गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१५ अयोध्याकाण्ड शरीरकी सुधि जाती रही है और अब मन किसी दूसरी जगह नहीं जाता ॥ २ ॥ उनकी चितवन और हँसीने मेरे चित्तको चुरा लिया है। उनके पवित्र प्रेमवश मैं बिरानी (दूसरेकी) हो रही हूं [अब अपनेपर मेरा अधिकार नहीं है]॥ ३ ॥ वे माता, पिता, प्रिय परिजन और भाई न जाने कैसे हैं ? जिन्होंने स्वयं जीवित रहते जीवोंके जीवन इन रघुनाथजीको वनमें भेज दिया है॥ ४॥ उस समय- को चित्तमें लानेसे प्रेम बढ़ता है। अतः तुलसीदासने भी ग्राम- वधुओंकी उस प्रीतिको गाया है॥ ५॥ राग केदारा [ ४१ ] जबतें सिधारे यहि मारग लषन-राम, जानकी सहित, तबतें न सुधि लही है। अवध गए धौं फिरि, कैंधौं चढ़े बिंध्य गिरि, कैंधौं कहुँ रहे, सो कछू, न काहू कही है ॥ १ ॥ एक कहै, चित्रकूट निकट नदीके तीर, परनकुटीर करि बसे, बात सही है। सुनियत, भरत मनाइबेको आवत हैं, होइगी पै सोई, जो बिधाता चित्त चही है ॥ २ ॥ सत्यसंध, धरम-धुरौन रघुनाथजूको, आपनी 'निबाहिबे, नृपकी निरबही है। दस-चारि बरिस बिहार बन पदचार, करिबे पुनीत सैल, सर-सरि, मही है ॥ ३ ॥ मुनि-सुर-सुजन-समाजके सुधारि काज, बिगरि बिगरि जहाँ-जहाँ जाकी रही है ।