गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २४८ अंब अनुज, प्रिय सखा, सुसेवक देखि बिषाद बिसारो । पंछी परबस परे पींजरनि, लेखो कौन हमारो ॥ ३ ॥ रही नृपकी, बिगरी है सबकी, अब एक सँवार निहारो । तुलसी प्रभु निज चरन-पीठ मिस भरत-प्रान रखवारो ॥ ४ ॥ शुक कहता है, 'अरी सारिका ! तू मेरी शिक्षा सुन । विधाताके विपरीत होनेसे कर्मकी गति भी विपरीत हो जाती है, किन्तु रामके प्रेमका मार्ग तो इससे निराला ही है ॥ १ ॥ भला, अयोध्यामें ऐसा कौन नर-नारी अथवा पशु-पक्षी है जिसे अपना जीवन रामसे अधिक प्रिय हो ? किन्तु वे सबके रहते हुए ही वनको चले गये; इससे कर्मका ही मुख काला हुआ ॥ २ ॥ यह सब देखकर भी माता, भाई, प्रिय, मित्र और अच्छे-अच्छे सेवक भी उस दुःखको भूल गये ! फिर पिंजरोंमें परतन्त्र पड़े हुए हम पक्षियोंकी तो बात ही क्या है ? ॥ ३ ॥ बात तो राजाकी रही और सबकी बिगड़ गयी । परन्तु देखो, अब एक बात बन गयी है । तुलसीदास कहते हैं, प्रभुने अपनी चरणपादुकाओंके मिससे भरतजीके प्राणोंका रख- वाला नियुक्त कर दिया है ॥ ४ ॥ [ ६८ ] ता दिन सृंगबेरपुर आए। राम-सखा ते समाचार सुनि बारि बिलोचन छाए ॥ १ ॥ कुस-साथरी देखि रघुपतिकी हेतु अपनपौ जानी । कहत कथा सिय-राम-लषनकी बैठेहि रैनि बिहानी ॥ २ ॥ भोरहि भरद्वाज आश्रम ह्वै, करि निषादपति आगे। चले जनु तक्यो तड़ाग तृषित गज घोर घामके लागे ॥ ३ ॥