गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४५ अयोध्याकाण्ड [भरतजी कहते हैं—] बताओ तो अयोध्यामें मेरा क्या है ? लोग कहते हैं कि रघुनाथजीके चरणोंको त्याग कर राज्य करो; ये सब-के-सब इसी धुनमें लगे हुए हैं ॥ १ ॥ मेरी माता धन्य है ! और धन्य हूँ मैं, जिसके लिये यह सारा राजसमाज ध्वंस किया गया है ! तिसपर भी मुझे अपना राजा बनाकर आपलोग बिना अग्निके ही दग्ध होना चाहते हैं ॥ २ ॥ आप सबको रघुनाथजीकी सौगन्ध है, अब मुझसे कोई कुछ न कहे । मैंने बड़ा असह्य दुःख सहन किया है । मैं बलिहारी जाता हूँ, आइये, सब लोग मिलकर चित्रकूटको चलें । मैं हा हा खाता हूँ, आपलोग मुझे क्षमा कीजिये ॥ ३ ॥ ऐसा कहकर सबेरा होते ही भरतजीने चित्रकूटका मार्ग पूछकर उसे ग्रहण किया । उस समय सब लोग उनकी प्रशंसा करने लगे कि ‘संसारमें जन्म लेकर एकमात्र भरतजीने ही सच्चा लाभ उठाया है’ ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भरतजीके महान् शील और स्नेहको या तो राम और सीता जानते हैं और या वे लोग जानते हैं जिनका रामनामसे प्रेम और नेम लगा हुआ है ॥ ५ ॥ [ ६५ ] भाई ! हौं अवध कहा रहि लैहौं । राम-लषन-सिय चरन बिलोकत काल्हि काननहि जैहौं ॥ १ ॥ जद्यपि मोंतें, कैं कुमाततें ह्वै आई अति पोंची । सनमुख गए सरन राखिहेंगे रघुपति परम संकोची ॥ २ ॥ तुलसी यों कहि चले भोरही, लोग बिकल सँग लागे । जनु बन जरत देखि दारुन दव निकसि बिहँग-मृग भागे ॥ ३ ॥