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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 454 में से

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पृष्ठ 226

मनोहर लतासमूह बड़े-बड़े चंदोवोंकी छवि छीन रहे हैं। मन्दाकिनी नदीके तीरपर मनोहर मृग और पक्षियोंकी भीड़ लगी रहती है तथा मनस्वी मुनियोंके सामगानका गम्भीर शब्द होता रहता है॥ १ ॥ भौंरे कोकिल और मयूरगण कोलाहल करते रहते हैं, सुन्दर पर्वतोंसे झरने झरते हैं, जलकणभरित मेघोंकी छाया बनी रहती है जिससे एक क्षणके लिये भी सूर्यका प्रकाश नहीं होता। सभी ऋतुओंमें ऋतुराज बसन्तका प्रभाव बना रहता है और निरन्तर त्रिविध समीर बहता रहता है। ऐसा जान पड़ता है, मानो यह वन महाराज कामदेवकी विहार-वाटिका ही हो ॥ २ ॥ वहाँ लखनलालने एक बड़ी ही विचित्र पर्णशाला बनायी है, जहाँ सदा ही कृपामय राम एवं जानकीजी निवास करती हैं। कमलनयन भगवान् रामने अपने ही हाथोंसे नवीन और कोमल पत्तोंकी शय्या रची है; क्योंकि प्रिया- प्रीतमको परस्पर प्रेमरस-पानकी प्यास है ॥ ३ ॥ भगवान् राम सीताजीके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंपर (सिंगरफ, हरताल आदि) धातुओंसे पत्ररचना करते हैं और फूलोंके आभूषण बनाते हैं। कलाकुशल श्रीरामकीतिलकरचनाका मैं क्या वर्णन करूँ ! तुलसीदासके हृदयमें वह परम प्राणप्रिय जोड़ी सर्वदा निवास करती है और वह उसकी माधुरी तथा उसके हास, विलास एवं सुयशका गान करता है॥ ४ ॥ राग केदारा [ ४५ ] लोने लाल लषन, सलोने राम, लोनी सिय, चारु चित्रकूट बैठे सुरतरु-तर हैं। गोरे-साँवरे सरीर पीत नील नीरज-से प्रेम-रूप-सुषमाके मनसिज-सर हैं॥ १ ॥

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