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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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२५१ अयोध्याकाण्ड तब भरतजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये। माताकी कुचाल समझकर वे संकोचवश प्रभुके सामने खड़े नहीं हो सकते थे॥ १ ॥ उनके नेत्रोंमें जल भरा हुआ था, शरीर स्नेहवश शिथिल हो रहा था और चित्तमें यही सोच-विचार था कि 'न जाने प्रभु फिरेंगे अथवा मेरी कुटिलता समझकर मुझे ही लौट जानेको कह देंगे?' ॥ २ ॥ वनवासी, पुरजन तथा बड़े-बड़े मुनिलोग काठसे गढ़कर बनाये हुए-से हो रहे हैं और जहाँ-तहाँ मनको प्रेम-रसमें डुबोकर अपने कान लगाये सुननेके लिये खड़े हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इसी समय भरतजी रामचन्द्रजीके स्वभावका स्मरण कर हृदयमें धैर्य धारण कर करुणारससे भरे हुए अति विनीत, हितकारी और उचित वचन बोले ॥ ४ ॥ [ ७१ ] जानत हौ सबहीके मनकी। तदपि, कृपालु ! करौं बिनती सोइ सादर सुनहु दीन-हित जनकी ॥ १ ॥ ए सेवक संतत अनन्य गति, ज्यो चातकहि एक गति घनकी। यह बिचारि गवनहु पुनीत पुर, हरहु दुसह आरति परिजनकी ॥ २ ॥ मेरो जीवन जानिय ऐसोइ, जियै जैसो अहि, जासु गई मनि फनकी। मेटहु कुल कलंक कोसलपति, आज्ञा देहु-नाथ मोहि बनकी ॥ ३ ॥ मोको जोइ लाइय लागै सोइ, उत्पति है कुमातुतें तनकी। तुलसिदास सब दोष दूरि करि प्रभु अब लाज करहु निज पनकी॥ ४ ॥ कृपालो ! आप सबके मनकी बात जानते हैं, तो भी मैं आदरपूर्वक कुछ विनय करता हूँ। आप दीनहितकारी हैं, अतः इस सेवककी वह विनय सुनिये ॥ १ ॥ 'ये अयोध्यावासी सदा आपके ही अनन्य दास हैं, [इनका कोई और अवलम्ब नहीं है] जैसे पपीहेको एकमात्र मेघका ही आश्रय रहता है, ऐसा सोचकर

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