गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २१६ पुर पाँव धारिहैं, उधारिहैं तुलसीहू से जन, जिन जानि कै गरीबी गाढ़ी गही है ॥ ४ ॥ जबसे राम और लक्ष्मण जानकीजीके सहित इस मार्गसे गये हैं तबसे उनकी कोई भी सुध नहीं मिली। वे अयोध्यापुरीको लौट गये या विन्ध्याचल पर्वतपर चढ़े अथवा और कहीं रहे—यह किसीने कुछ भी नहीं बतलाया ॥ १ ॥ कोई कहते हैं कि वे चित्रकूटके समीप मन्दाकिनी नदीके तटपर पर्णकुटी बनाकर रहने लगे हैं— यह बात बिलकुल ठीक है। सुना जाता है कि भरतजी उन्हें मनाने- के लिये आ रहे हैं परंतु बात तो वही होगी जिसे विधाताने चित्त- में करना चाहा होगा ॥ २ ॥ महाराज दशरथकी बात तो निभ गयी, अब तो धर्मधुरन्धर सत्यसन्ध रघुनाथजीको अपनी प्रतिज्ञा निभानी होगी। अतः वे चौदह वर्ष तक वनोंमें पैदल फिरकर विहार करते हुए पर्वत, सरोवर, नदी और भूमिको पवित्र करेंगे ॥ ३ ॥ जहाँ- जहाँ जिन-जिनकी अवस्था बिगड़ी हुई है, उन ऋषि-मुनि, देवता और साधुजनोंके सारे कार्य सुधारकर वे अपनी राजधानीमें पधारेंगे और तुलसीदास-जैसे सेवकोंका भी उद्धार करेंगे, जिन्होंने जान- बूझकर दीनताको दृढ़तासे पकड़ रखा है ॥ ४ ॥ राग सारंग [ ४२ ] ये उपहीं कोउ कुंवर अहेरी । स्याम गौर, धनु-बान-तूनधर चित्रकूट अब आइ रहे, री ॥ १ ॥ इन्हहि बहुत आदरत महामुनि, समाचार मेरे नाह कहे, री । बनिता-बंधु समेत बसे बन, पितु हित कठिन कलेस सहे, री ॥ २ ॥