गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३३ अयोध्याकाण्ड कौसल्याकी विरह-वेदना राग सोरठ [ ५१ ] आजुको भोर, और सो, मांई । सुनौं न द्वार बेद-बंदी-धुनि गुनिगन-गिरा सोहाई ॥ १ ॥ निज निज सुंदर पति-सदननितें रूप-सील-छबि छाईं । लेन असीस सीय आगे करि मोपै सुतबधू न आईं ॥ २ ॥ बूझी हौं न बिहँसि मेरे रघुबर 'कहाँ री ! सुमित्रा माता ?' ! तुलसी मनहु महासुख मेरो देखि न सकेउ बिधाता ॥ ३ ॥ [रामविरहसे व्याकुल होकर माता कौसल्या कह रही हैं—] अरी माई ! आजका भोर तो मुझे और ही तरहका जान पड़ता है। आज द्वारपर न तो वेद और वन्दीजनकी ही ध्वनि सुनायी देती है और न गुणियोंकी मनोहर वाणीका ही शब्द है ॥ १ ॥ अपने-अपने पतियोंके सुन्दर महलोंसे रूप, शील और छबिसे सम्पन्न मेरी पुत्रवधुएँ भी सीताको आगे कर आज मेरे पास आशीर्वाद लेनेके लिये नहीं आयीं ॥ २ ॥ आज मुझसे रघुवीरने हँसकर यह नहीं पूछा कि 'अरी माँ ! सुमित्रा माता कहाँ हैं ? अहो ! मेरे महासुख- को मानो विधाता ही नहीं देख सका' ॥ ३ ॥ [ ५२ ] जननी निरखति बान-धनुहियाँ । बार बार उर-नैननि लावति प्रभुजूकी ललित पनहियाँ ॥ १ ॥ कबहूँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सबारे । उठहु तात ! बलि मातु बदनपर, अनुज-सखा सब द्वारे ॥ २ ॥