गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २४० राग गौरी [ ५९ ] करत राउ मनमों अनुमान । सोक-बिकल, मुख बचन न आवै, बिछुरे कृपानिधान ॥ १ ॥ राज देन कहि बोलि नारि-बस मैं जो कह्यो बन जान । आयसु सिर धरि चले हरषि हिय कानन भवन समान ॥ २ ॥ ऐसे सुतके बिरह-अवधि लौं जौ राखौं यह प्रान । तौ मिटि जाइ प्रीतिकी परमिति, अजस सुनौं निज कान ॥ ३ ॥ राम गए अजहूँ हौं जीवत, समुझत हिय अकुलान । तुलसिदास तनु तजि रघुपति हित कियो प्रेम परवान ॥ ४ ॥ कृपानिधान भगवान् राम बिछुड़ गये । इससे महाराज दशरथ अत्यन्त शोकातुर हैं और उनके मुखसे वचन भी नहीं निकलता और वे मनमें अनुमान करते हैं— ॥ १ ॥ 'अहो ! मैंने राज्य देना कहकर जिस समय स्त्रीके वशीभूत हो बुलवाकर वन जानेके लिये कहा, उस समय जो मेरी आज्ञाको सिरपर धारण कर हृदयमें हर्षित हो वनको घरके समान चले गये ॥ २ ॥ ऐसे पुत्रके वियोगकी अवधितक यदि मैंने अपने प्राणोंको रक्खा तो प्रेमकी मर्यादा टूट जायगी और अपने ही कानोंसे मुझे अपयश भी सुनना पड़ेगा' ॥ ३ ॥ 'हाय ! रामके चले जानेपर भी मैं आजतक जीवित हूँ'—ऐसा समझकर उनका हृदय व्याकुल हो गया । तुलसीदासजी कहते हैं, तब उन्होंने रघुनाथजीके लिये अपना शरीर त्यागकर अपने प्रेमको प्रमाणित कर दिया ॥ ४ ॥