गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४१ अयोध्याकाण्ड भरतजी अयोध्यामें [ ६० ] ऐसे तें क्यों कटु बचन कह्यो री ? 'राम जाहु कानन' कठोर तेरो कैसे धौं हृदय रह्यो, री ॥ १ ॥ दिनकर-बंस, पिता दसरथ-से, राम-लषन-से भाई । जननी ! तू जननी ? तौ कहा कहौं, बिधि केहि खोरि न लाई? ॥ २ ॥ हौं लहिहौं सुख राजमातु ह्वै, सुत सिर छत्र धरैगो । कुल-कलंक मल-मूल, मनोरथ तव बिनु कौन करैगो ? ॥ ३ ॥ ऐहैं राम, सुखी सब ह्वैहैं, ईस अजस मेरो हरिहैं । तुलसिदास मोको बड़ो सोच है, तू जनम कौनि बिधि भरिहै ॥ ४ ॥ [महाराज दशरथके प्राण-त्यागके अनन्तर जब भरतजी अयोध्यामें आये तो उन्हें सारे समाचार विदित हुए । उस समय वे अपनी माता कैकेयीसे कहते हैं—] 'अरी ! तूने 'राम ! तुम वन- को जाओ' ऐसे कठोर वचन कैसे कहे ? उस समय तेरा हृदय ऐसा कठोर कैसे हो गया ? ॥ १ ॥ हाय ! सूर्यकुल-जैसा वंश, महाराज दशरथ-से पिता और राम-लक्ष्मण-जैसे भाई मिले ! और माता ! तू माता हुई ! इसमें मैं क्या कहूँ ? विधाता किसको दोष नहीं लगाता ? ॥ २ ॥ 'मैं राजमाता होकर सुख भोगूंगी और पुत्र अपने सिरपर छत्र धारण करेगा' ऐसा कुलके लिये कलङ्करूप और पापमय मनोरथ तेरे बिना और कौन कर सकता है ? ॥ ३ ॥ भगवान् राम तो फिर लौट ही आवेंगे और सब लोग सुखी भी हो जायेंगे तथा विधाता मेरे अपयशको भी दूर कर देंगे ! परन्तु मुझे बड़ा भारी सोच तो यही है कि तू किस प्रकार अपना जीवन काटेगी ?' ॥ ४ ॥ गी० १६—