! ॥ ४ ॥ उन्हें कुलगुरु या मन्त्रियोंमेंसे भी किसीने नहीं समझाया; उन्होंने कांचका मनका लेकर अमूल्य मणिको खो दिया ! ॥ ५ ॥ मार्गके लोगोंके बड़े ही भाग्य हैं जिन्होंने उन्हें देखा और तुलसीदासके सहित वे भी बड़े भाग्यवान् हैं, जिन्होंने इनके गुण गाये हैं ॥ ६ ॥ [ ४० ] सखि ! जब तें सीता-समेत देखे दोउ भाई । तबतें परै न कल, कछू न सोहाई ॥ १ ॥ नखसिख नीके, नीके निरखि निकाई । तन-सुधि गई, मन अनत न जाई ॥ २ ॥ हेरनि-हँसनि हिय लिये हैं चोराई । पावन-प्रेम-बिबस भईं हौं हराई ॥ ३ ॥ कैसे पितु-मातु, प्रिय परिजन-भाई । जीवत जीवके जीवन बनहि पठाई ॥ ४ ॥ समउ सो चित करि हित अधिकाई । प्रीति ग्रामबधुनकी तुलसिहु गाई ॥ ५ ॥ अरी सखि ! जबसे सीताजीके सहित दोनों भाइयोंको देखा है तबसे हमें चैन नहीं पड़ता और न कुछ सुहाता ही है ॥ १ ॥ वे नखसे शिखातक सुन्दर थे, उनकी सुन्दरताको अच्छी तरह देखकर
२१५ अयोध्याकाण्ड शरीरकी सुधि जाती रही है और अब मन किसी दूसरी जगह नहीं जाता ॥ २ ॥ उनकी चितवन और हँसीने मेरे चित्तको चुरा लिया है। उनके पवित्र प्रेमवश मैं बिरानी (दूसरेकी) हो रही हूं [अब अपनेपर मेरा अधिकार नहीं है]॥ ३ ॥ वे माता, पिता, प्रिय परिजन और भाई न जाने कैसे हैं ? जिन्होंने स्वयं जीवित रहते जीवोंके जीवन इन रघुनाथजीको वनमें भेज दिया है॥ ४॥ उस समय- को चित्तमें लानेसे प्रेम बढ़ता है। अतः तुलसीदासने भी ग्राम- वधुओंकी उस प्रीतिको गाया है॥ ५॥ राग केदारा [ ४१ ] जबतें सिधारे यहि मारग लषन-राम, जानकी सहित, तबतें न सुधि लही है। अवध गए धौं फिरि, कैंधौं चढ़े बिंध्य गिरि, कैंधौं कहुँ रहे, सो कछू, न काहू कही है ॥ १ ॥ एक कहै, चित्रकूट निकट नदीके तीर, परनकुटीर करि बसे, बात सही है। सुनियत, भरत मनाइबेको आवत हैं, होइगी पै सोई, जो बिधाता चित्त चही है ॥ २ ॥ सत्यसंध, धरम-धुरौन रघुनाथजूको, आपनी 'निबाहिबे, नृपकी निरबही है। दस-चारि बरिस बिहार बन पदचार, करिबे पुनीत सैल, सर-सरि, मही है ॥ ३ ॥ मुनि-सुर-सुजन-समाजके सुधारि काज, बिगरि बिगरि जहाँ-जहाँ जाकी रही है ।
गीतावली २१६ पुर पाँव धारिहैं, उधारिहैं तुलसीहू से जन, जिन जानि कै गरीबी गाढ़ी गही है ॥ ४ ॥ जबसे राम और लक्ष्मण जानकीजीके सहित इस मार्गसे गये हैं तबसे उनकी कोई भी सुध नहीं मिली। वे अयोध्यापुरीको लौट गये या विन्ध्याचल पर्वतपर चढ़े अथवा और कहीं रहे—यह किसीने कुछ भी नहीं बतलाया ॥ १ ॥ कोई कहते हैं कि वे चित्रकूटके समीप मन्दाकिनी नदीके तटपर पर्णकुटी बनाकर रहने लगे हैं— यह बात बिलकुल ठीक है। सुना जाता है कि भरतजी उन्हें मनाने- के लिये आ रहे हैं परंतु बात तो वही होगी जिसे विधाताने चित्त- में करना चाहा होगा ॥ २ ॥ महाराज दशरथकी बात तो निभ गयी, अब तो धर्मधुरन्धर सत्यसन्ध रघुनाथजीको अपनी प्रतिज्ञा निभानी होगी। अतः वे चौदह वर्ष तक वनोंमें पैदल फिरकर विहार करते हुए पर्वत, सरोवर, नदी और भूमिको पवित्र करेंगे ॥ ३ ॥ जहाँ- जहाँ जिन-जिनकी अवस्था बिगड़ी हुई है, उन ऋषि-मुनि, देवता और साधुजनोंके सारे कार्य सुधारकर वे अपनी राजधानीमें पधारेंगे और तुलसीदास-जैसे सेवकोंका भी उद्धार करेंगे, जिन्होंने जान- बूझकर दीनताको दृढ़तासे पकड़ रखा है ॥ ४ ॥ राग सारंग [ ४२ ] ये उपहीं कोउ कुंवर अहेरी । स्याम गौर, धनु-बान-तूनधर चित्रकूट अब आइ रहे, री ॥ १ ॥ इन्हहि बहुत आदरत महामुनि, समाचार मेरे नाह कहे, री । बनिता-बंधु समेत बसे बन, पितु हित कठिन कलेस सहे, री ॥ २ ॥
२१७ अयोध्याकाण्ड बचन परसपर कहति किरातिनि, पुलकगात, जल नयन बहे, री। तुलसी प्रभुहि बिलोकति एकटक, लोचन जनु बिनु पलक लहे, री ॥ ३ ॥ 'अगी सखि ! ये परदेशी कोई मृगयाशील राजकुमार हैं। ये धनुष-बाण और तरकसधारी श्याम-गौर बालक इस समय चित्रकूट पर्वतपर आकर रहने लगे हैं ॥ १ ॥ मेरे पतिदेवने यह समाचार सुनाया है कि बड़े-बड़े मुनीश्वर लोग इनका बहुत सम्मान करते हैं। इस समय ये स्त्री और भाईके सहित वनमें आ बसे हैं, इन्होंने अपने पिताके लिये बड़े-बड़े कष्ट सहे हैं ॥ २ ॥' इस प्रकार किरातिनियाँ आपसमें बातचीत कर रही हैं, उनके अङ्ग पुलकित हो रहे हैं और नेत्रोंसे जलकी धाराएँ बह रही हैं। तुलसीदास कहते हैं, प्रभुको देखकर उनके नेत्र तो मानो बिना पलकके ही हो गये हैं ॥ ३ ॥ चित्रकूट-वर्णन राग चंचरी [ ४३ ] 'चित्रकूट अति बिचित्र, सुंदर बन, महि पवित्र, पावनि पय-सरित सकल मल-निकंदिनी । सानुज जहँ बसत राम, लोक-लोचनाभिराम, बाम अंग बामाबर बिस्व-बंदिनी ॥ १ ॥ रिषिवर तहँ छंद बास, गावत कलकंठ हास, कीर्तन उनमाय काय क्रोध-कंदिनी । बर बिधान करत गान बारत धन-मान-प्रान, झरनाझरत झिंग झिंग झिंग जलतरंगिनी ॥ २ ॥
बर बिहारु चरन चारु पाँडर चंपक चनार, करनहार बार पार पुर-पुरंगिनी । जोबन नव ढरत ढार दुत्त मत्त मृग मराल, मंद मंद गुंजत हैं अलि अलिगिनी ॥ ३ ॥ चितवत मुनिगन चकोर, बैठे निज ठौर ठौर, अच्छय अकलंक सरद-चंद-चंदिनी । उदित सदा बन-अकास, मुदित बदत तुलसिदास, जय जय रघुनंदन जय जनकनंदिनी ॥ ४ ॥
चित्रकूट पर्वत बड़ा ही विचित्र है; वहाँका वन बड़ा ही सुन्दर और पृथ्वी अतिशय पवित्र है । वहाँ सम्पूर्ण मलोंको नष्ट करनेवाली परम पावनी पयस्विनी* नदी है । वहीं सकल लोकोंके नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले भगवान् राम अपने अनुज लक्ष्मणके सहित रहते हैं तथा उनके वाम भागमें विश्ववन्दिता रमणीरत्न जानकीजी विराजती हैं ॥ १ ॥ अनेक ऋषिश्रेष्ठ वहाँ स्वच्छन्द निवास करते हैं और क्रोधरहितशरीर तथा सुन्दरगलेसे प्रसन्नतापूर्वक भगवान्केकीर्तन- की रचनाकरकेगानकरते हैं। वेऋषिगणबड़ी विधिपूर्वक (वेदोंका) गान करते हैं और प्रभुपर धन, मान एवं प्राणोंको निछावर करते हैं तथा नदियाँ झिग-झिग स्वर करती हुई जलके झरने झरती हैं ॥ २ ॥ उस ग्रामकी स्त्रियाँ पाँडर, चम्पक और कनचार आदिके वृक्षोंके मध्य चरणोंसे ही उत्तमविहार करनेवाले श्रीरघुनाथजीपर अपनेकोनिछावर करती हैं । वहाँ यौवन नये साँचेमें ढल-सा रहा है । मत्त होकर मृग तथा हंस फुर्तीलापन दिखा रहे हैं और भौंरा-भौंरी मन्द-मन्द गूंज
*मन्दाकिनीका ही दूसरा नाम ‘पयस्विनी’ है ।
२१६ अयोध्याकाण्ड रहे हैं ॥ ३ ॥ अपने-अपने स्थानोंपर बैठे हुए मुनिजनरूप चकोर- पक्षी सर्वदा आकाशरूप वनमें उदित हुए (श्रीराम और सीतारूप) अक्षय एवं अकलंंक चन्द्र तथा चन्द्रिकाको निहार रहे हैं। तुलसी- दासजी भी प्रसन्नचित्तसे कहते हैं, रघुनन्दन भगवान् राम और जनकदुलारी सीताजीकी जय हो, जय हो ॥ ४ ॥ [ ४४ ] फटिकसिला मृदु बिसाल, संकुल सुरतरु-तमाल ललित लता-जाल हरति छबि बितानकी। मंदाकिनि-तटिनि-तीर, मंजुल मृग-बिहग-भीर, धीर मुनिगिरा गभीर सामगानकी ॥ १ ॥ मधुकर-पिक-बरहि मुखर, सुंदर गिरि निरझर झर, जल-कन घन-छाँह, छन प्रभा न भानकी । सब ऋतु ऋतुपति प्रभाउ, संतत बहै त्रिबिध बाउ, जनु बिहार-बाटिका नृप पंचबानकी ॥ २ ॥ बिरचित तहँ परनसाल, श्रति बिचित्र लषनलाल, निवसत जहाँ नित कृपालु राम-जानकी । निजकर राजीवनयन पल्लव-दल-रचित सयन, प्यास परसपर पीयूष प्रेम-पानकी ॥ ३ ॥ सिय अँग लिखें धातुराग, सुमननि भूषन-बिभाग, तिलक-करनि का कहौं कलानिधानकी । माधुरी-बिलास-हास, गावत जस तुलसिदास, बसति हृदय जोरी प्रिय परम प्रानकी ॥ ४ ॥ [ प्रभुको प्रसन्न करनेके लिए ] विशाल फटिकशिला बड़ी कोमल हो गयी है; वहाँ उगे हुए कल्पवृक्षके समान तमालतरु तथा
मनोहर लतासमूह बड़े-बड़े चंदोवोंकी छवि छीन रहे हैं। मन्दाकिनी नदीके तीरपर मनोहर मृग और पक्षियोंकी भीड़ लगी रहती है तथा मनस्वी मुनियोंके सामगानका गम्भीर शब्द होता रहता है॥ १ ॥ भौंरे कोकिल और मयूरगण कोलाहल करते रहते हैं, सुन्दर पर्वतोंसे झरने झरते हैं, जलकणभरित मेघोंकी छाया बनी रहती है जिससे एक क्षणके लिये भी सूर्यका प्रकाश नहीं होता। सभी ऋतुओंमें ऋतुराज बसन्तका प्रभाव बना रहता है और निरन्तर त्रिविध समीर बहता रहता है। ऐसा जान पड़ता है, मानो यह वन महाराज कामदेवकी विहार-वाटिका ही हो ॥ २ ॥ वहाँ लखनलालने एक बड़ी ही विचित्र पर्णशाला बनायी है, जहाँ सदा ही कृपामय राम एवं जानकीजी निवास करती हैं। कमलनयन भगवान् रामने अपने ही हाथोंसे नवीन और कोमल पत्तोंकी शय्या रची है; क्योंकि प्रिया- प्रीतमको परस्पर प्रेमरस-पानकी प्यास है ॥ ३ ॥ भगवान् राम सीताजीके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंपर (सिंगरफ, हरताल आदि) धातुओंसे पत्ररचना करते हैं और फूलोंके आभूषण बनाते हैं। कलाकुशल श्रीरामकीतिलकरचनाका मैं क्या वर्णन करूँ ! तुलसीदासके हृदयमें वह परम प्राणप्रिय जोड़ी सर्वदा निवास करती है और वह उसकी माधुरी तथा उसके हास, विलास एवं सुयशका गान करता है॥ ४ ॥ राग केदारा [ ४५ ] लोने लाल लषन, सलोने राम, लोनी सिय, चारु चित्रकूट बैठे सुरतरु-तर हैं। गोरे-साँवरे सरीर पीत नील नीरज-से प्रेम-रूप-सुषमाके मनसिज-सर हैं॥ १ ॥
२२१ अयोध्याकाण्ड लोने नख-सिख, निरुपम, निरखन जोग, बड़े उर-कंधर बिसाल भुज बर हैं। लोने लोने लोचन, जटनिके मुकुट लोने, लोने बदननि जीते कोटि सुधाकर हैं॥ २॥ लोने लोने धनुष, बिसिख कर कमलनि, लोने मुनिपट, कटि लोने सरघर हैं। प्रिया प्रिय बंधुको दिखावत बिटप, बेलि, मंजु कुंज, सिलातल, दल, फूल, फर हैं॥ ३॥ ऋषिनके आश्रम सराहें, मृग-नाम कहैं, लागी मधु, सरित भरत निरझर हैं। नाचत बरहि नीके, गावत मधुप-पिक, बोलत बिहंग, नभ-जल-थल-चर हैं॥ ४॥ प्रभुहि बिलोकि मुनिगन पुलके कहत, भूरिभाग भये सब नीच नारि-नर हैं। तुलसी सो सुख-लाहु लूटत किरात-कोल, जाको सिसकत सुर बिधि-हरि-हर हैं॥ ५॥ श्रीलखनलाल और भगवान् राम बड़े ही सुन्दर हैं तथा सीताजी भी बड़ी ही सुघड़ हैं। ये सब महामनोहर चित्रकूटपर्वतपर कल्पवृक्षके नीचे बैठे हुए हैं। पीले और नीले कमलके समान इनके गोरे और साँवले शरीर हैं जो इस [चित्रकूटरूप] काम-सरोवरके मानो प्रेम, रूप और शोभामय कमल ही हैं॥ १॥ ये नखसे सिखतक सुन्दर अनुपम और दर्शनीय हैं। इनके वक्षःस्थल और कन्धे विशाल हैं तथा भुजाएँ अति सुन्दर हैं एवं इनके नेत्र तथा जटाओंके मुकुट भी बड़े ही मनोहर हैं। अपने मनोहर मुखमण्डलसे