भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

गीतावली २५० तुलसिदास दसा देखि भरतकी उठि धाए अतिहि अधीर । लिये उठाइ उर लाइ कृपानिधि विरह-जनित हरि पीर ॥ ४ ॥ भरतजीने दूरहीसे दोनों भाइयोंको देखा। उनके विशाल वक्षःस्थल हैं, जानुपर्यन्त लम्बायमान सुन्दर भुजाएँ हैं तथा श्याम और गौर शरीर हैं ॥ १ ॥ उनके सिरपर जटाएँ हैं, कमलके समान नेत्र हैं और वे मुनिवस्त्र धारण किये हैं। उनके पासहीमें तर्कस रखे हुए हैं, संगमें सीताजी शोभायमान हैं तथा हाथोंसे वे धनुष और बाणोंको हिला रहे हैं ॥ २ ॥ प्रभुको देखकर भरतजीका मन तो आगे बढ़नेके लिये उतावला हो रहा है; किन्तु शरीर रोमाञ्चित होकर शिथिल हो गया है और नेत्रकमलोंमें जल भर आया है। पैर मानो संकोचरूप दलदलमें गड़ जाते हैं और उन्हें वे प्रेमके बलसे धैर्यपूर्वक बाहर निकालते हैं ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, भरतजीकी यह दशा देखकर भगवान् प्रेमसे अधीर होकर उनकी ओर उठकर दौड़े और उनकी विरह-व्यथाको दूर कर कृपानिधान प्रभुने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥ ४ ॥ [ ७० ] भरत भए ठाढ़े कर जोरि । ह्वै न सकत सामुहें सकुचबस समुझि मातुकृत खोरि ॥ १ ॥ फिरिहैं किधौं फिरन कहिहैं प्रभु कलपि कुटिलता मोरि । हृदय सोच, जल भरे बिलोचन, नेह देह भइ भोरि ॥ २ ॥ बनबासी, पुरलोग, महामुनि किए हैं काठके-से कोरि । दै दै श्रवन सुनिबेको जहँ तहँ रहे प्रेम मन बोरि ॥ ३ ॥ तुलसी राम-सुभाव सुमिरि, उर धरि धीरजहि बहोरि । बोले बचन बिनीत उचित हित करुना-रसहि निचोरि ॥ ४ ॥