गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४३ अयोध्याकाण्ड फिर उनके वाक्योंकी अवहेलना करके मैं कैसे विश्वासपात्र हो सकता हूँ ! ॥ २ ॥ मैया ! जिस कुलका सुयश तीनों लोकोंमें छाया हुआ है, उसे मैं कैसे कलङ्कित कर सकता हूँ !' तुलसीदास कहते हैं, प्रभुका ऐसा भाव देखकर भरतजी निराश हो गये और उन्होंने विधाताको सब प्रकार वाम समझा ॥ ३ ॥ [ ७३ ] बहुरो भरत कह्यो कछु चाहें । सकुच-सिंधु बोहित बिबेक करि बुद्धि-बल बचन निबाहैं ॥ १ ॥ छोटेहुतें छोह करि आए, मैं सामुहैं न हेरो । एकहि बार आजु बिधि मेरो लील-सनेह निबेरो ॥ २ ॥ तुलसी जो फिरिबो न बने, प्रभु ! तौ हौं आयसु पावौं । घर फेरिए, लषन लरिका हैं, नाथ साथ हौं आवौं ॥ ३ ॥ भरतजी फिर भी कुछ कहना चाहते हैं । अतः संकोचरूप समुद्रमें विवेको नौका बनाकर उसपर वचनरूप पथिकोंको बुद्धिरूप केवटके बलसे पार करना चाहते हैं ॥ १ ॥ [वे कहने लगे—] 'छोटेपनमें तो प्रभु मुझपर सदासे ही स्नेह कहते रहे हैं और मैंने भी आपको सामने पड़कर कभी नहीं देखा । किन्तु आज विधाताने एक ही बार मेरे शील और स्नेहको दूर कर दिया ॥ २ ॥ अच्छा, यदि घर लौटना सम्भव न हो तो प्रभुसे मुझे इतनी ही आज्ञा मिल जाय कि लक्ष्मण मुझसे छोटी अवस्थाके लड़के हैं, अतः इन्हें घर भेज दिया जाय और मैं स्वामी साथ चलूँ ॥ ३ ॥ [ ७४ ] रघुपति ! मोहि संग किन लीजै ? बारबार 'पुर जाहु,' नाथ ! केहि कारन आयसु दीजै ॥ १ ॥