भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

गीतावली २४६ 'भाई ! मैं अयोध्यामें रहकर क्या लूँगा ? मैं तो राम, लक्ष्मण और सीताजी के चरण देखनेके लिये कल ही वनको प्रस्थान करूँगा ॥ १ ॥ यद्यपि मुझसे या मेरी कुटिल मातासे बड़ी बुरी बान बन गयी है तो भी परम संकोची भगवान् राम अपने सामने आया देख- कर मुझे अवश्य अपनी शरणमें रख लेंगे' ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, ऐसा कहकर भरतजी प्रातःकाल होते ही वनको चल दिये तथा अन्य लोग भी व्याकुल होकर उसके साथ हो लिये, जैसे वनको भयंकर दावानलसे जलता देखकर पक्षी और मृग उससे निकलकर भागने लगते हैं ॥ ३ ॥ [ ६६ ] सुकसों गहबर हिये कहै सारो । बीर कीर ! सिय-राम-लखन बिनु लागत जग अँधियारो ॥ १ ॥ पापिनि चेरि, अयानि रानि, नृप हित-अनहित न बिचारो । कुलगुर-सचिव-साधु सोचतु, बिधि को त बसाइ उजारो ? ॥ २ ॥ अवलोके न चलत भरि लोचन, नगर कोलाहल भारो । सुने न बचन करुना करके, जब पुर-परिवार संभारो ॥ ३ ॥ भैया भरत भायतेके, सँग वन सब लोग सिधारो । लुन पंख बाढ़ पींजरनि तरसत अधिक अभाग हमारो ॥ ४ ॥ सुनि खग कहत अंब ! मौंगी रहि समुझि प्रेमपथ न्यारो । गए ते प्रभुहि पहुंचाइ फिरे पुनि करत करम-गुन गारो ॥ ५ ॥ जीवन जग जानकी-लखनको, मरन महीप सँवारो । तुलसी और प्रीतिकी चरचा करत, कहा कछु चारो ॥ ६ ॥ (इस समय) एक सारिका (मैना) हृदय भरकर शुकसे कहने लग— 'भैया कीर ! सीता, राम और लक्ष्मणके बिना तो सारा