गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २४२ [ ६१ ] ताते हौं देत न दूषन तोहू। रामबिरोधी उर कठोरतें प्रगट कियो है बिधि मोहू ॥ १ ॥ सुंदर सुखद सुसील सुधानिधि, जरनि जाइ जिहि जोए। बिष-बारुनी-बंधु कहियत बिधु ! नातो मिटत न धोए ॥ २ ॥ होते जौ न सुजान-सिरोमनि राम सबके मन माहीं। तौ तोरी करतूति, मातु ! सुनि प्रीति-प्रतीति कहा ही ? ॥ ३ ॥ मृदु, मंजुल सींची-सनेह सुचि सुनत भरत-बर-बानी। तुलसी 'साधु-साधु' सुर-नर-मुनि कहत प्रेम पहिचानी ॥ ४ ॥ विधाताने मुझे भी तेरे रामविरोधी कठोर हृदयसे उत्पन्न किया है इसलिये [तेरा ही होनेके कारण] मैं तो तुझे भी दोष नहीं दे सकता ॥ १ ॥ देखो, जिसे देखनेसे ही सब प्रकारका ताप शान्त हो जाता है, वह चन्द्रमा सुन्दर, सुखदायक, शीतल और अमृतका भण्डार है तो भी उसे विष और वारुणीका बन्धु कहा जाता है ! सच है, नाता धोनेसे नहीं मिटता ॥ २ ॥ यदि सुजानशिरोमणि भगवान् राम सबके मनमें न बसे होते तो हे माता ! तेरी करतूतको सुनकर ही प्रभुको मेरी प्रीति और प्रतीति कैसे हो सकती थी ? [अर्थात् राम सर्वान्तर्यामी हैं, इसलिये तेरी ऐसी कुचाल होनेपर भी वे अपने प्रति मेरे स्नेह और विश्वासको जानते हैं] ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, भरतजीकी यह अत्यन्त मधुर, मनोहर, स्नेहसनी पवित्र वाणी सुनकर उनके प्रेमको पहचानकर देवता, मनुष्य और मुनिजन 'साधु-साधु' कहने लगे ॥ ४ ॥