गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४६ अयोध्याकाण्ड बूझत 'चित्रकूट कहँ' जेहि तेहि, मुनि बालकनि बतायो । तुलसी मनहु फनिक मनि ढूंढत, निरखि हरषि हियँ धायो ॥ ४ ॥ उस दिन भरतजी शृङ्गवेरपुर पहुँचे । वहाँ रामचन्द्रजीके सखा गुहसे प्रभुके समाचार पाकर उनके नेत्रोंमें जल भर आया ॥ १ ॥ वहाँ रघुनाथजीकी कुशविरचित शय्या देखकर और उसमें अपनेको ही हेतु समझकर उन्होंने वह सारी रात्रि सीता, राम और लक्ष्मण- जीकी बातें करने-करते बैठे-बैठे ही बिता दीं ॥ २ ॥ प्रातःकाल होते ही वे निषादराजको आगे कर भरद्वाज ऋषिके आश्रमकी ओर चले, मानो किसी तृषातुर गजने दारुण घामके लगनेपर किसी तड़ागको देख लिया हो ॥ ३ ॥ फिर जहाँ-तहाँ मुनियोंके बालकोंसे यह पूछनेपर कि 'चित्रकूट कहाँ है ?' उन्होंने उसका पता बतला दिया । तुलसीदास कहते हैं, उसे देखकर उन्हें ऐसा आनन्द हुआ जैसे कोई-कोई सर्प मणिको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उसे देख लेनेपर मारे हर्षके दौड़ता है ॥ ४ ॥ राम-भरत-सम्मेलन राग केदारा [ ६९ ] बिलोके दूरितें दोउ बीर । उर आयत, आजानु सुभग भुज, स्यामल-गौर सरीर ॥ १ ॥ सीस जटा, सरसीरुह लोचन, बने परिघान मुनिचीर । निकट निषंग, संग सिय सोभित, करनि धुनत धनु-तीर ॥ २ ॥ मन अगहुँड़, तनु पुलक सिथिल भयो, नलिन-नयन भरे नीर । गड़त गोड़ मानो सकुच-पंक महँ, कढ़त प्रेम-बल धीर ॥ ३ ॥