गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
२३३ अयोध्याकाण्ड कौसल्याकी विरह-वेदना राग सोरठ [ ५१ ] आजुको भोर, और सो, मांई । सुनौं न द्वार बेद-बंदी-धुनि गुनिगन-गिरा सोहाई ॥ १ ॥ निज निज सुंदर पति-सदननितें रूप-सील-छबि छाईं । लेन असीस सीय आगे करि मोपै सुतबधू न आईं ॥ २ ॥ बूझी हौं न बिहँसि मेरे रघुबर 'कहाँ री ! सुमित्रा माता ?' ! तुलसी मनहु महासुख मेरो देखि न सकेउ बिधाता ॥ ३ ॥ [रामविरहसे व्याकुल होकर माता कौसल्या कह रही हैं—] अरी माई ! आजका भोर तो मुझे और ही तरहका जान पड़ता है। आज द्वारपर न तो वेद और वन्दीजनकी ही ध्वनि सुनायी देती है और न गुणियोंकी मनोहर वाणीका ही शब्द है ॥ १ ॥ अपने-अपने पतियोंके सुन्दर महलोंसे रूप, शील और छबिसे सम्पन्न मेरी पुत्रवधुएँ भी सीताको आगे कर आज मेरे पास आशीर्वाद लेनेके लिये नहीं आयीं ॥ २ ॥ आज मुझसे रघुवीरने हँसकर यह नहीं पूछा कि 'अरी माँ ! सुमित्रा माता कहाँ हैं ? अहो ! मेरे महासुख- को मानो विधाता ही नहीं देख सका' ॥ ३ ॥ [ ५२ ] जननी निरखति बान-धनुहियाँ । बार बार उर-नैननि लावति प्रभुजूकी ललित पनहियाँ ॥ १ ॥ कबहूँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सबारे । उठहु तात ! बलि मातु बदनपर, अनुज-सखा सब द्वारे ॥ २ ॥
गीतावली २३४ कबहुँ कहति यों, बड़ी बार भइ, जाहु भूप पहँ, भैया। बंधु बोलि जेँइय जो भावै, गई निछावरि मैया ॥ ३ ॥ कबहुँ समुझि बन-गवन रामको रहि चकि चित्र लिखी-सी। तुलसिदास वह समय कहेतें लागत प्रीति सिखी-सी ॥ ४ ॥ माता रघुनाथजीके खेल-कूदके धनुषको देखती हैं और प्रभुजी- की जो नन्ही-नन्ही सुन्दर जूतियाँ उन्हें बारम्बार हृदय और नेत्रोंसे लगाती हैं ॥ १ ॥ कभी पहलेकी भाँति सबेरे ही मन्दिरमें जाकर इस प्रकारके प्रिय वचन कहकर जगाने लगती हैं कि, 'हे तात ! उठो, मुखचन्द्रपर माता बलिहारी जाती है, देखो, सारे अनुज और सखा- गण द्वारपर खड़े हैं, ॥ २ ॥ और कभी कहती हैं—'भैया ! बहुत विलम्ब हो गया है, महाराजके पास जाओ और अपने साथियोंको बुलाकर जो रुचे सो भोजन करो, माता निछावर होती है' ॥ ३ ॥ तथा कभी रामका वनगमन स्मरण कर चकित होकर चित्रलिखित- सी रह जाती है। तुलसीदास कहते हैं, उस समयका वर्णन करनेसे तो प्रीति सीखी हुई-सी जान पड़ती है [क्योंकि सत्य प्रेम होनेपर तो उसका वर्णन ही नहीं हो सकेगा, चित्त विवश होकर विरहाग्निमें दग्ध हो जायगा] ॥ ४ ॥ [ ५३ ] माई री ! मोहि कोउ न समुझावै। राम-गवन साँचो किधौं सपनो, मन परतीति न आवै ॥ १ ॥ लगेइ रहत मेरे नैननि आगे राम-लषन अरु सीता। तदपि न मिटत दाह या उरकी, बिधि जो भयो बिपरीता ॥ २ ॥ दुख न रहै रघुपतिहि बिलोकत तनु न रहै बिनु देखे। करत न प्रान पयान, सुनहु सखि ! अरुझि परी यहि लेखे ॥ ३ ॥
३. किष्किन्धा एवं सुन्दरकाण्ड: सुग्रीव-मैत्री, विभीषण-शरण एवं लंका-दहन
२३५ अयोध्याकाण्ड कौसल्याके बिरह-बचन सुनि रोइ उठीं सब रानी । तुलसिदास रघुबीर-बिरहकी पीर न जाति बखानी ॥ ४ ॥ [माता कौसल्या कहती हैं—] 'अरी मैया ! मुझे कोई नहीं समझाता । मुझे अभीतक विश्वास नहीं होता कि रामका वनगमन सत्य है या कोई स्वप्न हुआ है ॥ १ ॥ राम, लक्ष्मण और सीता मेरे नेत्रोंके सामने सदा लगे ही रहते हैं, तो भी विधाता ऐसा विपरीत हो गया है कि इस हृदयका दाह दूर ही नहीं होता ॥ २ ॥ रघुनाथजीके देखनेपर तो दुःख नहीं रह सकता और बिना देखे शरीरका रहना असम्भव है। किन्तु मेरे प्राणोंने अभीतक कूच नहीं किया; अतः सखि ! सुनो, इस नियममें अवश्य कोई गड़बड़ हुई है ॥ ३ ॥ कौसल्याजीके ये विरहवाक्य सुनकर सब रानियाँ रो पड़ीं । तुलसीदास कहते हैं, रघुनाथजीके विरहकी व्यथाका वर्णन नहीं हो सकता ॥ ४ ॥ [ ५४ ] जब जब भवन बिलोकति सूनो । तब तब बिकल होति कौसल्या, दिनदिन प्रति दुख दूनो ॥ १ ॥ सुमिरत बाल-बिनोद रामके सुंदर मुनि-मन-हारी । होत हृदय श्रति सूल समुझि पदपंकज श्रजिर-बिहारी ॥ २ ॥ को अब प्रात कलेऊ मांगत रूठि चलैगो, माई ! स्याम-तामरस-नेन स्रवत जल काहि लेउँ उर लाई ॥ ३ ॥ जीवौं तौ बिपति सहौं निसिबासर, मरौं तौ मन पछितायो । चलत बिपिन भरि नयन रामको बदन न देखन पायो ॥ ४ ॥ तुलसिदास यह दुसह दसा श्रति, दारुन बिरहु घनेरो । दूरि करै को भूरि कृपा बिनु सोकजनित रुज मेरो ? ॥ ५ ॥
गीतावली २३६ माता कौसल्या जब-जब घरको सूना देखती हैं तब-तब व्याकुल हो जाती हैं। उन्हें दिन-दिन दूना दुःख हो रहा है ॥ १ ॥ वह भगवान् रामके मुनिमनहारी बालविनोदोंको याद करती हैं और (उनके) सुकुमार चरणकमलोंको राजमन्दिरके आंगनमें ही विचरनेवाले समझकर उनके हृदयमें बड़ी पीड़ा होती है ॥ २ ॥ [वे कहने लगती हैं-] अरी मैया ! अब प्रातःकाल होते ही कलेवा मांगकर [ उसमें देरी होनेपर ] कौन रूठकर भागेगा और श्यामकमलसदृश नेत्रोंसे जल बहते देखकर मैं किसे हृदयसे लगाऊँगी ! ॥ ३ ॥ अब मैं जीऊँगी तो रात-दिन दुःख सहना पड़ेगा और यदि मर गयी तो हृदयमें यह पश्चात्ताप रह जायगा कि 'वनको जाते समय मैं नेत्र भरकर रामका मुख भी न देख सकी' ॥ ४ ॥ यह दशा बड़ी ही दुःसह है, बड़ा ही कठोर विरह है, ऐसा कौन है जो अत्यन्त कृपाके बिना मेरी इस शोकजनित पीड़ा- को दूर कर सके ॥ ५ ॥ [ ५५ ] मेरो यह अभिलाषु बिधाता । कब पुरवै सखि सानुकूल ह्वै हरि सेवक-सुखदाता ॥ १ ॥ सीता-सहित कुसल कोसलपुर आवत हैं सुत दोऊ । श्रवन-सुधा-सम बचन सखी कब आइ कहैगो कोऊ ? ॥ २ ॥ सुनि संदेस प्रेम-परिपूरन संभ्रम उठि धावोंगी । बदन बिलोकि रोकि लोचन-जल हरषि हिये लावोंगी ॥ ३ ॥ जनकसुता कब सासु कहैं मोहि, राम लखन कहैं मैया । बाहु जोरि कब अजिर चलहिंगे स्याम-गौर दोउ भैया ॥ ४ ॥ तुलसिदास यहि भाँति मनोरथ करत प्रीति अति बढ़ी । थकित भई उर आनि राम-छबि मनहु चित्र लिखि काढ़ी ॥ ५ ॥
२३७ अयोध्याकाण्ड 'अरी सखि ! मेरी इस अभिलाषाको भक्तसुखदायक विधाता श्रीहरि अनुकूल होकर कब पूर्ण करेंगे ? ॥ १ ॥ हे सखि ! मेरे पास आकर कोई पुरुष कानोंको अमृतके समान प्रिय लगनेवाले ये वचन कब कहेगा कि सीताके सहित तुम्हारे दोनों पुत्र कुशलपूर्वक अयोध्यापुरीको आ रहे हैं' ॥ २ ॥ इस सन्देशको सुनकर मैं प्रेममें भरकर एक साथ उठकर दौड़ूँगी और उनके मुख देखकर नेत्रोंके प्रेमाश्रुओंको रोककर उन्हें हर्षपूर्वक हृदयसे लगा लूंगी ॥ ३ ॥ जनकनन्दिनी सीता मुझसे कब 'सासूजी' कहकर बोलेंगी और कब राम-लक्ष्मण मुझे 'मैया' कहकर पुकारेंगे ? और कब वे श्याम-गौर- वर्ण दोनों भाई बाँह-से-बाँह मिलाकर मेरे आँगनमें डोलेंगे ?' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं ऐसे मनोरथ करते-करते कौसल्याजीका स्नेह अत्यन्त बढ़ गया और वे हृदयमें रामचन्द्रजीकी छवि धारण कर थकित-सी रह गयीं, मानो चित्रमें लिखी हुई हों ॥ ५ ॥ महाराज दशरथका देहत्याग [ ५६ ] सुन्यौ जब फिरि सुमंत पुर आयो । कहिहै कहा, प्रानपतिकी गति, नृपति बिकल उठि धायो ॥ १ ॥ पाँय परत मंत्री अति ब्याकुल, नृप उठाय उर लायो । दसरथ-दसा देखि न कह्यो कछु, हरि जो संदेस पठायो ॥ २ ॥ बूझि न सकत कुसल प्रीतमकी, हृदय यहै पछितायो । साँचिहु सुत-बियोग सुनिबे कहँ धिग बिधि मोहि जिआयो ॥ ३ ॥ तुलसिदास प्रभु जानि निठुर हौं न्याय नाथ बिसरायो । हा रघुपति कहि पर्यो अवनि, जनु जलतें मीन बिलगायो ॥ ४ ॥
गीतावली २३८ महाराज दशरथने जब सुना कि सुमन्त अयोध्यामें लौट आया है तो इस उत्कण्ठासे कि 'देखें प्राणनाथ रामकी क्या दशा सुनाता है, वे व्याकुल होकर उठ दौड़े ॥ १ ॥ फिर मन्त्रीको अत्यन्त व्याकुल होकर अपने चरणोंमें गिरते देख राजाने उसे उठाकर हृदयसे लगा लिया और मन्त्रीने भी महाराज दशरथकी वह दीनदशा देखकर, भगवान्ने जो संन्देश भेजा था, उसके विषयमें कुछ भी न कहा ॥ २ ॥ महाराज भी अपने प्रियतम पुत्रकी कुशल नहीं पूछ सकते थे, क्योंकि उनके हृदयमें तो यही पछतावा था कि मुझे धिक्कार है जो विधाताने सचमुच ही पुत्रका वियोग सुननेके लिये मुझे जीवित रक्खा है ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, [महाराज दशरथ कहने लगे—] 'प्रभुने मुझे निष्ठुर जानकर मेरा जो परित्याग किया, वह उचित ही है।' और फिर 'हा रघुनाथ !' ऐसा कहकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो कोई मछली जलसे पृथक् कर दी गयी हो ॥ ४ ॥ [ ५७ ] मुएहु न मिटंगो मेरो मानसिक पछिताउ । नारिबस न बिचारि कीन्हौं काज, सोचत राउ ॥ १ ॥ तिलकको बोल्यो, दिये बन, चौगुनो चित चाउ । हृदय दाड़िम ज्यों न बिदरयो समुझि सील-सुभाउ ॥ २ ॥ सीय-रघुबर-लषन बिनु भय भभरि भगी न आउ । मोहि बूझि न परत, यातें कौन कठिन कुघाउ ॥ ३ ॥ सुनि सुमंत ! कि आनि सुंदर सुवन सहित जिआउ । दास तुलसी नतरु मोको मरन अमिय पिआउ ॥ ४ ॥ महाराज दशरथ सोचते हैं—'मैंने स्त्रीके वशीभूत होकर सोच- समझकर काम नहीं किया; इससे प्राप्त हुआ मेरा मानसिक पश्चात्ताप
२३६ अयोध्याकाण्ड मरनेपर भी दूर नहीं होगा ॥ १ ॥ देखो, मैंने रामको राजतिलकके लिये बुलाकर वनवास दे दिया, फिर भी उनके चित्तमें चौगुना उत्साह बना रहा ! उनका ऐसा शील और स्वभाव जानकर भी मेरा हृदय दाड़िम (अनार) के समान फट नहीं गया ॥ २ ॥ यदि सीता, राम और लक्ष्मणके बिना भी मेरी आयु भयसे घबड़ाकर नहीं भगी तो मुझे यह नहीं जान पड़ता कि इससे बढ़कर और कौन-सा कठोर घाव होगा ? ॥ ३ ॥ हे सुमन्त ! सुनो, या तो मेरे सुन्दर पुत्रोंको लाकर मुझे उनके साथ जीवित रक्खो, नहीं तो अब मुझे मृत्युरूप अमृतका ही पान करा दो' ॥ ४ ॥ [ ५८ ] अवधि बिलोकि हौं जीवत रामभद्र-बिहीन ! कहा करिहैं आइ सानुज भरत धरमधुरीन ॥ १ ॥ राम-सोक-सनेह-संकुल, तनु बिकल, मनु लीन । टूटि तारो गगन-मग ज्यों होत छिन-छिन छीन ॥ २ ॥ हृदय समुझि सनेह सादर प्रेम पावन मीन । करी तुलसीदास दसरथ प्रीति-परमिति पीन ॥ ३ ॥ 'अब मैं जीवित रहकर अयोध्याको मंगलमूर्ति रामके बिना देखूंगा । धर्मधुरन्धर भरतजी भी भाई शत्रुघ्नसहित आकर अब क्या करेंगे ?' ॥ १ ॥ इस प्रकार रघुनाथजीके वियोगसे शोक और उनके स्नेहसे संकुलित महाराज दशरथका शरीर व्याकुल है और मन डूबता जा रहा, जैसे टूटा हुआ तारा आकाशमार्गमें क्षण-क्षणमें क्षीण होता जाता है ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, महाराज दशरथ- ने मछलीके पवित्र प्रेम और स्नेहको हृदयमें आदरपूर्वक समझकर प्रीतिकी मर्यादाको ही दृढ़ किया ॥ ३ ॥
गीतावली २४० राग गौरी [ ५९ ] करत राउ मनमों अनुमान । सोक-बिकल, मुख बचन न आवै, बिछुरे कृपानिधान ॥ १ ॥ राज देन कहि बोलि नारि-बस मैं जो कह्यो बन जान । आयसु सिर धरि चले हरषि हिय कानन भवन समान ॥ २ ॥ ऐसे सुतके बिरह-अवधि लौं जौ राखौं यह प्रान । तौ मिटि जाइ प्रीतिकी परमिति, अजस सुनौं निज कान ॥ ३ ॥ राम गए अजहूँ हौं जीवत, समुझत हिय अकुलान । तुलसिदास तनु तजि रघुपति हित कियो प्रेम परवान ॥ ४ ॥ कृपानिधान भगवान् राम बिछुड़ गये । इससे महाराज दशरथ अत्यन्त शोकातुर हैं और उनके मुखसे वचन भी नहीं निकलता और वे मनमें अनुमान करते हैं— ॥ १ ॥ 'अहो ! मैंने राज्य देना कहकर जिस समय स्त्रीके वशीभूत हो बुलवाकर वन जानेके लिये कहा, उस समय जो मेरी आज्ञाको सिरपर धारण कर हृदयमें हर्षित हो वनको घरके समान चले गये ॥ २ ॥ ऐसे पुत्रके वियोगकी अवधितक यदि मैंने अपने प्राणोंको रक्खा तो प्रेमकी मर्यादा टूट जायगी और अपने ही कानोंसे मुझे अपयश भी सुनना पड़ेगा' ॥ ३ ॥ 'हाय ! रामके चले जानेपर भी मैं आजतक जीवित हूँ'—ऐसा समझकर उनका हृदय व्याकुल हो गया । तुलसीदासजी कहते हैं, तब उन्होंने रघुनाथजीके लिये अपना शरीर त्यागकर अपने प्रेमको प्रमाणित कर दिया ॥ ४ ॥
२४१ अयोध्याकाण्ड भरतजी अयोध्यामें [ ६० ] ऐसे तें क्यों कटु बचन कह्यो री ? 'राम जाहु कानन' कठोर तेरो कैसे धौं हृदय रह्यो, री ॥ १ ॥ दिनकर-बंस, पिता दसरथ-से, राम-लषन-से भाई । जननी ! तू जननी ? तौ कहा कहौं, बिधि केहि खोरि न लाई? ॥ २ ॥ हौं लहिहौं सुख राजमातु ह्वै, सुत सिर छत्र धरैगो । कुल-कलंक मल-मूल, मनोरथ तव बिनु कौन करैगो ? ॥ ३ ॥ ऐहैं राम, सुखी सब ह्वैहैं, ईस अजस मेरो हरिहैं । तुलसिदास मोको बड़ो सोच है, तू जनम कौनि बिधि भरिहै ॥ ४ ॥ [महाराज दशरथके प्राण-त्यागके अनन्तर जब भरतजी अयोध्यामें आये तो उन्हें सारे समाचार विदित हुए । उस समय वे अपनी माता कैकेयीसे कहते हैं—] 'अरी ! तूने 'राम ! तुम वन- को जाओ' ऐसे कठोर वचन कैसे कहे ? उस समय तेरा हृदय ऐसा कठोर कैसे हो गया ? ॥ १ ॥ हाय ! सूर्यकुल-जैसा वंश, महाराज दशरथ-से पिता और राम-लक्ष्मण-जैसे भाई मिले ! और माता ! तू माता हुई ! इसमें मैं क्या कहूँ ? विधाता किसको दोष नहीं लगाता ? ॥ २ ॥ 'मैं राजमाता होकर सुख भोगूंगी और पुत्र अपने सिरपर छत्र धारण करेगा' ऐसा कुलके लिये कलङ्करूप और पापमय मनोरथ तेरे बिना और कौन कर सकता है ? ॥ ३ ॥ भगवान् राम तो फिर लौट ही आवेंगे और सब लोग सुखी भी हो जायेंगे तथा विधाता मेरे अपयशको भी दूर कर देंगे ! परन्तु मुझे बड़ा भारी सोच तो यही है कि तू किस प्रकार अपना जीवन काटेगी ?' ॥ ४ ॥ गी० १६—
गीतावली २४२ [ ६१ ] ताते हौं देत न दूषन तोहू। रामबिरोधी उर कठोरतें प्रगट कियो है बिधि मोहू ॥ १ ॥ सुंदर सुखद सुसील सुधानिधि, जरनि जाइ जिहि जोए। बिष-बारुनी-बंधु कहियत बिधु ! नातो मिटत न धोए ॥ २ ॥ होते जौ न सुजान-सिरोमनि राम सबके मन माहीं। तौ तोरी करतूति, मातु ! सुनि प्रीति-प्रतीति कहा ही ? ॥ ३ ॥ मृदु, मंजुल सींची-सनेह सुचि सुनत भरत-बर-बानी। तुलसी 'साधु-साधु' सुर-नर-मुनि कहत प्रेम पहिचानी ॥ ४ ॥ विधाताने मुझे भी तेरे रामविरोधी कठोर हृदयसे उत्पन्न किया है इसलिये [तेरा ही होनेके कारण] मैं तो तुझे भी दोष नहीं दे सकता ॥ १ ॥ देखो, जिसे देखनेसे ही सब प्रकारका ताप शान्त हो जाता है, वह चन्द्रमा सुन्दर, सुखदायक, शीतल और अमृतका भण्डार है तो भी उसे विष और वारुणीका बन्धु कहा जाता है ! सच है, नाता धोनेसे नहीं मिटता ॥ २ ॥ यदि सुजानशिरोमणि भगवान् राम सबके मनमें न बसे होते तो हे माता ! तेरी करतूतको सुनकर ही प्रभुको मेरी प्रीति और प्रतीति कैसे हो सकती थी ? [अर्थात् राम सर्वान्तर्यामी हैं, इसलिये तेरी ऐसी कुचाल होनेपर भी वे अपने प्रति मेरे स्नेह और विश्वासको जानते हैं] ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, भरतजीकी यह अत्यन्त मधुर, मनोहर, स्नेहसनी पवित्र वाणी सुनकर उनके प्रेमको पहचानकर देवता, मनुष्य और मुनिजन 'साधु-साधु' कहने लगे ॥ ४ ॥
२४३ अयोध्याकाण्ड [ ६२ ] जो पैंहौं मातु मते महँ ह्वैहौं । तौ जननी ! जगमें या मुखकी कहाँ कालिमा ध्वैहौं ? ॥ १ ॥ क्यों हौं आजु होत सुचि सपथनि ? कौन मानिहै सांची ? । महिमा-मृगी कौन सुकृतीकी खल-बच-बिसिखन बांची ? ॥ २ ॥ गहि न जाति रसना काहूकी, कहौं जाहि जोइ सूझै । दीनबन्धु कारुण्य-सिंधु बिनु कौन हियेकी बूझै ? ॥ ३ ॥ तुलसी रामबियोग विषम बिष बिकल नारि-नर भारी । भरत-सनेह-सुधा सींचे सब भए तेहि समय सुखारी ॥ ४ ॥ [भरतजी माता कौसल्यासे कहते हैं—] 'मातः ! यदि मैं अपनी माताके मतमें सहमत होऊँ तो अब संसारमें इस मुखकी कालिमाको कहाँ धो सकूँगा ? ॥ १ ॥ आज सौगन्ध खानेसे मैं कैसे निर्दोष हो सकता हूँ ? मेरी बातको सच भी कौन मानेगा ? भला, किस पुण्यवान्की महिमारूप मृगी दुष्टोंके बाग्बाणोंसे विद्ध हुए बिना बची ? ॥ २ ॥ किसीकी जीभ नहीं पकड़ी जा सकती, इसलिये जिसको जैसा सूझता हो वह वैसा ही कहे । मेरे हृदयकी बात तो करुणासागर दीनबन्धु भगवान् रामके बिना और कौन जानेगा ?' ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, श्रीरामके वियोगरूप विषम विषसे सब नर-नारी बहुत व्याकुल हो रहे थे । उस समय भरतजीके स्नेहरूप अमृतसे सींचे जाकर वे सब सुखी हो गये ॥ ४ ॥ [ ६३ ] काहेको खोरि केंकयिहि लावौं ? धरहु धीर, बलि जाउँ तात ! मोको आज बिधाता बावौं ॥ १ ॥
गीतावली २४४ सुनिबे जोग बियोग रामको हौं न होउँ मेरे प्यारे । सो मेरे नयननि आगेतें रघुपति बनहि सिधारे ॥ २ ॥ तुलसिदास समुझाइ भरत कहँ, आँसु पोंछि उर लाए । उपजी प्रीति जानि प्रभुके हित, मनहु राम फिरि आए ॥ ३ ॥ [माता कौसल्या कहती हैं—] 'बेटा ! मैं कैकेयीको क्यों दोष लगाऊँ ? मैं बलिहारी जाती हूँ, तुम धैर्य धारण करो । आज विधाता ही मुझपर टेढ़ा है ॥ १ ॥ हे मेरे प्रियपुत्र ! मैं रघुनाथजीका वियोगतक भी सुननेके योग्य नहीं थी, पर इस समय मेरे नेत्रोंके सामने ही वे वनको चले गये' ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस प्रकार भरतजीको समझाकर माताने उनके आँसू पोंछकर उन्हें हृदयसे लगा लिया । उन्हें रामका सुहृद् समझकर माताको ऐसी प्रीति उत्पन्न हुई, मानो रघुनाथजी ही लौट आये हों ॥ ३ ॥ भरतजीका चित्रकूटको प्रस्थान [ ६४ ] मेरो अवध धौं कहहु, कहा है । करहु राज रघुराज-चरन तजि, लै लटि लोगु रहा है ॥ १ ॥ धन्य मातु, हौं धन्य, लागि जेहि राज-समाज दहा है । तापर मोको प्रभु करि चाहत सब बिनु वहन वहा है ॥ २ ॥ राम-सपथ, कोउ कछू कहै जनि, मैं दुख दुसह सहा है । चित्रकूट चलिए सब मिलि, बलि छमिए मोहि हहा है ॥ ३ ॥ यों कहि भोर भरत गिरिवरको मारग बूझि गहा है । सकल सराहत, एक भरत जग जनमि सुलाहु लहा है ॥ ४ ॥ जानहि सिय-रघुनाथ भरतको सील सनेह महा है । कैं तुलसी जाको राम-नामसों प्रेम-नेम निबहा है ॥ ५ ॥
२४५ अयोध्याकाण्ड [भरतजी कहते हैं—] बताओ तो अयोध्यामें मेरा क्या है ? लोग कहते हैं कि रघुनाथजीके चरणोंको त्याग कर राज्य करो; ये सब-के-सब इसी धुनमें लगे हुए हैं ॥ १ ॥ मेरी माता धन्य है ! और धन्य हूँ मैं, जिसके लिये यह सारा राजसमाज ध्वंस किया गया है ! तिसपर भी मुझे अपना राजा बनाकर आपलोग बिना अग्निके ही दग्ध होना चाहते हैं ॥ २ ॥ आप सबको रघुनाथजीकी सौगन्ध है, अब मुझसे कोई कुछ न कहे । मैंने बड़ा असह्य दुःख सहन किया है । मैं बलिहारी जाता हूँ, आइये, सब लोग मिलकर चित्रकूटको चलें । मैं हा हा खाता हूँ, आपलोग मुझे क्षमा कीजिये ॥ ३ ॥ ऐसा कहकर सबेरा होते ही भरतजीने चित्रकूटका मार्ग पूछकर उसे ग्रहण किया । उस समय सब लोग उनकी प्रशंसा करने लगे कि ‘संसारमें जन्म लेकर एकमात्र भरतजीने ही सच्चा लाभ उठाया है’ ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भरतजीके महान् शील और स्नेहको या तो राम और सीता जानते हैं और या वे लोग जानते हैं जिनका रामनामसे प्रेम और नेम लगा हुआ है ॥ ५ ॥ [ ६५ ] भाई ! हौं अवध कहा रहि लैहौं । राम-लषन-सिय चरन बिलोकत काल्हि काननहि जैहौं ॥ १ ॥ जद्यपि मोंतें, कैं कुमाततें ह्वै आई अति पोंची । सनमुख गए सरन राखिहेंगे रघुपति परम संकोची ॥ २ ॥ तुलसी यों कहि चले भोरही, लोग बिकल सँग लागे । जनु बन जरत देखि दारुन दव निकसि बिहँग-मृग भागे ॥ ३ ॥
गीतावली २४६ 'भाई ! मैं अयोध्यामें रहकर क्या लूँगा ? मैं तो राम, लक्ष्मण और सीताजी के चरण देखनेके लिये कल ही वनको प्रस्थान करूँगा ॥ १ ॥ यद्यपि मुझसे या मेरी कुटिल मातासे बड़ी बुरी बान बन गयी है तो भी परम संकोची भगवान् राम अपने सामने आया देख- कर मुझे अवश्य अपनी शरणमें रख लेंगे' ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, ऐसा कहकर भरतजी प्रातःकाल होते ही वनको चल दिये तथा अन्य लोग भी व्याकुल होकर उसके साथ हो लिये, जैसे वनको भयंकर दावानलसे जलता देखकर पक्षी और मृग उससे निकलकर भागने लगते हैं ॥ ३ ॥ [ ६६ ] सुकसों गहबर हिये कहै सारो । बीर कीर ! सिय-राम-लखन बिनु लागत जग अँधियारो ॥ १ ॥ पापिनि चेरि, अयानि रानि, नृप हित-अनहित न बिचारो । कुलगुर-सचिव-साधु सोचतु, बिधि को त बसाइ उजारो ? ॥ २ ॥ अवलोके न चलत भरि लोचन, नगर कोलाहल भारो । सुने न बचन करुना करके, जब पुर-परिवार संभारो ॥ ३ ॥ भैया भरत भायतेके, सँग वन सब लोग सिधारो । लुन पंख बाढ़ पींजरनि तरसत अधिक अभाग हमारो ॥ ४ ॥ सुनि खग कहत अंब ! मौंगी रहि समुझि प्रेमपथ न्यारो । गए ते प्रभुहि पहुंचाइ फिरे पुनि करत करम-गुन गारो ॥ ५ ॥ जीवन जग जानकी-लखनको, मरन महीप सँवारो । तुलसी और प्रीतिकी चरचा करत, कहा कछु चारो ॥ ६ ॥ (इस समय) एक सारिका (मैना) हृदय भरकर शुकसे कहने लग— 'भैया कीर ! सीता, राम और लक्ष्मणके बिना तो सारा
२४७ अयोध्याकाण्ड संसार अन्धकारमय जान पड़ता है ॥ १ ॥ दासी मन्थरा बड़ी पापिनी है, रानी कैकेयी भी बड़ी ही मूर्खा है, राजाने भी हिताहितका कोई विचार नहीं किया । इसीसे कुलगुरु वसिष्ठजी, मन्त्रिमण्डल और साधुजन सोचते हैं कि 'विधाताने किसे बसाकर नहीं उजाड़ा ?' ॥ २ ॥ हमने तो जाते समय उन्हें नेत्र भरकर देखा भी नहीं और जिस समय उन्होंने अपने नगर और परिवारकी सँभाल की थी, उस समय नगरमें भारी कोलाहल होनेके कारण हम करुणाधाम भगवान् रामके वचन भी नहीं सुन सके ॥ ३ ॥ अब प्यारे भाई भरतके साथ सब लोग वनको जा रहे हैं; परन्तु हम पंख पाकर भी पिंजरोंमें पड़े तरस रहे हैं—'यह हमारा बड़ा भारी दुर्भाग्य ही है' ॥ ४ ॥ सारिकाके ये वचन सुनकर तोता बोला—'अरी मैया ! प्रेमका पंथ निराला समझकर तू मौन हो रह । देख, जो उनके साथ गये थे वे भी प्रभुको वनमें पहुँचाकर कर्म (भाग्य) के गुणों- की निन्दा करते हुए फिर लौट आये ॥ ५ ॥ संसारमें जीवन तो सीता और लक्ष्मणका ही है तथा मरण केवल महाराजने सुधारा है और सब तो प्रेमकी चर्चा ही करते हैं और इसके सिवा उनके लिये कोई चारा भी नहीं है [क्योंकि न तो वे वनहीको जा सकते हैं और न प्राण ही त्याग सकते हैं] ॥ ६ ॥ [ ६७ ] कहै सुक, सुनहि सिखावन, सारो ! बिधि-करतब बिपरीत बाम गति, राम-प्रेम-पथ न्यारो ॥ १ ॥ को नर-नारि अवध खग-मृग, जेहि जीवन रामतें प्यारो । बिद्यमान सबके गवने बन, बंदन करमको कारो ॥ २ ॥
गीतावली २४८ अंब अनुज, प्रिय सखा, सुसेवक देखि बिषाद बिसारो । पंछी परबस परे पींजरनि, लेखो कौन हमारो ॥ ३ ॥ रही नृपकी, बिगरी है सबकी, अब एक सँवार निहारो । तुलसी प्रभु निज चरन-पीठ मिस भरत-प्रान रखवारो ॥ ४ ॥ शुक कहता है, 'अरी सारिका ! तू मेरी शिक्षा सुन । विधाताके विपरीत होनेसे कर्मकी गति भी विपरीत हो जाती है, किन्तु रामके प्रेमका मार्ग तो इससे निराला ही है ॥ १ ॥ भला, अयोध्यामें ऐसा कौन नर-नारी अथवा पशु-पक्षी है जिसे अपना जीवन रामसे अधिक प्रिय हो ? किन्तु वे सबके रहते हुए ही वनको चले गये; इससे कर्मका ही मुख काला हुआ ॥ २ ॥ यह सब देखकर भी माता, भाई, प्रिय, मित्र और अच्छे-अच्छे सेवक भी उस दुःखको भूल गये ! फिर पिंजरोंमें परतन्त्र पड़े हुए हम पक्षियोंकी तो बात ही क्या है ? ॥ ३ ॥ बात तो राजाकी रही और सबकी बिगड़ गयी । परन्तु देखो, अब एक बात बन गयी है । तुलसीदास कहते हैं, प्रभुने अपनी चरणपादुकाओंके मिससे भरतजीके प्राणोंका रख- वाला नियुक्त कर दिया है ॥ ४ ॥ [ ६८ ] ता दिन सृंगबेरपुर आए। राम-सखा ते समाचार सुनि बारि बिलोचन छाए ॥ १ ॥ कुस-साथरी देखि रघुपतिकी हेतु अपनपौ जानी । कहत कथा सिय-राम-लषनकी बैठेहि रैनि बिहानी ॥ २ ॥ भोरहि भरद्वाज आश्रम ह्वै, करि निषादपति आगे। चले जनु तक्यो तड़ाग तृषित गज घोर घामके लागे ॥ ३ ॥
२४६ अयोध्याकाण्ड बूझत 'चित्रकूट कहँ' जेहि तेहि, मुनि बालकनि बतायो । तुलसी मनहु फनिक मनि ढूंढत, निरखि हरषि हियँ धायो ॥ ४ ॥ उस दिन भरतजी शृङ्गवेरपुर पहुँचे । वहाँ रामचन्द्रजीके सखा गुहसे प्रभुके समाचार पाकर उनके नेत्रोंमें जल भर आया ॥ १ ॥ वहाँ रघुनाथजीकी कुशविरचित शय्या देखकर और उसमें अपनेको ही हेतु समझकर उन्होंने वह सारी रात्रि सीता, राम और लक्ष्मण- जीकी बातें करने-करते बैठे-बैठे ही बिता दीं ॥ २ ॥ प्रातःकाल होते ही वे निषादराजको आगे कर भरद्वाज ऋषिके आश्रमकी ओर चले, मानो किसी तृषातुर गजने दारुण घामके लगनेपर किसी तड़ागको देख लिया हो ॥ ३ ॥ फिर जहाँ-तहाँ मुनियोंके बालकोंसे यह पूछनेपर कि 'चित्रकूट कहाँ है ?' उन्होंने उसका पता बतला दिया । तुलसीदास कहते हैं, उसे देखकर उन्हें ऐसा आनन्द हुआ जैसे कोई-कोई सर्प मणिको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उसे देख लेनेपर मारे हर्षके दौड़ता है ॥ ४ ॥ राम-भरत-सम्मेलन राग केदारा [ ६९ ] बिलोके दूरितें दोउ बीर । उर आयत, आजानु सुभग भुज, स्यामल-गौर सरीर ॥ १ ॥ सीस जटा, सरसीरुह लोचन, बने परिघान मुनिचीर । निकट निषंग, संग सिय सोभित, करनि धुनत धनु-तीर ॥ २ ॥ मन अगहुँड़, तनु पुलक सिथिल भयो, नलिन-नयन भरे नीर । गड़त गोड़ मानो सकुच-पंक महँ, कढ़त प्रेम-बल धीर ॥ ३ ॥
गीतावली २५० तुलसिदास दसा देखि भरतकी उठि धाए अतिहि अधीर । लिये उठाइ उर लाइ कृपानिधि विरह-जनित हरि पीर ॥ ४ ॥ भरतजीने दूरहीसे दोनों भाइयोंको देखा। उनके विशाल वक्षःस्थल हैं, जानुपर्यन्त लम्बायमान सुन्दर भुजाएँ हैं तथा श्याम और गौर शरीर हैं ॥ १ ॥ उनके सिरपर जटाएँ हैं, कमलके समान नेत्र हैं और वे मुनिवस्त्र धारण किये हैं। उनके पासहीमें तर्कस रखे हुए हैं, संगमें सीताजी शोभायमान हैं तथा हाथोंसे वे धनुष और बाणोंको हिला रहे हैं ॥ २ ॥ प्रभुको देखकर भरतजीका मन तो आगे बढ़नेके लिये उतावला हो रहा है; किन्तु शरीर रोमाञ्चित होकर शिथिल हो गया है और नेत्रकमलोंमें जल भर आया है। पैर मानो संकोचरूप दलदलमें गड़ जाते हैं और उन्हें वे प्रेमके बलसे धैर्यपूर्वक बाहर निकालते हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, भरतजीकी यह दशा देखकर भगवान् प्रेमसे अधीर होकर उनकी ओर उठकर दौड़े और उनकी विरह-व्यथाको दूर कर कृपानिधान प्रभुने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥ ४ ॥ [ ७० ] भरत भए ठाढ़े कर जोरि । ह्वै न सकत सामुहें सकुचबस समुझि मातुकृत खोरि ॥ १ ॥ फिरिहैं किधौं फिरन कहिहैं प्रभु कलपि कुटिलता मोरि । हृदय सोच, जल भरे बिलोचन, नेह देह भइ भोरि ॥ २ ॥ बनबासी, पुरलोग, महामुनि किए हैं काठके-से कोरि । दै दै श्रवन सुनिबेको जहँ तहँ रहे प्रेम मन बोरि ॥ ३ ॥ तुलसी राम-सुभाव सुमिरि, उर धरि धीरजहि बहोरि । बोले बचन बिनीत उचित हित करुना-रसहि निचोरि ॥ ४ ॥
२५१ अयोध्याकाण्ड तब भरतजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये। माताकी कुचाल समझकर वे संकोचवश प्रभुके सामने खड़े नहीं हो सकते थे॥ १ ॥ उनके नेत्रोंमें जल भरा हुआ था, शरीर स्नेहवश शिथिल हो रहा था और चित्तमें यही सोच-विचार था कि 'न जाने प्रभु फिरेंगे अथवा मेरी कुटिलता समझकर मुझे ही लौट जानेको कह देंगे?' ॥ २ ॥ वनवासी, पुरजन तथा बड़े-बड़े मुनिलोग काठसे गढ़कर बनाये हुए-से हो रहे हैं और जहाँ-तहाँ मनको प्रेम-रसमें डुबोकर अपने कान लगाये सुननेके लिये खड़े हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इसी समय भरतजी रामचन्द्रजीके स्वभावका स्मरण कर हृदयमें धैर्य धारण कर करुणारससे भरे हुए अति विनीत, हितकारी और उचित वचन बोले ॥ ४ ॥ [ ७१ ] जानत हौ सबहीके मनकी। तदपि, कृपालु ! करौं बिनती सोइ सादर सुनहु दीन-हित जनकी ॥ १ ॥ ए सेवक संतत अनन्य गति, ज्यो चातकहि एक गति घनकी। यह बिचारि गवनहु पुनीत पुर, हरहु दुसह आरति परिजनकी ॥ २ ॥ मेरो जीवन जानिय ऐसोइ, जियै जैसो अहि, जासु गई मनि फनकी। मेटहु कुल कलंक कोसलपति, आज्ञा देहु-नाथ मोहि बनकी ॥ ३ ॥ मोको जोइ लाइय लागै सोइ, उत्पति है कुमातुतें तनकी। तुलसिदास सब दोष दूरि करि प्रभु अब लाज करहु निज पनकी॥ ४ ॥ कृपालो ! आप सबके मनकी बात जानते हैं, तो भी मैं आदरपूर्वक कुछ विनय करता हूँ। आप दीनहितकारी हैं, अतः इस सेवककी वह विनय सुनिये ॥ १ ॥ 'ये अयोध्यावासी सदा आपके ही अनन्य दास हैं, [इनका कोई और अवलम्ब नहीं है] जैसे पपीहेको एकमात्र मेघका ही आश्रय रहता है, ऐसा सोचकर
गीतावली २५२ आप उस पवित्र पुरीमें पधारिये और अपने आत्मीयोंके दुःसह दुःखको दूर कीजिये ॥ २ ॥ मेरा जीवन भी ऐसा ही समझिये जैसे कोई सर्प फणकी मणि खो जानेपर जीवित रहता हो। कोसलनाथ ! आप [ बड़े भाईके रहते हुए छोटेको राज्य मिलनारूप ] यह कुलका कलंक नष्ट कीजिये और अपने बदले मुझे वन जानेकी आज्ञा दीजिये ॥ ३ ॥ और मुझे तो जो भी दोष लगाया जाय वही लग सकता है, क्योंकि इस शरीरकी उत्पत्ति कुमातासे हुई है । किन्तु प्रभो ! आप तो मेरे सब अपराधोंको भूलकर अपने विरद [शरणागतपालकत्व] की ही लाज रखिये ॥ ४ ॥ [ ७२ ] तात ! विचारो धौं, हौं क्यों आवौं । तुम्ह सुचि, सुहृद, सुजान सकल बिधि, बहुत कहा कहि कहि समुझावौं ॥ १ ॥ निज कर खाल खेंचि या तनुतें जो पितु पग पानह करावौं । होउँ न उरिन पिता दसरथतें, कैसे ताके बचन मेटि पति पावौं ॥ २ ॥ तुलसिदास जाको सुजस तिहूँ पुर, क्यों तेहि कुलहि कालिमा लावौं । प्रभु-रुख निरख निरास भरत भए, जान्यो है सबहि भाँति बिधि बाधौं ॥ ३ ॥ [इसपर रघुनाथजी कहने लगे—] 'भैया ! सोचो, तो मैं 'किस प्रकार लौट सकता हूँ ? तुम सब प्रकार निर्दोष, सुहृद् और समझदार हो । तुम्हें बहुत कहकर क्या समझाऊँ ? ॥ १ ॥ यदि मैं अपने हाथसे ही इस शरीरकी खाल खींचकर पिताजीके चरणोंकी जूतियाँ बनवाऊँ तो भी पिता दशरथजीसे मैं उऋण नहीं हो सकता;