गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
गीतावली २४० राग गौरी [ ५९ ] करत राउ मनमों अनुमान । सोक-बिकल, मुख बचन न आवै, बिछुरे कृपानिधान ॥ १ ॥ राज देन कहि बोलि नारि-बस मैं जो कह्यो बन जान । आयसु सिर धरि चले हरषि हिय कानन भवन समान ॥ २ ॥ ऐसे सुतके बिरह-अवधि लौं जौ राखौं यह प्रान । तौ मिटि जाइ प्रीतिकी परमिति, अजस सुनौं निज कान ॥ ३ ॥ राम गए अजहूँ हौं जीवत, समुझत हिय अकुलान । तुलसिदास तनु तजि रघुपति हित कियो प्रेम परवान ॥ ४ ॥ कृपानिधान भगवान् राम बिछुड़ गये । इससे महाराज दशरथ अत्यन्त शोकातुर हैं और उनके मुखसे वचन भी नहीं निकलता और वे मनमें अनुमान करते हैं— ॥ १ ॥ 'अहो ! मैंने राज्य देना कहकर जिस समय स्त्रीके वशीभूत हो बुलवाकर वन जानेके लिये कहा, उस समय जो मेरी आज्ञाको सिरपर धारण कर हृदयमें हर्षित हो वनको घरके समान चले गये ॥ २ ॥ ऐसे पुत्रके वियोगकी अवधितक यदि मैंने अपने प्राणोंको रक्खा तो प्रेमकी मर्यादा टूट जायगी और अपने ही कानोंसे मुझे अपयश भी सुनना पड़ेगा' ॥ ३ ॥ 'हाय ! रामके चले जानेपर भी मैं आजतक जीवित हूँ'—ऐसा समझकर उनका हृदय व्याकुल हो गया । तुलसीदासजी कहते हैं, तब उन्होंने रघुनाथजीके लिये अपना शरीर त्यागकर अपने प्रेमको प्रमाणित कर दिया ॥ ४ ॥
२४१ अयोध्याकाण्ड भरतजी अयोध्यामें [ ६० ] ऐसे तें क्यों कटु बचन कह्यो री ? 'राम जाहु कानन' कठोर तेरो कैसे धौं हृदय रह्यो, री ॥ १ ॥ दिनकर-बंस, पिता दसरथ-से, राम-लषन-से भाई । जननी ! तू जननी ? तौ कहा कहौं, बिधि केहि खोरि न लाई? ॥ २ ॥ हौं लहिहौं सुख राजमातु ह्वै, सुत सिर छत्र धरैगो । कुल-कलंक मल-मूल, मनोरथ तव बिनु कौन करैगो ? ॥ ३ ॥ ऐहैं राम, सुखी सब ह्वैहैं, ईस अजस मेरो हरिहैं । तुलसिदास मोको बड़ो सोच है, तू जनम कौनि बिधि भरिहै ॥ ४ ॥ [महाराज दशरथके प्राण-त्यागके अनन्तर जब भरतजी अयोध्यामें आये तो उन्हें सारे समाचार विदित हुए । उस समय वे अपनी माता कैकेयीसे कहते हैं—] 'अरी ! तूने 'राम ! तुम वन- को जाओ' ऐसे कठोर वचन कैसे कहे ? उस समय तेरा हृदय ऐसा कठोर कैसे हो गया ? ॥ १ ॥ हाय ! सूर्यकुल-जैसा वंश, महाराज दशरथ-से पिता और राम-लक्ष्मण-जैसे भाई मिले ! और माता ! तू माता हुई ! इसमें मैं क्या कहूँ ? विधाता किसको दोष नहीं लगाता ? ॥ २ ॥ 'मैं राजमाता होकर सुख भोगूंगी और पुत्र अपने सिरपर छत्र धारण करेगा' ऐसा कुलके लिये कलङ्करूप और पापमय मनोरथ तेरे बिना और कौन कर सकता है ? ॥ ३ ॥ भगवान् राम तो फिर लौट ही आवेंगे और सब लोग सुखी भी हो जायेंगे तथा विधाता मेरे अपयशको भी दूर कर देंगे ! परन्तु मुझे बड़ा भारी सोच तो यही है कि तू किस प्रकार अपना जीवन काटेगी ?' ॥ ४ ॥ गी० १६—
गीतावली २४२ [ ६१ ] ताते हौं देत न दूषन तोहू। रामबिरोधी उर कठोरतें प्रगट कियो है बिधि मोहू ॥ १ ॥ सुंदर सुखद सुसील सुधानिधि, जरनि जाइ जिहि जोए। बिष-बारुनी-बंधु कहियत बिधु ! नातो मिटत न धोए ॥ २ ॥ होते जौ न सुजान-सिरोमनि राम सबके मन माहीं। तौ तोरी करतूति, मातु ! सुनि प्रीति-प्रतीति कहा ही ? ॥ ३ ॥ मृदु, मंजुल सींची-सनेह सुचि सुनत भरत-बर-बानी। तुलसी 'साधु-साधु' सुर-नर-मुनि कहत प्रेम पहिचानी ॥ ४ ॥ विधाताने मुझे भी तेरे रामविरोधी कठोर हृदयसे उत्पन्न किया है इसलिये [तेरा ही होनेके कारण] मैं तो तुझे भी दोष नहीं दे सकता ॥ १ ॥ देखो, जिसे देखनेसे ही सब प्रकारका ताप शान्त हो जाता है, वह चन्द्रमा सुन्दर, सुखदायक, शीतल और अमृतका भण्डार है तो भी उसे विष और वारुणीका बन्धु कहा जाता है ! सच है, नाता धोनेसे नहीं मिटता ॥ २ ॥ यदि सुजानशिरोमणि भगवान् राम सबके मनमें न बसे होते तो हे माता ! तेरी करतूतको सुनकर ही प्रभुको मेरी प्रीति और प्रतीति कैसे हो सकती थी ? [अर्थात् राम सर्वान्तर्यामी हैं, इसलिये तेरी ऐसी कुचाल होनेपर भी वे अपने प्रति मेरे स्नेह और विश्वासको जानते हैं] ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, भरतजीकी यह अत्यन्त मधुर, मनोहर, स्नेहसनी पवित्र वाणी सुनकर उनके प्रेमको पहचानकर देवता, मनुष्य और मुनिजन 'साधु-साधु' कहने लगे ॥ ४ ॥
२४३ अयोध्याकाण्ड [ ६२ ] जो पैंहौं मातु मते महँ ह्वैहौं । तौ जननी ! जगमें या मुखकी कहाँ कालिमा ध्वैहौं ? ॥ १ ॥ क्यों हौं आजु होत सुचि सपथनि ? कौन मानिहै सांची ? । महिमा-मृगी कौन सुकृतीकी खल-बच-बिसिखन बांची ? ॥ २ ॥ गहि न जाति रसना काहूकी, कहौं जाहि जोइ सूझै । दीनबन्धु कारुण्य-सिंधु बिनु कौन हियेकी बूझै ? ॥ ३ ॥ तुलसी रामबियोग विषम बिष बिकल नारि-नर भारी । भरत-सनेह-सुधा सींचे सब भए तेहि समय सुखारी ॥ ४ ॥ [भरतजी माता कौसल्यासे कहते हैं—] 'मातः ! यदि मैं अपनी माताके मतमें सहमत होऊँ तो अब संसारमें इस मुखकी कालिमाको कहाँ धो सकूँगा ? ॥ १ ॥ आज सौगन्ध खानेसे मैं कैसे निर्दोष हो सकता हूँ ? मेरी बातको सच भी कौन मानेगा ? भला, किस पुण्यवान्की महिमारूप मृगी दुष्टोंके बाग्बाणोंसे विद्ध हुए बिना बची ? ॥ २ ॥ किसीकी जीभ नहीं पकड़ी जा सकती, इसलिये जिसको जैसा सूझता हो वह वैसा ही कहे । मेरे हृदयकी बात तो करुणासागर दीनबन्धु भगवान् रामके बिना और कौन जानेगा ?' ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, श्रीरामके वियोगरूप विषम विषसे सब नर-नारी बहुत व्याकुल हो रहे थे । उस समय भरतजीके स्नेहरूप अमृतसे सींचे जाकर वे सब सुखी हो गये ॥ ४ ॥ [ ६३ ] काहेको खोरि केंकयिहि लावौं ? धरहु धीर, बलि जाउँ तात ! मोको आज बिधाता बावौं ॥ १ ॥
गीतावली २४४ सुनिबे जोग बियोग रामको हौं न होउँ मेरे प्यारे । सो मेरे नयननि आगेतें रघुपति बनहि सिधारे ॥ २ ॥ तुलसिदास समुझाइ भरत कहँ, आँसु पोंछि उर लाए । उपजी प्रीति जानि प्रभुके हित, मनहु राम फिरि आए ॥ ३ ॥ [माता कौसल्या कहती हैं—] 'बेटा ! मैं कैकेयीको क्यों दोष लगाऊँ ? मैं बलिहारी जाती हूँ, तुम धैर्य धारण करो । आज विधाता ही मुझपर टेढ़ा है ॥ १ ॥ हे मेरे प्रियपुत्र ! मैं रघुनाथजीका वियोगतक भी सुननेके योग्य नहीं थी, पर इस समय मेरे नेत्रोंके सामने ही वे वनको चले गये' ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस प्रकार भरतजीको समझाकर माताने उनके आँसू पोंछकर उन्हें हृदयसे लगा लिया । उन्हें रामका सुहृद् समझकर माताको ऐसी प्रीति उत्पन्न हुई, मानो रघुनाथजी ही लौट आये हों ॥ ३ ॥ भरतजीका चित्रकूटको प्रस्थान [ ६४ ] मेरो अवध धौं कहहु, कहा है । करहु राज रघुराज-चरन तजि, लै लटि लोगु रहा है ॥ १ ॥ धन्य मातु, हौं धन्य, लागि जेहि राज-समाज दहा है । तापर मोको प्रभु करि चाहत सब बिनु वहन वहा है ॥ २ ॥ राम-सपथ, कोउ कछू कहै जनि, मैं दुख दुसह सहा है । चित्रकूट चलिए सब मिलि, बलि छमिए मोहि हहा है ॥ ३ ॥ यों कहि भोर भरत गिरिवरको मारग बूझि गहा है । सकल सराहत, एक भरत जग जनमि सुलाहु लहा है ॥ ४ ॥ जानहि सिय-रघुनाथ भरतको सील सनेह महा है । कैं तुलसी जाको राम-नामसों प्रेम-नेम निबहा है ॥ ५ ॥
२४५ अयोध्याकाण्ड [भरतजी कहते हैं—] बताओ तो अयोध्यामें मेरा क्या है ? लोग कहते हैं कि रघुनाथजीके चरणोंको त्याग कर राज्य करो; ये सब-के-सब इसी धुनमें लगे हुए हैं ॥ १ ॥ मेरी माता धन्य है ! और धन्य हूँ मैं, जिसके लिये यह सारा राजसमाज ध्वंस किया गया है ! तिसपर भी मुझे अपना राजा बनाकर आपलोग बिना अग्निके ही दग्ध होना चाहते हैं ॥ २ ॥ आप सबको रघुनाथजीकी सौगन्ध है, अब मुझसे कोई कुछ न कहे । मैंने बड़ा असह्य दुःख सहन किया है । मैं बलिहारी जाता हूँ, आइये, सब लोग मिलकर चित्रकूटको चलें । मैं हा हा खाता हूँ, आपलोग मुझे क्षमा कीजिये ॥ ३ ॥ ऐसा कहकर सबेरा होते ही भरतजीने चित्रकूटका मार्ग पूछकर उसे ग्रहण किया । उस समय सब लोग उनकी प्रशंसा करने लगे कि ‘संसारमें जन्म लेकर एकमात्र भरतजीने ही सच्चा लाभ उठाया है’ ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भरतजीके महान् शील और स्नेहको या तो राम और सीता जानते हैं और या वे लोग जानते हैं जिनका रामनामसे प्रेम और नेम लगा हुआ है ॥ ५ ॥ [ ६५ ] भाई ! हौं अवध कहा रहि लैहौं । राम-लषन-सिय चरन बिलोकत काल्हि काननहि जैहौं ॥ १ ॥ जद्यपि मोंतें, कैं कुमाततें ह्वै आई अति पोंची । सनमुख गए सरन राखिहेंगे रघुपति परम संकोची ॥ २ ॥ तुलसी यों कहि चले भोरही, लोग बिकल सँग लागे । जनु बन जरत देखि दारुन दव निकसि बिहँग-मृग भागे ॥ ३ ॥
गीतावली २४६ 'भाई ! मैं अयोध्यामें रहकर क्या लूँगा ? मैं तो राम, लक्ष्मण और सीताजी के चरण देखनेके लिये कल ही वनको प्रस्थान करूँगा ॥ १ ॥ यद्यपि मुझसे या मेरी कुटिल मातासे बड़ी बुरी बान बन गयी है तो भी परम संकोची भगवान् राम अपने सामने आया देख- कर मुझे अवश्य अपनी शरणमें रख लेंगे' ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, ऐसा कहकर भरतजी प्रातःकाल होते ही वनको चल दिये तथा अन्य लोग भी व्याकुल होकर उसके साथ हो लिये, जैसे वनको भयंकर दावानलसे जलता देखकर पक्षी और मृग उससे निकलकर भागने लगते हैं ॥ ३ ॥ [ ६६ ] सुकसों गहबर हिये कहै सारो । बीर कीर ! सिय-राम-लखन बिनु लागत जग अँधियारो ॥ १ ॥ पापिनि चेरि, अयानि रानि, नृप हित-अनहित न बिचारो । कुलगुर-सचिव-साधु सोचतु, बिधि को त बसाइ उजारो ? ॥ २ ॥ अवलोके न चलत भरि लोचन, नगर कोलाहल भारो । सुने न बचन करुना करके, जब पुर-परिवार संभारो ॥ ३ ॥ भैया भरत भायतेके, सँग वन सब लोग सिधारो । लुन पंख बाढ़ पींजरनि तरसत अधिक अभाग हमारो ॥ ४ ॥ सुनि खग कहत अंब ! मौंगी रहि समुझि प्रेमपथ न्यारो । गए ते प्रभुहि पहुंचाइ फिरे पुनि करत करम-गुन गारो ॥ ५ ॥ जीवन जग जानकी-लखनको, मरन महीप सँवारो । तुलसी और प्रीतिकी चरचा करत, कहा कछु चारो ॥ ६ ॥ (इस समय) एक सारिका (मैना) हृदय भरकर शुकसे कहने लग— 'भैया कीर ! सीता, राम और लक्ष्मणके बिना तो सारा
२४७ अयोध्याकाण्ड संसार अन्धकारमय जान पड़ता है ॥ १ ॥ दासी मन्थरा बड़ी पापिनी है, रानी कैकेयी भी बड़ी ही मूर्खा है, राजाने भी हिताहितका कोई विचार नहीं किया । इसीसे कुलगुरु वसिष्ठजी, मन्त्रिमण्डल और साधुजन सोचते हैं कि 'विधाताने किसे बसाकर नहीं उजाड़ा ?' ॥ २ ॥ हमने तो जाते समय उन्हें नेत्र भरकर देखा भी नहीं और जिस समय उन्होंने अपने नगर और परिवारकी सँभाल की थी, उस समय नगरमें भारी कोलाहल होनेके कारण हम करुणाधाम भगवान् रामके वचन भी नहीं सुन सके ॥ ३ ॥ अब प्यारे भाई भरतके साथ सब लोग वनको जा रहे हैं; परन्तु हम पंख पाकर भी पिंजरोंमें पड़े तरस रहे हैं—'यह हमारा बड़ा भारी दुर्भाग्य ही है' ॥ ४ ॥ सारिकाके ये वचन सुनकर तोता बोला—'अरी मैया ! प्रेमका पंथ निराला समझकर तू मौन हो रह । देख, जो उनके साथ गये थे वे भी प्रभुको वनमें पहुँचाकर कर्म (भाग्य) के गुणों- की निन्दा करते हुए फिर लौट आये ॥ ५ ॥ संसारमें जीवन तो सीता और लक्ष्मणका ही है तथा मरण केवल महाराजने सुधारा है और सब तो प्रेमकी चर्चा ही करते हैं और इसके सिवा उनके लिये कोई चारा भी नहीं है [क्योंकि न तो वे वनहीको जा सकते हैं और न प्राण ही त्याग सकते हैं] ॥ ६ ॥ [ ६७ ] कहै सुक, सुनहि सिखावन, सारो ! बिधि-करतब बिपरीत बाम गति, राम-प्रेम-पथ न्यारो ॥ १ ॥ को नर-नारि अवध खग-मृग, जेहि जीवन रामतें प्यारो । बिद्यमान सबके गवने बन, बंदन करमको कारो ॥ २ ॥
गीतावली २४८ अंब अनुज, प्रिय सखा, सुसेवक देखि बिषाद बिसारो । पंछी परबस परे पींजरनि, लेखो कौन हमारो ॥ ३ ॥ रही नृपकी, बिगरी है सबकी, अब एक सँवार निहारो । तुलसी प्रभु निज चरन-पीठ मिस भरत-प्रान रखवारो ॥ ४ ॥ शुक कहता है, 'अरी सारिका ! तू मेरी शिक्षा सुन । विधाताके विपरीत होनेसे कर्मकी गति भी विपरीत हो जाती है, किन्तु रामके प्रेमका मार्ग तो इससे निराला ही है ॥ १ ॥ भला, अयोध्यामें ऐसा कौन नर-नारी अथवा पशु-पक्षी है जिसे अपना जीवन रामसे अधिक प्रिय हो ? किन्तु वे सबके रहते हुए ही वनको चले गये; इससे कर्मका ही मुख काला हुआ ॥ २ ॥ यह सब देखकर भी माता, भाई, प्रिय, मित्र और अच्छे-अच्छे सेवक भी उस दुःखको भूल गये ! फिर पिंजरोंमें परतन्त्र पड़े हुए हम पक्षियोंकी तो बात ही क्या है ? ॥ ३ ॥ बात तो राजाकी रही और सबकी बिगड़ गयी । परन्तु देखो, अब एक बात बन गयी है । तुलसीदास कहते हैं, प्रभुने अपनी चरणपादुकाओंके मिससे भरतजीके प्राणोंका रख- वाला नियुक्त कर दिया है ॥ ४ ॥ [ ६८ ] ता दिन सृंगबेरपुर आए। राम-सखा ते समाचार सुनि बारि बिलोचन छाए ॥ १ ॥ कुस-साथरी देखि रघुपतिकी हेतु अपनपौ जानी । कहत कथा सिय-राम-लषनकी बैठेहि रैनि बिहानी ॥ २ ॥ भोरहि भरद्वाज आश्रम ह्वै, करि निषादपति आगे। चले जनु तक्यो तड़ाग तृषित गज घोर घामके लागे ॥ ३ ॥
२४६ अयोध्याकाण्ड बूझत 'चित्रकूट कहँ' जेहि तेहि, मुनि बालकनि बतायो । तुलसी मनहु फनिक मनि ढूंढत, निरखि हरषि हियँ धायो ॥ ४ ॥ उस दिन भरतजी शृङ्गवेरपुर पहुँचे । वहाँ रामचन्द्रजीके सखा गुहसे प्रभुके समाचार पाकर उनके नेत्रोंमें जल भर आया ॥ १ ॥ वहाँ रघुनाथजीकी कुशविरचित शय्या देखकर और उसमें अपनेको ही हेतु समझकर उन्होंने वह सारी रात्रि सीता, राम और लक्ष्मण- जीकी बातें करने-करते बैठे-बैठे ही बिता दीं ॥ २ ॥ प्रातःकाल होते ही वे निषादराजको आगे कर भरद्वाज ऋषिके आश्रमकी ओर चले, मानो किसी तृषातुर गजने दारुण घामके लगनेपर किसी तड़ागको देख लिया हो ॥ ३ ॥ फिर जहाँ-तहाँ मुनियोंके बालकोंसे यह पूछनेपर कि 'चित्रकूट कहाँ है ?' उन्होंने उसका पता बतला दिया । तुलसीदास कहते हैं, उसे देखकर उन्हें ऐसा आनन्द हुआ जैसे कोई-कोई सर्प मणिको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उसे देख लेनेपर मारे हर्षके दौड़ता है ॥ ४ ॥ राम-भरत-सम्मेलन राग केदारा [ ६९ ] बिलोके दूरितें दोउ बीर । उर आयत, आजानु सुभग भुज, स्यामल-गौर सरीर ॥ १ ॥ सीस जटा, सरसीरुह लोचन, बने परिघान मुनिचीर । निकट निषंग, संग सिय सोभित, करनि धुनत धनु-तीर ॥ २ ॥ मन अगहुँड़, तनु पुलक सिथिल भयो, नलिन-नयन भरे नीर । गड़त गोड़ मानो सकुच-पंक महँ, कढ़त प्रेम-बल धीर ॥ ३ ॥
गीतावली २५० तुलसिदास दसा देखि भरतकी उठि धाए अतिहि अधीर । लिये उठाइ उर लाइ कृपानिधि विरह-जनित हरि पीर ॥ ४ ॥ भरतजीने दूरहीसे दोनों भाइयोंको देखा। उनके विशाल वक्षःस्थल हैं, जानुपर्यन्त लम्बायमान सुन्दर भुजाएँ हैं तथा श्याम और गौर शरीर हैं ॥ १ ॥ उनके सिरपर जटाएँ हैं, कमलके समान नेत्र हैं और वे मुनिवस्त्र धारण किये हैं। उनके पासहीमें तर्कस रखे हुए हैं, संगमें सीताजी शोभायमान हैं तथा हाथोंसे वे धनुष और बाणोंको हिला रहे हैं ॥ २ ॥ प्रभुको देखकर भरतजीका मन तो आगे बढ़नेके लिये उतावला हो रहा है; किन्तु शरीर रोमाञ्चित होकर शिथिल हो गया है और नेत्रकमलोंमें जल भर आया है। पैर मानो संकोचरूप दलदलमें गड़ जाते हैं और उन्हें वे प्रेमके बलसे धैर्यपूर्वक बाहर निकालते हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, भरतजीकी यह दशा देखकर भगवान् प्रेमसे अधीर होकर उनकी ओर उठकर दौड़े और उनकी विरह-व्यथाको दूर कर कृपानिधान प्रभुने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥ ४ ॥ [ ७० ] भरत भए ठाढ़े कर जोरि । ह्वै न सकत सामुहें सकुचबस समुझि मातुकृत खोरि ॥ १ ॥ फिरिहैं किधौं फिरन कहिहैं प्रभु कलपि कुटिलता मोरि । हृदय सोच, जल भरे बिलोचन, नेह देह भइ भोरि ॥ २ ॥ बनबासी, पुरलोग, महामुनि किए हैं काठके-से कोरि । दै दै श्रवन सुनिबेको जहँ तहँ रहे प्रेम मन बोरि ॥ ३ ॥ तुलसी राम-सुभाव सुमिरि, उर धरि धीरजहि बहोरि । बोले बचन बिनीत उचित हित करुना-रसहि निचोरि ॥ ४ ॥
२५१ अयोध्याकाण्ड तब भरतजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये। माताकी कुचाल समझकर वे संकोचवश प्रभुके सामने खड़े नहीं हो सकते थे॥ १ ॥ उनके नेत्रोंमें जल भरा हुआ था, शरीर स्नेहवश शिथिल हो रहा था और चित्तमें यही सोच-विचार था कि 'न जाने प्रभु फिरेंगे अथवा मेरी कुटिलता समझकर मुझे ही लौट जानेको कह देंगे?' ॥ २ ॥ वनवासी, पुरजन तथा बड़े-बड़े मुनिलोग काठसे गढ़कर बनाये हुए-से हो रहे हैं और जहाँ-तहाँ मनको प्रेम-रसमें डुबोकर अपने कान लगाये सुननेके लिये खड़े हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इसी समय भरतजी रामचन्द्रजीके स्वभावका स्मरण कर हृदयमें धैर्य धारण कर करुणारससे भरे हुए अति विनीत, हितकारी और उचित वचन बोले ॥ ४ ॥ [ ७१ ] जानत हौ सबहीके मनकी। तदपि, कृपालु ! करौं बिनती सोइ सादर सुनहु दीन-हित जनकी ॥ १ ॥ ए सेवक संतत अनन्य गति, ज्यो चातकहि एक गति घनकी। यह बिचारि गवनहु पुनीत पुर, हरहु दुसह आरति परिजनकी ॥ २ ॥ मेरो जीवन जानिय ऐसोइ, जियै जैसो अहि, जासु गई मनि फनकी। मेटहु कुल कलंक कोसलपति, आज्ञा देहु-नाथ मोहि बनकी ॥ ३ ॥ मोको जोइ लाइय लागै सोइ, उत्पति है कुमातुतें तनकी। तुलसिदास सब दोष दूरि करि प्रभु अब लाज करहु निज पनकी॥ ४ ॥ कृपालो ! आप सबके मनकी बात जानते हैं, तो भी मैं आदरपूर्वक कुछ विनय करता हूँ। आप दीनहितकारी हैं, अतः इस सेवककी वह विनय सुनिये ॥ १ ॥ 'ये अयोध्यावासी सदा आपके ही अनन्य दास हैं, [इनका कोई और अवलम्ब नहीं है] जैसे पपीहेको एकमात्र मेघका ही आश्रय रहता है, ऐसा सोचकर
गीतावली २५२ आप उस पवित्र पुरीमें पधारिये और अपने आत्मीयोंके दुःसह दुःखको दूर कीजिये ॥ २ ॥ मेरा जीवन भी ऐसा ही समझिये जैसे कोई सर्प फणकी मणि खो जानेपर जीवित रहता हो। कोसलनाथ ! आप [ बड़े भाईके रहते हुए छोटेको राज्य मिलनारूप ] यह कुलका कलंक नष्ट कीजिये और अपने बदले मुझे वन जानेकी आज्ञा दीजिये ॥ ३ ॥ और मुझे तो जो भी दोष लगाया जाय वही लग सकता है, क्योंकि इस शरीरकी उत्पत्ति कुमातासे हुई है । किन्तु प्रभो ! आप तो मेरे सब अपराधोंको भूलकर अपने विरद [शरणागतपालकत्व] की ही लाज रखिये ॥ ४ ॥ [ ७२ ] तात ! विचारो धौं, हौं क्यों आवौं । तुम्ह सुचि, सुहृद, सुजान सकल बिधि, बहुत कहा कहि कहि समुझावौं ॥ १ ॥ निज कर खाल खेंचि या तनुतें जो पितु पग पानह करावौं । होउँ न उरिन पिता दसरथतें, कैसे ताके बचन मेटि पति पावौं ॥ २ ॥ तुलसिदास जाको सुजस तिहूँ पुर, क्यों तेहि कुलहि कालिमा लावौं । प्रभु-रुख निरख निरास भरत भए, जान्यो है सबहि भाँति बिधि बाधौं ॥ ३ ॥ [इसपर रघुनाथजी कहने लगे—] 'भैया ! सोचो, तो मैं 'किस प्रकार लौट सकता हूँ ? तुम सब प्रकार निर्दोष, सुहृद् और समझदार हो । तुम्हें बहुत कहकर क्या समझाऊँ ? ॥ १ ॥ यदि मैं अपने हाथसे ही इस शरीरकी खाल खींचकर पिताजीके चरणोंकी जूतियाँ बनवाऊँ तो भी पिता दशरथजीसे मैं उऋण नहीं हो सकता;
२४३ अयोध्याकाण्ड फिर उनके वाक्योंकी अवहेलना करके मैं कैसे विश्वासपात्र हो सकता हूँ ! ॥ २ ॥ मैया ! जिस कुलका सुयश तीनों लोकोंमें छाया हुआ है, उसे मैं कैसे कलङ्कित कर सकता हूँ !' तुलसीदास कहते हैं, प्रभुका ऐसा भाव देखकर भरतजी निराश हो गये और उन्होंने विधाताको सब प्रकार वाम समझा ॥ ३ ॥ [ ७३ ] बहुरो भरत कह्यो कछु चाहें । सकुच-सिंधु बोहित बिबेक करि बुद्धि-बल बचन निबाहैं ॥ १ ॥ छोटेहुतें छोह करि आए, मैं सामुहैं न हेरो । एकहि बार आजु बिधि मेरो लील-सनेह निबेरो ॥ २ ॥ तुलसी जो फिरिबो न बने, प्रभु ! तौ हौं आयसु पावौं । घर फेरिए, लषन लरिका हैं, नाथ साथ हौं आवौं ॥ ३ ॥ भरतजी फिर भी कुछ कहना चाहते हैं । अतः संकोचरूप समुद्रमें विवेको नौका बनाकर उसपर वचनरूप पथिकोंको बुद्धिरूप केवटके बलसे पार करना चाहते हैं ॥ १ ॥ [वे कहने लगे—] 'छोटेपनमें तो प्रभु मुझपर सदासे ही स्नेह कहते रहे हैं और मैंने भी आपको सामने पड़कर कभी नहीं देखा । किन्तु आज विधाताने एक ही बार मेरे शील और स्नेहको दूर कर दिया ॥ २ ॥ अच्छा, यदि घर लौटना सम्भव न हो तो प्रभुसे मुझे इतनी ही आज्ञा मिल जाय कि लक्ष्मण मुझसे छोटी अवस्थाके लड़के हैं, अतः इन्हें घर भेज दिया जाय और मैं स्वामी साथ चलूँ ॥ ३ ॥ [ ७४ ] रघुपति ! मोहि संग किन लीजै ? बारबार 'पुर जाहु,' नाथ ! केहि कारन आयसु दीजै ॥ १ ॥
गीतावली २५४ जद्यपि हौँ अति अधम, कुटिलमति, अपराधिनिको जायो । प्रनतपाल कोमल-सुभाव जिय जानि, सरन तकि आयो ॥ २ ॥ जो मेरे तजि चरन आन गति, कहौँ हृदय कछु राखी । तौ परिहरहु दयालु, दीनहित, प्रभु, अभ्यंतर-साखी ॥ ३ ॥ ताते नाथ ! कहौँ मैं पुनि पुनि, प्रभु पितु, मातु, गोसाईं । 'भजनहीन नरदेह वृथा, खर-स्वान-फेरुकी नाईं ॥ ४ ॥ बंधु-बचन सुनि श्रवन नयन-राजीव नीर भरि आए । तुलसिदास प्रभु परम कृपा गहि बांह भरत उर लाए ॥ ५ ॥ [श्रीभरतजी कहते हैं—] 'रघुनाथजी ! आप मुझे साथ क्यों नहीं लेते ? नाथ ! आप बारम्बार 'तुम अयोध्यापुरीको जाओ' ऐसी आज्ञा क्यों देते हैं ? ॥ १ ॥ यद्यपि मैं बड़ा ही नीच, कुटिल- मति और अपराधिनीके गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ, तो भी आपका कोमल स्वभाव है तथा आप शरणागतवत्सल हैं—ऐसा चित्तमें समझकर मैं आपकी शरण ताककर आया हूँ ॥ २ ॥ यदि मुझे आपके चरणोंको छोड़कर कोई और गति हो अथवा मैं चित्तमें किसी प्रकारका भेद रखकर कहता होऊँ तो हे दीनहितकारी दयामय देव ! आप मुझे त्याग दें; क्योंकि प्रभु सबके अन्तःकरणोंके साक्षी हैं ॥ ३ ॥ हे नाथ ! आप ही हमारे पिता, माता और स्वामी हैं, इसीसे मैं बारम्बार [आपकी सेवामें रहनेके लिये] कह रहा हूँ, क्योंकि यह मनुष्य-शरीर आपका भजन किये बिना तो गधे, कुत्ते और गीदड़के समान वृथा ही है' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भाई भरतके ये वचन कानोंसे सुनकर प्रभुके नेत्रकमलोंमें जल भर आया और उन्होंने परम कृपावश उन्हें बांह पकड़कर हृदयसे लगा लिया ॥ ५ ॥
२५५ अयोध्याकाण्ड [ ७५ ] काहेको मानत हानि हिये हौँ ? प्रीति-नीति-गुन-सील-धरम कहँ तुम अवलंब दिये हौ ॥ १ ॥ तात ! जात जानिबे न ए दिन, करि प्रमान पितु-बानी । ऐहौँ बेगि, धरहु धीरज उर कठिन कालगति जानी ॥ २ ॥ तुलसिदास अनुजहि प्रबोधि प्रभु चरनपीठ निज दीन्हें । मनहु सबनिके प्रान-पाहरू भरत सीस धरि लीन्हें ॥ ३ ॥ [भगवान् बोले—] 'भैया ! अपने हृदयमें ऐसी ग्लानि क्यों मानते हो ? तुमने तो प्रीति, नीति, गुण, शील और धर्म—सभीको सहारा दे रखा है ॥ १ ॥ हे तात ! तुम्हें ये दिन तो जाते हुए मालूम भी न होंगे । इतनेहीमें मैं पिताके वचनोंको पूरा कर शीघ्र ही लौट आऊँगा । तुम कालकी गतिको कठिन जानकर हृदयमें धैर्य धारण करो' ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, भाई को इस प्रकार समझाकर भगवान्ने उन्हें अपनी चरणपादुकाएँ दे दीं और भरतजीने सबके प्राणोंके प्रहरोरूप उन पादुकाओंको अपने सिरपर लगाते हुए ग्रहण किया ॥ ३ ॥ [ ७६ ] बिनती भरत करत कर जोरे । दीनबंधु ! दीनता दीनकी कबहुँ परै जनि भोरे ॥ १ ॥ तुम्हसे तुम्हहि नाथ मोको, मोसे जन तुमको बहुतेरे । इहै जानि, पहिचानि प्रीति, छमिए अघ-औगुन मेरे ॥ २ ॥ यों कहि सीय-राम-पाँयनि परि लषन लाइ उर लीन्हें । पुलक सरीर, नीर भरि लोचन, कहत प्रेम-पन कीन्हें ॥ ३ ॥
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तुलसी बीते अवधि प्रथम दिन जो रघुबीर न ऐहौ । तौ प्रभु-चरन सरोज-सपथ जीवत परिजनहि न पैहौ ॥ ४ ॥ [चलते समय] भरतजी हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं—'हे दीनबन्धो ! इस दीनकी दीनता कभी भूलमें न पड़ जाय ॥ १ ॥ हे नाथ ! मेरे लिये आप-जैसे प्रभु तो आप ही हैं; किन्तु आपके लिये मेरे समान सेवक अनेकों हैं—यह जानकर और मेरी आन्तरिक प्रीति पहचानकर आप मेरे अपराध और अवगुण क्षमा करें' ॥ २ ॥ ऐसा कहकर भरतजीने राम और सीताके चरणोंमें गिरकर लक्ष्मणजीको हृदयसे लगाया और फिर पुलकितशरीर हो, नेत्रोंमें जल भरकर प्रेमकी प्रतिज्ञा करके कहने लगे ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, [वह प्रतिज्ञा यह थी—] हे रघुनाथजी ! वनवासकी अवधि समाप्त हो जानेपर यदि आप पहले ही दिन अयोध्यामें न आये तो प्रभुके चरणकमलोंकी सौगन्ध, आप अपने दासको जीवित न पा सकेंगे ॥ ४ ॥ [ ७७ ] अवसि हौं आयसु पाइ रहौंगो । जनमि कैकयी-कोखि कृपानिधि ! क्यों कछु चपरि कहौंगो ॥ १ ॥ 'भरत भूप, सिय-राम-लषन बन,' सुनि सानंद सहौंगो । पुर-परिजन अवलोकि मातु सब सुख-संतोष लहौंगो ॥ २ ॥ प्रभु जानत, जेहि भाँति अवधिलौं बचन पालि निबहौंगो । आगेकी बिनती तुलसी तब, जब फिरि चरन गहौंगो ॥ ३ ॥ 'कृपानिधे ! आपकी आज्ञा पाकर मैं अवश्य अयोध्यामें ही रहूँगा; कैकेयीके गर्भसे जन्म लेकर भला मैं कोई बात बढ़कर कैसे
२५७ अयोध्याकाण्ड कह सकता हूँ॥ १॥ अब मैं 'भरत राजा हैं और सीता, राम तथा लक्ष्मण वनमें हैं' यह बात सुनकर आनन्दपूर्वक सहन करूँगा तथा नगर, कुटुम्बी लोग और सब माताओंको देखकर सुख एवं सन्तोष पाऊँगा ॥ २ ॥ जिस प्रकार मैं आपकी आज्ञा मानकर वनवासकी अवधिपर्यन्त निर्वाह करूंगा, सो तो प्रभु जानते ही हैं; अब आगेकी विनती उसी समय करूँगा, जब पुनः इन चरणोंको पकडूंगा ॥ ३ ॥ [ ७८ ] प्रभुसों मैं ढीठो बहुत दई है। कीबी छमा, नाथ ! आरतितें कही कुजुगुति नई है॥ १ ॥ यों कहि, बार बार पांयनि परि, पाँवरि पुलकि लई है। अपनो अदिन देखि हौं डरपत, जेहि बिष बेलि बई है॥ २ ॥ आए सदा सुधारि गोसाईं, जनतें बिगरि गई है। थके बचन पैरत सनेह सरि, परचो मानो घोर घई है ॥ ३ ॥ चित्रकूट तेहि समय सबनिकी बुद्धि बिषाद हई है। तुलसी राम-भरतके बिछुरत सिला सप्रेम भई है ॥ ४ ॥ 'इस समय प्रभुके साथ मैंने बहुत ढिठाई की है [ क्योंकि चुप रहनेके बजाय इतना तर्क-वितर्क किया ] । किन्तु हे नाथ ! दुःखके कारण मैंने जो कोई नयी कुयुक्ति कही हो उसे क्षमा करें' ॥ १ ॥ ऐसा कह भरतजीने बारम्बार प्रभुके चरणोंमें गिर पुलकित- शरीर हो उनकी पादुकाएँ उठा लीं [ और कहने लगे— ] 'मैं तो अपना कुसमय देखकर डरता हूँ जिसने इस समय यह सारी विषकी बेलि बोयी है ॥ २ ॥ हे स्वामिन् ! जब-जब दाससे कुछ बिगाड़ हुआ, तब-तब सदासे ही आप सुधारते आये हैं' ऐसा कहकर गी० १७-
गीतावली २५८ भरतजीके वचन थकित हो गये, मानो स्नेह-सरितामें तैरते-तैरते वे किसी भयंकर भँवरमें पड़ गये हों ॥ ३ ॥ उस समय चित्रकूटमें सभीकी बुद्धियाँ विषादग्रस्त हो गयीं । तुलसीदासजी कहते हैं, तब राम और भरतका त्रियोग होने देख वहाँकी शिला भी प्रेमवश (द्रवीभूत) हो गयी ॥ ४ ॥ रामविधुरा अयोध्या [ ७९ ] जबतें चित्रकूटतें आए । नंदिग्राम खनि अवनि, डासि कुस, परनकुटी करि छाए ॥ १ ॥ अजिन बसन, फल असन, जटा धरे रहत अवधि चित दीन्हें । प्रभु-पद-प्रेम-नेम-ब्रत निरखत मुनिन्ह नमित मुख कीन्हें ॥ २ ॥ सिंहासनपर पूजि पादुका बारहि बार जोहारे । प्रभु-अनुराग माँगि आयसु पुरजन सब काज सँवारे ॥ ३ ॥ तुलसी ज्यों ज्यों घटत तेज तनु, त्यों त्यों प्रीति अधिकाई । भए, न हैं, न होहिंगे कबहुँ भुवन भरत-से भाई ॥ ४ ॥ जबसे भरतजी चित्रकूटसे लौटकर आये हैं, तबसे नन्दिग्राममें पृथ्वी खोदकर उसमें कुश बिछा, पत्तोंकी कुटी बना, वहीं रहते हैं ॥ १ ॥ वहाँ मृगचर्म धारण किये फलाहार करते सिरपर जटाएँ धारण कर अवधिमें चित्त लगाये हुए हैं । प्रभुके चरणोंमें उनके प्रेम, नियम और व्रतको देखकर तो मुनियोंने भी लज्जावश अपना मस्तक नीचा कर लिया है ॥ २ ॥ वे प्रभुकी पादुकाओंको सिंहासनपर पूजकर बारम्बार उनकी वन्दना करते हैं और प्रभु-प्रेमसे भरकर उनकी आज्ञा ले पुरवासियोंके सब कार्य सँभालते हैं ॥ ३ ॥
२५६ अयोध्याकाण्ड तुलसीदास कहते हैं, ज्यों ज्यों उनके शरीरका तेज (पुष्टता) घटता है, त्यों-त्यों उनकी प्रीति बढ़ती जाती है। संसारमें भरत-जैसे भाई न कभी हुए हैं, न हैं और न भविष्यमें ही कभी होंगे ॥ ४ ॥ राग रामकली [ ८० ] राखो भगति-भलाई भली भाँति भरत । स्वारथ-परमारथ-पथी जय जय जग करत ॥ १ ॥ जो ब्रत मुनिवरनि कठिन मानसँ आचरत । सो ब्रत लिए चातक-ज्यों, सुनत पाप हरत ॥ २ ॥ सिंहासन सुभग राम-चरन-पीठ धरत । चालत सब राजकाज आयसु अनुसरत ॥ ३ ॥ आपु अवध, बिपिन बंधु, सोच-जरनि जरत । तुलसी सम-बिषम, सुगम-अगम लखि न परत ॥ ४ ॥ भरतने भक्ति और भलाईकी बहुत अच्छी तरह रक्षा की है। वे स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही मार्गोंमें चलनेवाले हैं, सारा संसार उनका जय-जयकार करता है ॥ १ ॥ जिस [अनन्य] व्रतका मुनियोंको मनसे भी आचरण करना कठिन है, उसे उन्होंने चातकके समान निभाया, जिसका श्रवण करनेसे ही सब पाप दूर हो जाते हैं ॥ २ ॥ वे भगवान् रामकी चरणपादुकाओंको एक सुन्दर सिंहासनपर रखते हैं और उनकी आज्ञाका अनुसरण करते हुए सब राजकार्यका सञ्चालन करते हैं ॥ ३ ॥ 'आप स्वयं अयोध्यामें हैं और भाई वनमें हैं' इस शोकरूप दाहसे वे जलते रहते हैं। तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार भरत और रघुनाथजीको [अयोध्या-