गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २४४ सुनिबे जोग बियोग रामको हौं न होउँ मेरे प्यारे । सो मेरे नयननि आगेतें रघुपति बनहि सिधारे ॥ २ ॥ तुलसिदास समुझाइ भरत कहँ, आँसु पोंछि उर लाए । उपजी प्रीति जानि प्रभुके हित, मनहु राम फिरि आए ॥ ३ ॥ [माता कौसल्या कहती हैं—] 'बेटा ! मैं कैकेयीको क्यों दोष लगाऊँ ? मैं बलिहारी जाती हूँ, तुम धैर्य धारण करो । आज विधाता ही मुझपर टेढ़ा है ॥ १ ॥ हे मेरे प्रियपुत्र ! मैं रघुनाथजीका वियोगतक भी सुननेके योग्य नहीं थी, पर इस समय मेरे नेत्रोंके सामने ही वे वनको चले गये' ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस प्रकार भरतजीको समझाकर माताने उनके आँसू पोंछकर उन्हें हृदयसे लगा लिया । उन्हें रामका सुहृद् समझकर माताको ऐसी प्रीति उत्पन्न हुई, मानो रघुनाथजी ही लौट आये हों ॥ ३ ॥ भरतजीका चित्रकूटको प्रस्थान [ ६४ ] मेरो अवध धौं कहहु, कहा है । करहु राज रघुराज-चरन तजि, लै लटि लोगु रहा है ॥ १ ॥ धन्य मातु, हौं धन्य, लागि जेहि राज-समाज दहा है । तापर मोको प्रभु करि चाहत सब बिनु वहन वहा है ॥ २ ॥ राम-सपथ, कोउ कछू कहै जनि, मैं दुख दुसह सहा है । चित्रकूट चलिए सब मिलि, बलि छमिए मोहि हहा है ॥ ३ ॥ यों कहि भोर भरत गिरिवरको मारग बूझि गहा है । सकल सराहत, एक भरत जग जनमि सुलाहु लहा है ॥ ४ ॥ जानहि सिय-रघुनाथ भरतको सील सनेह महा है । कैं तुलसी जाको राम-नामसों प्रेम-नेम निबहा है ॥ ५ ॥