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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

२१५ अयोध्याकाण्ड शरीरकी सुधि जाती रही है और अब मन किसी दूसरी जगह नहीं जाता ॥ २ ॥ उनकी चितवन और हँसीने मेरे चित्तको चुरा लिया है। उनके पवित्र प्रेमवश मैं बिरानी (दूसरेकी) हो रही हूं [अब अपनेपर मेरा अधिकार नहीं है]॥ ३ ॥ वे माता, पिता, प्रिय परिजन और भाई न जाने कैसे हैं ? जिन्होंने स्वयं जीवित रहते जीवोंके जीवन इन रघुनाथजीको वनमें भेज दिया है॥ ४॥ उस समय- को चित्तमें लानेसे प्रेम बढ़ता है। अतः तुलसीदासने भी ग्राम- वधुओंकी उस प्रीतिको गाया है॥ ५॥ राग केदारा [ ४१ ] जबतें सिधारे यहि मारग लषन-राम, जानकी सहित, तबतें न सुधि लही है। अवध गए धौं फिरि, कैंधौं चढ़े बिंध्य गिरि, कैंधौं कहुँ रहे, सो कछू, न काहू कही है ॥ १ ॥ एक कहै, चित्रकूट निकट नदीके तीर, परनकुटीर करि बसे, बात सही है। सुनियत, भरत मनाइबेको आवत हैं, होइगी पै सोई, जो बिधाता चित्त चही है ॥ २ ॥ सत्यसंध, धरम-धुरौन रघुनाथजूको, आपनी 'निबाहिबे, नृपकी निरबही है। दस-चारि बरिस बिहार बन पदचार, करिबे पुनीत सैल, सर-सरि, मही है ॥ ३ ॥ मुनि-सुर-सुजन-समाजके सुधारि काज, बिगरि बिगरि जहाँ-जहाँ जाकी रही है ।

गीतावली २१६ पुर पाँव धारिहैं, उधारिहैं तुलसीहू से जन, जिन जानि कै गरीबी गाढ़ी गही है ॥ ४ ॥ जबसे राम और लक्ष्मण जानकीजीके सहित इस मार्गसे गये हैं तबसे उनकी कोई भी सुध नहीं मिली। वे अयोध्यापुरीको लौट गये या विन्ध्याचल पर्वतपर चढ़े अथवा और कहीं रहे—यह किसीने कुछ भी नहीं बतलाया ॥ १ ॥ कोई कहते हैं कि वे चित्रकूटके समीप मन्दाकिनी नदीके तटपर पर्णकुटी बनाकर रहने लगे हैं— यह बात बिलकुल ठीक है। सुना जाता है कि भरतजी उन्हें मनाने- के लिये आ रहे हैं परंतु बात तो वही होगी जिसे विधाताने चित्त- में करना चाहा होगा ॥ २ ॥ महाराज दशरथकी बात तो निभ गयी, अब तो धर्मधुरन्धर सत्यसन्ध रघुनाथजीको अपनी प्रतिज्ञा निभानी होगी। अतः वे चौदह वर्ष तक वनोंमें पैदल फिरकर विहार करते हुए पर्वत, सरोवर, नदी और भूमिको पवित्र करेंगे ॥ ३ ॥ जहाँ- जहाँ जिन-जिनकी अवस्था बिगड़ी हुई है, उन ऋषि-मुनि, देवता और साधुजनोंके सारे कार्य सुधारकर वे अपनी राजधानीमें पधारेंगे और तुलसीदास-जैसे सेवकोंका भी उद्धार करेंगे, जिन्होंने जान- बूझकर दीनताको दृढ़तासे पकड़ रखा है ॥ ४ ॥ राग सारंग [ ४२ ] ये उपहीं कोउ कुंवर अहेरी । स्याम गौर, धनु-बान-तूनधर चित्रकूट अब आइ रहे, री ॥ १ ॥ इन्हहि बहुत आदरत महामुनि, समाचार मेरे नाह कहे, री । बनिता-बंधु समेत बसे बन, पितु हित कठिन कलेस सहे, री ॥ २ ॥

२१७ अयोध्याकाण्ड बचन परसपर कहति किरातिनि, पुलकगात, जल नयन बहे, री। तुलसी प्रभुहि बिलोकति एकटक, लोचन जनु बिनु पलक लहे, री ॥ ३ ॥ 'अगी सखि ! ये परदेशी कोई मृगयाशील राजकुमार हैं। ये धनुष-बाण और तरकसधारी श्याम-गौर बालक इस समय चित्रकूट पर्वतपर आकर रहने लगे हैं ॥ १ ॥ मेरे पतिदेवने यह समाचार सुनाया है कि बड़े-बड़े मुनीश्वर लोग इनका बहुत सम्मान करते हैं। इस समय ये स्त्री और भाईके सहित वनमें आ बसे हैं, इन्होंने अपने पिताके लिये बड़े-बड़े कष्ट सहे हैं ॥ २ ॥' इस प्रकार किरातिनियाँ आपसमें बातचीत कर रही हैं, उनके अङ्ग पुलकित हो रहे हैं और नेत्रोंसे जलकी धाराएँ बह रही हैं। तुलसीदास कहते हैं, प्रभुको देखकर उनके नेत्र तो मानो बिना पलकके ही हो गये हैं ॥ ३ ॥ चित्रकूट-वर्णन राग चंचरी [ ४३ ] 'चित्रकूट अति बिचित्र, सुंदर बन, महि पवित्र, पावनि पय-सरित सकल मल-निकंदिनी । सानुज जहँ बसत राम, लोक-लोचनाभिराम, बाम अंग बामाबर बिस्व-बंदिनी ॥ १ ॥ रिषिवर तहँ छंद बास, गावत कलकंठ हास, कीर्तन उनमाय काय क्रोध-कंदिनी । बर बिधान करत गान बारत धन-मान-प्रान, झरनाझरत झिंग झिंग झिंग जलतरंगिनी ॥ २ ॥

बर बिहारु चरन चारु पाँडर चंपक चनार, करनहार बार पार पुर-पुरंगिनी । जोबन नव ढरत ढार दुत्त मत्त मृग मराल, मंद मंद गुंजत हैं अलि अलिगिनी ॥ ३ ॥ चितवत मुनिगन चकोर, बैठे निज ठौर ठौर, अच्छय अकलंक सरद-चंद-चंदिनी । उदित सदा बन-अकास, मुदित बदत तुलसिदास, जय जय रघुनंदन जय जनकनंदिनी ॥ ४ ॥

चित्रकूट पर्वत बड़ा ही विचित्र है; वहाँका वन बड़ा ही सुन्दर और पृथ्वी अतिशय पवित्र है । वहाँ सम्पूर्ण मलोंको नष्ट करनेवाली परम पावनी पयस्विनी* नदी है । वहीं सकल लोकोंके नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले भगवान् राम अपने अनुज लक्ष्मणके सहित रहते हैं तथा उनके वाम भागमें विश्ववन्दिता रमणीरत्न जानकीजी विराजती हैं ॥ १ ॥ अनेक ऋषिश्रेष्ठ वहाँ स्वच्छन्द निवास करते हैं और क्रोधरहितशरीर तथा सुन्दरगलेसे प्रसन्नतापूर्वक भगवान्‌केकीर्तन- की रचनाकरकेगानकरते हैं। वेऋषिगणबड़ी विधिपूर्वक (वेदोंका) गान करते हैं और प्रभुपर धन, मान एवं प्राणोंको निछावर करते हैं तथा नदियाँ झिग-झिग स्वर करती हुई जलके झरने झरती हैं ॥ २ ॥ उस ग्रामकी स्त्रियाँ पाँडर, चम्पक और कनचार आदिके वृक्षोंके मध्य चरणोंसे ही उत्तमविहार करनेवाले श्रीरघुनाथजीपर अपनेकोनिछावर करती हैं । वहाँ यौवन नये साँचेमें ढल-सा रहा है । मत्त होकर मृग तथा हंस फुर्तीलापन दिखा रहे हैं और भौंरा-भौंरी मन्द-मन्द गूंज


*मन्दाकिनीका ही दूसरा नाम ‘पयस्विनी’ है ।

२१६ अयोध्याकाण्ड रहे हैं ॥ ३ ॥ अपने-अपने स्थानोंपर बैठे हुए मुनिजनरूप चकोर- पक्षी सर्वदा आकाशरूप वनमें उदित हुए (श्रीराम और सीतारूप) अक्षय एवं अकलंंक चन्द्र तथा चन्द्रिकाको निहार रहे हैं। तुलसी- दासजी भी प्रसन्नचित्तसे कहते हैं, रघुनन्दन भगवान् राम और जनकदुलारी सीताजीकी जय हो, जय हो ॥ ४ ॥ [ ४४ ] फटिकसिला मृदु बिसाल, संकुल सुरतरु-तमाल ललित लता-जाल हरति छबि बितानकी। मंदाकिनि-तटिनि-तीर, मंजुल मृग-बिहग-भीर, धीर मुनिगिरा गभीर सामगानकी ॥ १ ॥ मधुकर-पिक-बरहि मुखर, सुंदर गिरि निरझर झर, जल-कन घन-छाँह, छन प्रभा न भानकी । सब ऋतु ऋतुपति प्रभाउ, संतत बहै त्रिबिध बाउ, जनु बिहार-बाटिका नृप पंचबानकी ॥ २ ॥ बिरचित तहँ परनसाल, श्रति बिचित्र लषनलाल, निवसत जहाँ नित कृपालु राम-जानकी । निजकर राजीवनयन पल्लव-दल-रचित सयन, प्यास परसपर पीयूष प्रेम-पानकी ॥ ३ ॥ सिय अँग लिखें धातुराग, सुमननि भूषन-बिभाग, तिलक-करनि का कहौं कलानिधानकी । माधुरी-बिलास-हास, गावत जस तुलसिदास, बसति हृदय जोरी प्रिय परम प्रानकी ॥ ४ ॥ [ प्रभुको प्रसन्न करनेके लिए ] विशाल फटिकशिला बड़ी कोमल हो गयी है; वहाँ उगे हुए कल्पवृक्षके समान तमालतरु तथा

मनोहर लतासमूह बड़े-बड़े चंदोवोंकी छवि छीन रहे हैं। मन्दाकिनी नदीके तीरपर मनोहर मृग और पक्षियोंकी भीड़ लगी रहती है तथा मनस्वी मुनियोंके सामगानका गम्भीर शब्द होता रहता है॥ १ ॥ भौंरे कोकिल और मयूरगण कोलाहल करते रहते हैं, सुन्दर पर्वतोंसे झरने झरते हैं, जलकणभरित मेघोंकी छाया बनी रहती है जिससे एक क्षणके लिये भी सूर्यका प्रकाश नहीं होता। सभी ऋतुओंमें ऋतुराज बसन्तका प्रभाव बना रहता है और निरन्तर त्रिविध समीर बहता रहता है। ऐसा जान पड़ता है, मानो यह वन महाराज कामदेवकी विहार-वाटिका ही हो ॥ २ ॥ वहाँ लखनलालने एक बड़ी ही विचित्र पर्णशाला बनायी है, जहाँ सदा ही कृपामय राम एवं जानकीजी निवास करती हैं। कमलनयन भगवान् रामने अपने ही हाथोंसे नवीन और कोमल पत्तोंकी शय्या रची है; क्योंकि प्रिया- प्रीतमको परस्पर प्रेमरस-पानकी प्यास है ॥ ३ ॥ भगवान् राम सीताजीके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंपर (सिंगरफ, हरताल आदि) धातुओंसे पत्ररचना करते हैं और फूलोंके आभूषण बनाते हैं। कलाकुशल श्रीरामकीतिलकरचनाका मैं क्या वर्णन करूँ ! तुलसीदासके हृदयमें वह परम प्राणप्रिय जोड़ी सर्वदा निवास करती है और वह उसकी माधुरी तथा उसके हास, विलास एवं सुयशका गान करता है॥ ४ ॥ राग केदारा [ ४५ ] लोने लाल लषन, सलोने राम, लोनी सिय, चारु चित्रकूट बैठे सुरतरु-तर हैं। गोरे-साँवरे सरीर पीत नील नीरज-से प्रेम-रूप-सुषमाके मनसिज-सर हैं॥ १ ॥

२२१ अयोध्याकाण्ड लोने नख-सिख, निरुपम, निरखन जोग, बड़े उर-कंधर बिसाल भुज बर हैं। लोने लोने लोचन, जटनिके मुकुट लोने, लोने बदननि जीते कोटि सुधाकर हैं॥ २॥ लोने लोने धनुष, बिसिख कर कमलनि, लोने मुनिपट, कटि लोने सरघर हैं। प्रिया प्रिय बंधुको दिखावत बिटप, बेलि, मंजु कुंज, सिलातल, दल, फूल, फर हैं॥ ३॥ ऋषिनके आश्रम सराहें, मृग-नाम कहैं, लागी मधु, सरित भरत निरझर हैं। नाचत बरहि नीके, गावत मधुप-पिक, बोलत बिहंग, नभ-जल-थल-चर हैं॥ ४॥ प्रभुहि बिलोकि मुनिगन पुलके कहत, भूरिभाग भये सब नीच नारि-नर हैं। तुलसी सो सुख-लाहु लूटत किरात-कोल, जाको सिसकत सुर बिधि-हरि-हर हैं॥ ५॥ श्रीलखनलाल और भगवान् राम बड़े ही सुन्दर हैं तथा सीताजी भी बड़ी ही सुघड़ हैं। ये सब महामनोहर चित्रकूटपर्वतपर कल्पवृक्षके नीचे बैठे हुए हैं। पीले और नीले कमलके समान इनके गोरे और साँवले शरीर हैं जो इस [चित्रकूटरूप] काम-सरोवरके मानो प्रेम, रूप और शोभामय कमल ही हैं॥ १॥ ये नखसे सिखतक सुन्दर अनुपम और दर्शनीय हैं। इनके वक्षःस्थल और कन्धे विशाल हैं तथा भुजाएँ अति सुन्दर हैं एवं इनके नेत्र तथा जटाओंके मुकुट भी बड़े ही मनोहर हैं। अपने मनोहर मुखमण्डलसे

गीतावली २२२ इन्होंने करोड़ों चन्द्रमाओंको जीत लिया है ॥ २ ॥ इनके करकमलोंमें सुन्दर-सुन्दर धनुष-बाण तथा कटिप्रदेशमें मनोहर मुनिवस्त्र और सुन्दर तरकस हैं। भगवान् राम अपनी प्राणप्रिया सीता तथा प्रिय सहोदर लक्ष्मणको वृक्ष, लता, मनोहर कुंजों, शिलातक तथा पत्र, पुष्प और फल दिखलाते हैं ॥ ३ ॥ वे ऋषियोंके आश्रमोंकी सराहना करते हैं, मृगोंके नाम बतलाते हैं, सब ओर मधु भरा हुआ है, नदी और झरने झर रहे हैं, मयूर सुहावना नृत्य करते हैं, भौंरे और कोकिल गाना गा रहे हैं तथा अन्य पक्षी और आकाश, जल एवं स्थलमें विहार करनेवाले प्राणी सुन्दर बोली बोल रहे हैं ॥ ४ ॥ प्रभुको देखकर मुनीश्वरगण शरीरमें पुलकित होकर कहते हैं—'देखो ये सब अधम स्त्री-पुरुष आज कैसे बड़भागी हो रहे हैं।' तुलसीदास कहते हैं, जिसके लिये ब्रह्मा, विष्णु और महादेव-जैसे देवता भी सिसकते रहते हैं, उस सुख और लाभको आज किरात और कोल आदि लूट रहे हैं ॥ ५ ॥ राग सारंग [ ४६ ] आइ रहे जबतें दोउ भाई । तबतें चित्रकूट-कानन-छबि दिनदिन अधिक अधिक अधिकाई ॥१॥ सीता-राम-लषन-पद-अंकित अवनि सोहावनि बरनि न जाई । मंदाकिनि मज्जत अवलोकत त्रिबिध पाप, त्रयताप नसाई ॥२॥ उकठेउ हरित भए जल-थलरुह, नित नूतन राजीव सुहाई । फूलत, फलत, पल्लवत, पलुहत बिटप बेलि अभिमत सुखदाई ॥३॥ सरित-सरनि सरसीरुह-संकुल, सवन सँवारि रमा जनु छाई । कूजत बिहँग, मंजु गुंजत अलि, जात पथिक जनु लेत बुलाई ॥४॥

२२३ अयोध्‍याकाण्ड त्रिबिध समीर, नीर भर झरननि, जहँ तहँ रहे ऋषि कुटी बनाई। सीतल सुभग सीलनिपर तापस करत जोग-जप-तप मन लाई ॥५॥ भए सब साधु किरात-किरातिनि, राम-दरस मिटि गइ कलुषाई। खग-मृग मुदित एक सँग बिहरत सहज बिषम बड़ बैर बिहाई ॥६॥ कामकेलि-बाटिका बिबुध-बन, लघु उपमा कबि कहत लजाई। सकल-भुवन-सोभा सकेलि मनो राम बिपिन बिधि आनि बसाई ॥७॥ बन मिस मुनि, मुनितिय, मुनि-बालक बरनत रघुबर-बिमल-बड़ाई। पुलक सिथिल तनु, सजल सुलोचनु, प्रमुदित मन जीवन फलु पाई ॥८॥ क्यों कहौं चित्रकूट-गिरि, संपति-महिमा-मोद-मनोहर ताई। तुलसी जहँ बसि लषन राम सिय आनंद-अवधि अवध बिसराई ॥६॥ जबसे दोनों भाई आकर रहे हैं तबसे चित्रकूटके वनकी शोभा दिनोंदिन अधिक-अधिक हो रही है ॥ १ ॥ सीता, राम और लक्ष्मणजीके चरणचिह्नोंसे अंकित उस सुहावनी भूमिका वर्णन नहीं होता। मन्दाकिनीका स्नान अथवा दर्शन करनेसे ही तीनों प्रकारके पाप और ताप नष्ट हो जाते हैं ॥ २ ॥ जल और स्थलमें उत्पन्न होनेवाले पौधे, जो सूख चुके थे, फिर हरे हो गये हैं, तथा कमल भी नित्य नवीन-नवीन शोभा धारण कर रहे हैं। सब प्रकारके अभिमत और सुखदायी वृक्ष तथा लता आदि पुष्पित, फलित, पल्लवित और हरे-भरे होरहे हैं ॥३॥नदीओर तालाबोंमेंकमल खिले हुए हैं, मानो लक्ष्मीजी अपनेघरोंको सँभालकर निवासकरनेलगी हों। पक्षिगण कूज रहे हैं तथा भ्रमरोंका मनोहर गुंजार हों रहा है, मानो वे जानेवाले पथिकोंको अपने पास बुला रहे हैं ॥ ४ ॥ शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चल रहा है; झरनोंमें जल झर रहा है, ऋषिगण जहाँ-तहाँ कुटी बनाकर बसे हुए हैं तथा तपस्वी लोग

गीतावली २२४ दत्तचित्त होकर शीतल और सुन्दर शिलाओंपर जप, तप एवं योगसाधन कर रहे हैं ॥ ५ ॥ सारे किरात और किरातिनियां साधु हो गये हैं। भगवान् रामका दर्शन पाकर उनकी कलुषता जाती रही है। पक्षी और मृगगण अपना स्वाभाविक वैर भूलकर प्रसन्नता- पूर्वक एक साथ विहार कर रहे हैं ॥ ६ ॥ उस वनको कामदेवके क्रीडोद्यान और नन्दनवनकी लघु उपमा देनेमें भी कविको लज्जा होती है, मानो विधाताने सारे भुवनोंकी शोभाको एकत्रकर भगवान् रामके वनमें ही लाकर बसा दिया है ॥ ७ ॥ उस वनके मिससे ही मुनिजन, मुनिपत्नियाँ और मुनिबालक रघुनाथजीके विमल सुयशका वर्णन करते हैं और अपने जीवनका फल पाकर पुलकित एवं शिथिलशरीर, सजलनयन और प्रसन्नचित्त हो जाते हैं ॥ ८ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, जहाँ आनन्दके सीमास्वरूप भगवान् राम, लक्ष्मण और सीताजी अयोध्याको त्यागकर निवास करते हैं उस चित्रकूटपर्वतकी सम्पत्ति, महिमा, प्रसन्नता एवं मनोहरताका मैं कैसे वर्णन कर सकता हूँ ॥ ९ ॥ राग गौरी [ ४७ ] देखत चित्रकूट-बन मन अति होत हुलास । सीता-राम-लखन-प्रिय, तापस-बृन्द-निवास ॥ १ ॥ सरित सोहावनि पावनि, पापहरनि पय नाम । सिद्ध-साधु-सुर-सेवित देति सकल मन-काम ॥ २ ॥ बिटप-बेलि नव किसलय, कुसुमित सघन सुजाति । कंदमूल जल-थलरुह अगनित अनबन भाँति ॥ ३ ॥

२२५ अयोध्याकाण्ड बंजुल मंजु, बकुलकुंज, सुरतरु, ताल तमाल। कदलि, कदंब, सुचंपक, पाटल, पनस, रसाल ॥ ४ ॥ सूरुह मूरि भरे जनु छबि-अनुराग-सभाग । बन बिलोकि लघु लागहिं बिपुल बिबुध-बन-बाग ॥ ५ ॥ जाइ न बरनि राम-बन, चितवत चित हरि लेत। ललित-लता-द्रुम-संकुल मनहु मनोज निकेत ॥ ६ ॥ सरित-सरनि सरसीरुह फूले नाना रंग। गुंजत मंजु मधुपबन, कूजत बिबिध बिहंग ॥ ७ ॥ लषन कहेउ रघुनंदन देखिय बिपिन-समाज । मानहु चयन मयन-पुर आयउ प्रिय ऋतुराज ॥ ८ ॥ चित्रकूटपर राउर जानि अधिक अनुरागु । सखासहित जनु रतिपति आयउ खेलन फागु ॥ ९ ॥ झिल्लि झाँझ, झरना डफ नव मृदंग निसान । भेरि उपंग भुंग रव, ताल कीर, बलगान ॥ १० ॥ हंस कपोत कबूतर बोलत चक्र चकोर । गावत मनहु नारिनर मुदित नगर चहुँ ओर ॥ ११ ॥ चित्र-बिचित्र बिबिध मृग डोलत डोंगर डाँग । जनु पुरबीथिन बिहरत छल संवारे स्वांग ॥ १२ ॥ नाचहिं मोर, पिक गावहिं, सुर बर राग बँधान । निलज तरुन-तरुनी जनु खेलहिं समय समान ॥ १३ ॥ भरि भरि सुंड करिनि-करि जहँ तहँ डारहिं बारि । भरत परस्पर पिचवनि मनहु मुदित नर-नारि ॥ १४ ॥ पीठि चढ़ाइ सिसुन्ह कपि कूदत डारहि डार । जनु मुंह लाइ गेरु-मसि भए खरनि असवार ॥ १५ ॥ गी० १५-

गीतावली २२६ लिये पराग सुमनरस डोलत मलय-समीर । मनहु अरगजा छिरकत, भरत गुलाल-अबीर ॥ १६ ॥ काम कौतुकी यहि बिधि प्रभुहित कौतुक कीन्ह । रीझि राम रतिनाथहि जग-बिजयी बर दीन्ह ॥ १७ ॥ दुखवहु मोरे दास जनि, मानेहु मोरि रजाइ । 'भलेहि नाथ', माथे धरि आयसु चलेउ बजाइ ॥ १८ ॥ मुदित किरात-किरातिनि रघुबर-रूप निहारि । प्रभुगुन गावत नाचत चले जोहारि जोहारि ॥ १९ ॥ देहिं असीस, प्रसंसहि मुनि, सुर बरषहिं फूल । गवने भवन राखि उर मूरति मंगलमूल ॥ २० ॥ चित्रकूट-कानन-छबि को कबि बरनै पार । जहँ सिय-लषनसहित नित रघुबर करहिं बिहार ॥ २१ ॥ तुलसिदास चाँचरि मिस कहे राम-गुनग्राम । गावहिं, सुनहिं नारि-नर पावहिं सब अभिराम ॥ २२ ॥ जो सीता, राम और लक्ष्मणको अत्यन्त प्रिय तथा तपस्वियोंका निवासस्थान है, उस चित्रकूट-वनको देखकर मनमें बड़ा ही आनन्द होता है ॥ १ ॥ वहाँ बड़ी ही सुहावनी, पवित्रकारिणी एवं पाप- नाशिनी 'पयस्विनी' नामकी नदी है, जो सिद्ध, साधु और देवताओंसे सेवित है और सम्पूर्ण मनोकामनाओंको पूर्ण कर देती है ॥ २ ॥ सघन और सुन्दर जातिके वृक्ष तथा लताएँ नवीन पल्लव और पुष्पोंसे आच्छादित हैं तथा अगणित और अनेक प्रकारके कन्द-मूल एवं जलथलके पौधे लगे हुए हैं ॥ ३ ॥ मनोहर बेत-बकुलसमुदाय (मौलसिरी), कल्पवृक्ष, ताल, तमाल, कदली, कदम्ब, चम्पक, पाटल, कटहल और आम्रके वृक्ष मानों छवि, अनुराग और सौभाग्य-

से अत्यन्त भरे हुए हैं। उस वनको देखकर देवताओंके बहुत-से वन और बगीचे भी तुच्छ जान पड़ते हैं ॥ ४-५ ॥ भगवान् रामके वनका वर्णन नहीं हो सकता, वह देखते ही चित्तको चुरा लेता है [और ऐसा जान पड़ता है] मानो मनोहर लता और वृक्षोंसे पूर्ण कामदेव- का निवासस्थान ही हो ॥ ६ ॥ वहाँके नदी और तालाबोंमें रंग- बिरंगे कमल खिले हुए हैं, जिनपर मनोहर भ्रमरगण गुंजारकर रहे हैं तथा तरह-तरहके पक्षी कूज रहे हैं ॥ ७ ॥ लक्ष्मणजी कहते हैं- 'हे रघुनाथजी ! इस वनका ठाट-बाट तो देखिये, ऐसा जान पड़ता है मानो कामदेवके नगरमें उसका प्रिय सुहृद् ऋतुराज (बसन्त) आनन्द मनाने आया हो ॥ ८ ॥ अथवा चित्रकूटपर आपका अधिक प्रेम देखकर मानो अपने सखाके सहित कामदेव फाग खेलने आया हो ॥ ९ ॥ वहाँ जो झींगुरका शब्द होता है वही झांझ है, झरना डफ, नवीन मृदंग और निसानके समान है, भौंरोंका शब्द भेरी और उपंग (नसतरङ्ग) है तथा तोतोंका कलरव ताल है ॥ १० ॥ इस वनमें जो हंस, कपोत, कबूतर, चकवा और चकोर आदि पक्षी बोलते हैं, वे ही इस कामनगरमें मानो चारों ओर नर-नारिवृन्द प्रसन्न होकर गा रहे हैं ॥ ११ ॥ सघन वनखण्डकी ऊँची भूमिमें जो चित्र-विचित्र अनेकों मृग डोल रहे हैं, वह ऐसा जान पड़ता है मानो उस नगरकी गलियोंमें अनेकों छैल ही स्वाँग बनाकर विचर रहे हों ॥ १२ ॥ मयूर नृत्य करते हैं तथा कोकिल पक्षी सुन्दर स्वरमें राग बाँधकर गान कर रहे हैं, वह ऐसा जान पड़ता है मानो निर्लज्ज युवक और युवतियाँ समयानुसार खेल रहे हों ॥ १३ ॥ हाथी और हथिनियां सूँडोंमें जल भरकर जहाँ-तहाँ उँडेल देती हैं, मानो स्त्री और पुरुष

गीतावली २२८ प्रसन्न होकर आपसमें पिचकारियाँ भर रहे हों ॥ १४ ॥ [काले और लाल मुखके] बन्दर अपने बच्चोंको पीठपर चढ़ाकर एक डालसे दूसरी डालपर कूदते हैं, वह ऐसा जान पड़ता है मानो [स्वांग रचनेवाले लोग] मुखोंपर गेरू या स्याही लगाकर गधोंपर सवार हो गये हों ॥ १५ ॥ मलयवायु पराग तथा पुष्पोंके रससे भरकर विचर रहा है, मानों वह जहाँ-तहाँ अरगजा छिड़कता हो अथवा मुखोंपर गुलाल या अबीर मल रहा हो ॥ १६ ॥ इस प्रकार प्रभुके लिये कौतुकी कामदेव मानो खेल कर रहा है और इसीलिये रघुनाथ- जीने प्रसन्न होकर उसे विश्वविजयी होनेका वर दिया है ॥ १७ ॥ [और उसे चेता दिया है कि] 'देखो, मेरे दासको दुःख न देना, सर्वदा मेरी इस आज्ञाका पालन करना।' तब कामदेव भी 'प्रभो ! बहुत अच्छा' ऐसा कहकर भगवान्‌की आज्ञा सिरपर धारणकर वहाँसे चला गया है ॥ १८ ॥ रघुनाथजीका रूप देखकर किराती और किरात भी खूब प्रसन्न हैं और प्रभुका गुण गाते-नाचते जुहार कर- करके चले जाते हैं ॥ १९ ॥ मुनिलोग भगवान्‌को आशीर्वाद देते और उनकी प्रशंसा करते हैं तथा देवतालोग फूलोंकी वर्षा करते हैं और हृदयमें भगवान्‌की मङ्गलमयी मूर्ति धारणकर अपने घरोंको चले जाते हैं ॥ २० ॥ जहाँ सीता और लक्ष्मणजीके सहित भगवान् राम सदा ही विहार करते हैं, उस चित्रकूटपर्वतके वनकी शोभाका वर्णन कर कौन कवि पार पा सकता है ॥ २१ ॥ तुलसीदास कहते हैं, हमने तो चाँचर (होली गान) के मिससे ही कुछ रामके गुण गाये हैं। जो स्त्री-पुरुष इनका गान या श्रवण करेंगे वे सब प्रकार शुभ फल प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥

२२६ अयोध्याकाण्ड राग बसन्त [ ४८ ] आजु बन्यो है बिपिन देखो, राम धीर । मानो खेलत फागु मुद मदन बीर बट, बकुल, कदंब, पनस, रसाल । कुसुमित तरु-निकर कुरव-तमाल ॥ मानो बिबिध बेष धरे छैल-यूथ । बिच बीच लता ललना-बरूथ ॥२॥ पनवानक निरझर, अलि उपंग । बोलत पारावत मानो डफ-मृदंग ॥ गायक सुक-कोकिल, झिल्लि ताल । नाचत बहु भाँति बरहि मराल ॥३॥ मलयामिल सीतल, सुरभि, मंद । बहु साहत सुमन-रस रेनु बृंद ॥ मनु छिरकत फिरत सबनि सुरंग । भ्राजत उदार लीला अनंग ॥४॥ क्रीडत जीते सुर-असुर-नाग । हठि सिद्ध-मुनिनके पंथ लाग ॥ कह तुलसिदास, तेहि छाड़ु मंन । जेहि राख राम राजीवनैन ॥५॥ 'हे धैर्यवान् भगवान् राम ! देखिये, आज यह वन ऐसा बना हुआ है, मानो वीरवर कामदेव आनन्दित होकर फाग खेलता हो ॥१॥ वट, बकुल (मौलसिरी), कदम्ब, कटहल, आम, कुरव और तमाल आदि वृक्ष फूले हुए हैं, मानो तरह-तरहके वेष धारण किये अनेकों छैल हों और उनके बीच-बीचमें लतारूप स्त्रीसमुदाय शोभायमान हों ॥ २ ॥ झरने ऐसे जान पड़ते हैं, मानो नगाड़े और ढोल हों, भ्रमर उपङ्ग (मुरचङ्ग) के समान प्रतीत होते हैं तथा कबूतर जो बोलते हैं वह मानो डफ और मृदङ्ग हैं। शुक और कोकिल गान करनेवाले हैं, झिल्लीकी झनकार मानो उनकी ताल है तथा मयूर और हंस अनेकों प्रकारसे नृत्य कर रहे हैं ॥ ३ ॥ शीतल-मन्द- सुगन्ध मलयमारुत फूलोंका रस और पराग लेकर बह रहा है, सो ऐसा जान पड़ता है, मानो उदार लीलाविहारी कामदेव सबपर सुन्दर

गीतावली . २३० रंग छिड़कता हुआ विराजमान हो ॥ ४ ॥ इसने खेलनेमें ही देवता, असुर और नाग आदिको जीत लिया है तथा यह हठपूर्वक सिद्ध- मुनीश्वरोंके मार्गमें रोड़े अटकाये हुए है । तुलसीदास कहते हैं—यह कामदेव तो उसीको छोड़ता है, जिसकी कमलनयन भगवान् राम रक्षा करते हैं ॥ ५ ॥ [ ४९ ] ऋतु-पति आए भलो बन्यो बनसमाज । मानो भए हैं मदन महाराज आज ॥१॥ मनो प्रथम फागु मिस करि अनीति । होरीमिस अरिपुर जारि जीति ॥ मारुत मिस पत्र-प्रजा उजारि । नयनगर बसाए बिपिन झारि ॥२॥ सिंहासन सैल-सिला सुरंग । कानन-छबि रति, परिजन कुरंग ॥ सित छत्रसुमन, बल्ली बितान । चामर समीर निरझर निसान ॥३॥ मनो मधु-माधव दोउ अनिप धीर । बर बिपुल बिटप बानैत बीर ॥ मधुकर-सुक-कोकिल बंदि-बृंद । बरनहिं बिसुद्ध जस बिबिध छंद ॥४॥ महि परत सुमन-रस फल पराग । जनु देत इतर नृप कर-बिभाग ॥ कलि सचिव सहित नय-निपुन मार । कियो बिस्व बिबस चारिहु प्रकार ॥५॥ बिरहिनपर नित नई परै मारि । डाँड़ियत सिद्ध-साधक प्रचारि ॥ तिनकीन काम सकै चापि छाँह । तुलसी जे बसहि रघुबीर बाँह ॥६॥ ऋतुराजके आनेपर वनकी शोभा बड़ी भली बन गयी है, मानो आज कामदेवको महाराज-पद प्राप्त हुआ हो ॥ १ ॥ अतः उन्होंने फागके मिससे मर्यादा छोड़कर [ वनरूप ] शत्रुके नगरपर विजय प्राप्तकर उसे होलीके बहाने जला ( सुखा ) डाला हो और फिर वायुरूपसे पत्ररूप प्रजाको लूटकर समग्र

१३१ अयोध्याकाण्ड वनमें [नवीन कोंपलें उत्पन्न कर] कोई नया नगर बसाया हो ॥ २ ॥ उन मदन महाराजका राजसिंहासन पर्वतकी सुन्दर शिला है, वनकी शोभा रति है, मृगगण कुटुम्बी हैं, पुष्ट श्वेतच्छत्र हैं, लताएँ वितान हैं, वायु चमर है और झरने नौबत हैं ॥ ३ ॥ ऐसा जान पड़ता है मानो चैत्र और वैशाख—ये दोनों धीर-वीर सेनापति हैं, अनेकों सुन्दर वृक्ष उनके दृढ़प्रतिज्ञ वीर हैं तथा भौंरे शुक और कोकिल पक्षी वन्दीजन हैं, जो अनेकों छन्दोंमें उनका विशुद्ध यश बखान करते हैं ॥ ४ ॥ पृथ्वीपर जो फूलोंके रस, पराग अथवा फल गिरते हैं, वे मानो अन्य सामन्तगण उन्हें कर देते हैं । इस प्रकार नीतिनिपुण कामदेवने अपने मन्त्री कलियुगके सहित मानो साम, दाम, दण्ड, भेद—चारों प्रकारसे सारे विश्वको अपने अधीन कर लिया है ॥ ५ ॥ इसके राज्यमें विरही पुरुषोंपर नित्य नयी मार पड़ती है तथा सिद्ध और साधकोंको ललकारकर दण्ड दिया जाता है। तुलसीदास कहते हैं, किन्तु जो श्रीरघुनाथजीकी बाँहके नीचे बसे हुए (शरणागत) हैं, उनकी तो छायाको भी यह कामदेव नहीं छू सकता ॥ ६ ॥ राग मलार [ ५० ] सब दिन चित्रकूट नीको लागत । बरषाऋतु प्रबेस बिसेष गिरि देखन मन अनुरागत ॥ १ ॥ चहुँदिसि बन संपन्न बिहँग-मृग बोलत सोभा पावत । जनु सुनरेस देस-पुर प्रमुदित प्रजा सकल सुख छावत ॥ २ ॥ सोहत स्याम जलद मृदु घोरत धातु रँगभगे सृँगनि । मनहु आदि अंभोज बिराजत सेवित सुर-मुनि-भृंगनि ॥ ३ ॥

गीतावली २३२ सिखर परस घन-घटहि, मिलति बग-पाँति सो छवि कबि बरनी। आदि बराह बिहरि बारिधि मनो उठ्यो है दसन धरि धरनी ॥ ४ ॥ जल जुत बिमल सिलनि झलकत नभ बन-प्रतिबिंब तरंग। मानहु जग-रचना बिचित्र बिलसति बिराट अँग अंग ॥ ५ ॥ मंदाकिनिहि मिलत झरना भरि भरि भरि भरि जल आछे। तुलसी सकल सुकृत-सुख लागे मानौ राम-भगति के पाछे ॥ ६ ॥ चित्रकूट पर्वत सभी दिन बड़ा सुहावना लगता है। वर्षाऋतु- का प्रवेश होनेपर तो इसे देखनेके लिये मन बहुत ही छटपटाता है ॥ १ ॥ इसके चारों ओर फल-फूल आदिसें सम्पन्न वन है, वहाँ बोलते हुए पक्षी और मृगगण ऐसी शोभा पाते हैं, मानो किसी अच्छे राजाके देश और नगरमें प्रजा आनन्दपूर्वक सब प्रकारके सुख भोग रही हो ॥ २ ॥ [गेरू आदि] धातुओंसे रँगे हुए गिरिशिखरोंपर मधुर-मधुर घोर करते हुए मेघ ऐसे शोभायमान होते हैं मानो देवता और मुनिजनरूप भ्रमरोंसे सेवित आदिकमल [जिससे ब्रह्माजी प्रकट हुए थे] विराजमान हों ॥ ३ ॥ जब बगुलोंकी पंक्ति शिखरको स्पर्श करके श्याम घटाओंसे मिलती है तो उसकी छवि कवि इस प्रकार वर्णन करता है मानो आदिवराह समुद्रमें क्रीड़ा कर, दाँतोंपर पृथ्वी धारण कर उससे बाहर निकले हैं। [यहाँ पर्वत आदिवराह हैं, बगुलोंकी पंक्ति दाँत हैं और घटाएँ पृथ्वी है] ॥ ४ ॥ जलसे भरी हुई निर्मल शिलाओंमें आकाश और वनका प्रतिबिम्ब ऐसा झलकता है जैसे विराट् भगवान्‌के अङ्ग-प्रत्यङ्गमें संसारकी विचित्र रचना प्रतिफलित हो रही हो ॥ ५ ॥ तुलसीदास कहते हैं, स्वच्छ जलसे भरे हुए झर-झरकर मन्दाकिनी नदीमें मिले जाते हैं जैसे सारे सुकृत और सुख एकमात्र रामभक्तिके ही पीछे लगे हुए हैं ॥ ६ ॥

२३३ अयोध्याकाण्ड कौसल्याकी विरह-वेदना राग सोरठ [ ५१ ] आजुको भोर, और सो, मांई । सुनौं न द्वार बेद-बंदी-धुनि गुनिगन-गिरा सोहाई ॥ १ ॥ निज निज सुंदर पति-सदननितें रूप-सील-छबि छाईं । लेन असीस सीय आगे करि मोपै सुतबधू न आईं ॥ २ ॥ बूझी हौं न बिहँसि मेरे रघुबर 'कहाँ री ! सुमित्रा माता ?' ! तुलसी मनहु महासुख मेरो देखि न सकेउ बिधाता ॥ ३ ॥ [रामविरहसे व्याकुल होकर माता कौसल्या कह रही हैं—] अरी माई ! आजका भोर तो मुझे और ही तरहका जान पड़ता है। आज द्वारपर न तो वेद और वन्दीजनकी ही ध्वनि सुनायी देती है और न गुणियोंकी मनोहर वाणीका ही शब्द है ॥ १ ॥ अपने-अपने पतियोंके सुन्दर महलोंसे रूप, शील और छबिसे सम्पन्न मेरी पुत्रवधुएँ भी सीताको आगे कर आज मेरे पास आशीर्वाद लेनेके लिये नहीं आयीं ॥ २ ॥ आज मुझसे रघुवीरने हँसकर यह नहीं पूछा कि 'अरी माँ ! सुमित्रा माता कहाँ हैं ? अहो ! मेरे महासुख- को मानो विधाता ही नहीं देख सका' ॥ ३ ॥ [ ५२ ] जननी निरखति बान-धनुहियाँ । बार बार उर-नैननि लावति प्रभुजूकी ललित पनहियाँ ॥ १ ॥ कबहूँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सबारे । उठहु तात ! बलि मातु बदनपर, अनुज-सखा सब द्वारे ॥ २ ॥

गीतावली २३४ कबहुँ कहति यों, बड़ी बार भइ, जाहु भूप पहँ, भैया। बंधु बोलि जेँइय जो भावै, गई निछावरि मैया ॥ ३ ॥ कबहुँ समुझि बन-गवन रामको रहि चकि चित्र लिखी-सी। तुलसिदास वह समय कहेतें लागत प्रीति सिखी-सी ॥ ४ ॥ माता रघुनाथजीके खेल-कूदके धनुषको देखती हैं और प्रभुजी- की जो नन्ही-नन्ही सुन्दर जूतियाँ उन्हें बारम्बार हृदय और नेत्रोंसे लगाती हैं ॥ १ ॥ कभी पहलेकी भाँति सबेरे ही मन्दिरमें जाकर इस प्रकारके प्रिय वचन कहकर जगाने लगती हैं कि, 'हे तात ! उठो, मुखचन्द्रपर माता बलिहारी जाती है, देखो, सारे अनुज और सखा- गण द्वारपर खड़े हैं, ॥ २ ॥ और कभी कहती हैं—'भैया ! बहुत विलम्ब हो गया है, महाराजके पास जाओ और अपने साथियोंको बुलाकर जो रुचे सो भोजन करो, माता निछावर होती है' ॥ ३ ॥ तथा कभी रामका वनगमन स्मरण कर चकित होकर चित्रलिखित- सी रह जाती है। तुलसीदास कहते हैं, उस समयका वर्णन करनेसे तो प्रीति सीखी हुई-सी जान पड़ती है [क्योंकि सत्य प्रेम होनेपर तो उसका वर्णन ही नहीं हो सकेगा, चित्त विवश होकर विरहाग्निमें दग्ध हो जायगा] ॥ ४ ॥ [ ५३ ] माई री ! मोहि कोउ न समुझावै। राम-गवन साँचो किधौं सपनो, मन परतीति न आवै ॥ १ ॥ लगेइ रहत मेरे नैननि आगे राम-लषन अरु सीता। तदपि न मिटत दाह या उरकी, बिधि जो भयो बिपरीता ॥ २ ॥ दुख न रहै रघुपतिहि बिलोकत तनु न रहै बिनु देखे। करत न प्रान पयान, सुनहु सखि ! अरुझि परी यहि लेखे ॥ ३ ॥