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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 454 में से

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२४७ अयोध्याकाण्ड संसार अन्धकारमय जान पड़ता है ॥ १ ॥ दासी मन्थरा बड़ी पापिनी है, रानी कैकेयी भी बड़ी ही मूर्खा है, राजाने भी हिताहितका कोई विचार नहीं किया । इसीसे कुलगुरु वसिष्ठजी, मन्त्रिमण्डल और साधुजन सोचते हैं कि 'विधाताने किसे बसाकर नहीं उजाड़ा ?' ॥ २ ॥ हमने तो जाते समय उन्हें नेत्र भरकर देखा भी नहीं और जिस समय उन्होंने अपने नगर और परिवारकी सँभाल की थी, उस समय नगरमें भारी कोलाहल होनेके कारण हम करुणाधाम भगवान् रामके वचन भी नहीं सुन सके ॥ ३ ॥ अब प्यारे भाई भरतके साथ सब लोग वनको जा रहे हैं; परन्तु हम पंख पाकर भी पिंजरोंमें पड़े तरस रहे हैं—'यह हमारा बड़ा भारी दुर्भाग्य ही है' ॥ ४ ॥ सारिकाके ये वचन सुनकर तोता बोला—'अरी मैया ! प्रेमका पंथ निराला समझकर तू मौन हो रह । देख, जो उनके साथ गये थे वे भी प्रभुको वनमें पहुँचाकर कर्म (भाग्य) के गुणों- की निन्दा करते हुए फिर लौट आये ॥ ५ ॥ संसारमें जीवन तो सीता और लक्ष्मणका ही है तथा मरण केवल महाराजने सुधारा है और सब तो प्रेमकी चर्चा ही करते हैं और इसके सिवा उनके लिये कोई चारा भी नहीं है [क्योंकि न तो वे वनहीको जा सकते हैं और न प्राण ही त्याग सकते हैं] ॥ ६ ॥ [ ६७ ] कहै सुक, सुनहि सिखावन, सारो ! बिधि-करतब बिपरीत बाम गति, राम-प्रेम-पथ न्यारो ॥ १ ॥ को नर-नारि अवध खग-मृग, जेहि जीवन रामतें प्यारो । बिद्यमान सबके गवने बन, बंदन करमको कारो ॥ २ ॥

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