भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 224

बर बिहारु चरन चारु पाँडर चंपक चनार, करनहार बार पार पुर-पुरंगिनी । जोबन नव ढरत ढार दुत्त मत्त मृग मराल, मंद मंद गुंजत हैं अलि अलिगिनी ॥ ३ ॥ चितवत मुनिगन चकोर, बैठे निज ठौर ठौर, अच्छय अकलंक सरद-चंद-चंदिनी । उदित सदा बन-अकास, मुदित बदत तुलसिदास, जय जय रघुनंदन जय जनकनंदिनी ॥ ४ ॥

चित्रकूट पर्वत बड़ा ही विचित्र है; वहाँका वन बड़ा ही सुन्दर और पृथ्वी अतिशय पवित्र है । वहाँ सम्पूर्ण मलोंको नष्ट करनेवाली परम पावनी पयस्विनी* नदी है । वहीं सकल लोकोंके नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले भगवान् राम अपने अनुज लक्ष्मणके सहित रहते हैं तथा उनके वाम भागमें विश्ववन्दिता रमणीरत्न जानकीजी विराजती हैं ॥ १ ॥ अनेक ऋषिश्रेष्ठ वहाँ स्वच्छन्द निवास करते हैं और क्रोधरहितशरीर तथा सुन्दरगलेसे प्रसन्नतापूर्वक भगवान्‌केकीर्तन- की रचनाकरकेगानकरते हैं। वेऋषिगणबड़ी विधिपूर्वक (वेदोंका) गान करते हैं और प्रभुपर धन, मान एवं प्राणोंको निछावर करते हैं तथा नदियाँ झिग-झिग स्वर करती हुई जलके झरने झरती हैं ॥ २ ॥ उस ग्रामकी स्त्रियाँ पाँडर, चम्पक और कनचार आदिके वृक्षोंके मध्य चरणोंसे ही उत्तमविहार करनेवाले श्रीरघुनाथजीपर अपनेकोनिछावर करती हैं । वहाँ यौवन नये साँचेमें ढल-सा रहा है । मत्त होकर मृग तथा हंस फुर्तीलापन दिखा रहे हैं और भौंरा-भौंरी मन्द-मन्द गूंज


*मन्दाकिनीका ही दूसरा नाम ‘पयस्विनी’ है ।