गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २३२ सिखर परस घन-घटहि, मिलति बग-पाँति सो छवि कबि बरनी। आदि बराह बिहरि बारिधि मनो उठ्यो है दसन धरि धरनी ॥ ४ ॥ जल जुत बिमल सिलनि झलकत नभ बन-प्रतिबिंब तरंग। मानहु जग-रचना बिचित्र बिलसति बिराट अँग अंग ॥ ५ ॥ मंदाकिनिहि मिलत झरना भरि भरि भरि भरि जल आछे। तुलसी सकल सुकृत-सुख लागे मानौ राम-भगति के पाछे ॥ ६ ॥ चित्रकूट पर्वत सभी दिन बड़ा सुहावना लगता है। वर्षाऋतु- का प्रवेश होनेपर तो इसे देखनेके लिये मन बहुत ही छटपटाता है ॥ १ ॥ इसके चारों ओर फल-फूल आदिसें सम्पन्न वन है, वहाँ बोलते हुए पक्षी और मृगगण ऐसी शोभा पाते हैं, मानो किसी अच्छे राजाके देश और नगरमें प्रजा आनन्दपूर्वक सब प्रकारके सुख भोग रही हो ॥ २ ॥ [गेरू आदि] धातुओंसे रँगे हुए गिरिशिखरोंपर मधुर-मधुर घोर करते हुए मेघ ऐसे शोभायमान होते हैं मानो देवता और मुनिजनरूप भ्रमरोंसे सेवित आदिकमल [जिससे ब्रह्माजी प्रकट हुए थे] विराजमान हों ॥ ३ ॥ जब बगुलोंकी पंक्ति शिखरको स्पर्श करके श्याम घटाओंसे मिलती है तो उसकी छवि कवि इस प्रकार वर्णन करता है मानो आदिवराह समुद्रमें क्रीड़ा कर, दाँतोंपर पृथ्वी धारण कर उससे बाहर निकले हैं। [यहाँ पर्वत आदिवराह हैं, बगुलोंकी पंक्ति दाँत हैं और घटाएँ पृथ्वी है] ॥ ४ ॥ जलसे भरी हुई निर्मल शिलाओंमें आकाश और वनका प्रतिबिम्ब ऐसा झलकता है जैसे विराट् भगवान्के अङ्ग-प्रत्यङ्गमें संसारकी विचित्र रचना प्रतिफलित हो रही हो ॥ ५ ॥ तुलसीदास कहते हैं, स्वच्छ जलसे भरे हुए झर-झरकर मन्दाकिनी नदीमें मिले जाते हैं जैसे सारे सुकृत और सुख एकमात्र रामभक्तिके ही पीछे लगे हुए हैं ॥ ६ ॥