गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ अयोध्याकाण्ड रहे हैं ॥ ३ ॥ अपने-अपने स्थानोंपर बैठे हुए मुनिजनरूप चकोर- पक्षी सर्वदा आकाशरूप वनमें उदित हुए (श्रीराम और सीतारूप) अक्षय एवं अकलंंक चन्द्र तथा चन्द्रिकाको निहार रहे हैं। तुलसी- दासजी भी प्रसन्नचित्तसे कहते हैं, रघुनन्दन भगवान् राम और जनकदुलारी सीताजीकी जय हो, जय हो ॥ ४ ॥ [ ४४ ] फटिकसिला मृदु बिसाल, संकुल सुरतरु-तमाल ललित लता-जाल हरति छबि बितानकी। मंदाकिनि-तटिनि-तीर, मंजुल मृग-बिहग-भीर, धीर मुनिगिरा गभीर सामगानकी ॥ १ ॥ मधुकर-पिक-बरहि मुखर, सुंदर गिरि निरझर झर, जल-कन घन-छाँह, छन प्रभा न भानकी । सब ऋतु ऋतुपति प्रभाउ, संतत बहै त्रिबिध बाउ, जनु बिहार-बाटिका नृप पंचबानकी ॥ २ ॥ बिरचित तहँ परनसाल, श्रति बिचित्र लषनलाल, निवसत जहाँ नित कृपालु राम-जानकी । निजकर राजीवनयन पल्लव-दल-रचित सयन, प्यास परसपर पीयूष प्रेम-पानकी ॥ ३ ॥ सिय अँग लिखें धातुराग, सुमननि भूषन-बिभाग, तिलक-करनि का कहौं कलानिधानकी । माधुरी-बिलास-हास, गावत जस तुलसिदास, बसति हृदय जोरी प्रिय परम प्रानकी ॥ ४ ॥ [ प्रभुको प्रसन्न करनेके लिए ] विशाल फटिकशिला बड़ी कोमल हो गयी है; वहाँ उगे हुए कल्पवृक्षके समान तमालतरु तथा