गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २५२ आप उस पवित्र पुरीमें पधारिये और अपने आत्मीयोंके दुःसह दुःखको दूर कीजिये ॥ २ ॥ मेरा जीवन भी ऐसा ही समझिये जैसे कोई सर्प फणकी मणि खो जानेपर जीवित रहता हो। कोसलनाथ ! आप [ बड़े भाईके रहते हुए छोटेको राज्य मिलनारूप ] यह कुलका कलंक नष्ट कीजिये और अपने बदले मुझे वन जानेकी आज्ञा दीजिये ॥ ३ ॥ और मुझे तो जो भी दोष लगाया जाय वही लग सकता है, क्योंकि इस शरीरकी उत्पत्ति कुमातासे हुई है । किन्तु प्रभो ! आप तो मेरे सब अपराधोंको भूलकर अपने विरद [शरणागतपालकत्व] की ही लाज रखिये ॥ ४ ॥ [ ७२ ] तात ! विचारो धौं, हौं क्यों आवौं । तुम्ह सुचि, सुहृद, सुजान सकल बिधि, बहुत कहा कहि कहि समुझावौं ॥ १ ॥ निज कर खाल खेंचि या तनुतें जो पितु पग पानह करावौं । होउँ न उरिन पिता दसरथतें, कैसे ताके बचन मेटि पति पावौं ॥ २ ॥ तुलसिदास जाको सुजस तिहूँ पुर, क्यों तेहि कुलहि कालिमा लावौं । प्रभु-रुख निरख निरास भरत भए, जान्यो है सबहि भाँति बिधि बाधौं ॥ ३ ॥ [इसपर रघुनाथजी कहने लगे—] 'भैया ! सोचो, तो मैं 'किस प्रकार लौट सकता हूँ ? तुम सब प्रकार निर्दोष, सुहृद् और समझदार हो । तुम्हें बहुत कहकर क्या समझाऊँ ? ॥ १ ॥ यदि मैं अपने हाथसे ही इस शरीरकी खाल खींचकर पिताजीके चरणोंकी जूतियाँ बनवाऊँ तो भी पिता दशरथजीसे मैं उऋण नहीं हो सकता;