गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१७ अयोध्याकाण्ड बचन परसपर कहति किरातिनि, पुलकगात, जल नयन बहे, री। तुलसी प्रभुहि बिलोकति एकटक, लोचन जनु बिनु पलक लहे, री ॥ ३ ॥ 'अगी सखि ! ये परदेशी कोई मृगयाशील राजकुमार हैं। ये धनुष-बाण और तरकसधारी श्याम-गौर बालक इस समय चित्रकूट पर्वतपर आकर रहने लगे हैं ॥ १ ॥ मेरे पतिदेवने यह समाचार सुनाया है कि बड़े-बड़े मुनीश्वर लोग इनका बहुत सम्मान करते हैं। इस समय ये स्त्री और भाईके सहित वनमें आ बसे हैं, इन्होंने अपने पिताके लिये बड़े-बड़े कष्ट सहे हैं ॥ २ ॥' इस प्रकार किरातिनियाँ आपसमें बातचीत कर रही हैं, उनके अङ्ग पुलकित हो रहे हैं और नेत्रोंसे जलकी धाराएँ बह रही हैं। तुलसीदास कहते हैं, प्रभुको देखकर उनके नेत्र तो मानो बिना पलकके ही हो गये हैं ॥ ३ ॥ चित्रकूट-वर्णन राग चंचरी [ ४३ ] 'चित्रकूट अति बिचित्र, सुंदर बन, महि पवित्र, पावनि पय-सरित सकल मल-निकंदिनी । सानुज जहँ बसत राम, लोक-लोचनाभिराम, बाम अंग बामाबर बिस्व-बंदिनी ॥ १ ॥ रिषिवर तहँ छंद बास, गावत कलकंठ हास, कीर्तन उनमाय काय क्रोध-कंदिनी । बर बिधान करत गान बारत धन-मान-प्रान, झरनाझरत झिंग झिंग झिंग जलतरंगिनी ॥ २ ॥