भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

२४३ अयोध्याकाण्ड [ ६२ ] जो पैंहौं मातु मते महँ ह्वैहौं । तौ जननी ! जगमें या मुखकी कहाँ कालिमा ध्वैहौं ? ॥ १ ॥ क्यों हौं आजु होत सुचि सपथनि ? कौन मानिहै सांची ? । महिमा-मृगी कौन सुकृतीकी खल-बच-बिसिखन बांची ? ॥ २ ॥ गहि न जाति रसना काहूकी, कहौं जाहि जोइ सूझै । दीनबन्धु कारुण्य-सिंधु बिनु कौन हियेकी बूझै ? ॥ ३ ॥ तुलसी रामबियोग विषम बिष बिकल नारि-नर भारी । भरत-सनेह-सुधा सींचे सब भए तेहि समय सुखारी ॥ ४ ॥ [भरतजी माता कौसल्यासे कहते हैं—] 'मातः ! यदि मैं अपनी माताके मतमें सहमत होऊँ तो अब संसारमें इस मुखकी कालिमाको कहाँ धो सकूँगा ? ॥ १ ॥ आज सौगन्ध खानेसे मैं कैसे निर्दोष हो सकता हूँ ? मेरी बातको सच भी कौन मानेगा ? भला, किस पुण्यवान्की महिमारूप मृगी दुष्टोंके बाग्बाणोंसे विद्ध हुए बिना बची ? ॥ २ ॥ किसीकी जीभ नहीं पकड़ी जा सकती, इसलिये जिसको जैसा सूझता हो वह वैसा ही कहे । मेरे हृदयकी बात तो करुणासागर दीनबन्धु भगवान् रामके बिना और कौन जानेगा ?' ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, श्रीरामके वियोगरूप विषम विषसे सब नर-नारी बहुत व्याकुल हो रहे थे । उस समय भरतजीके स्नेहरूप अमृतसे सींचे जाकर वे सब सुखी हो गये ॥ ४ ॥ [ ६३ ] काहेको खोरि केंकयिहि लावौं ? धरहु धीर, बलि जाउँ तात ! मोको आज बिधाता बावौं ॥ १ ॥