गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २५४ जद्यपि हौँ अति अधम, कुटिलमति, अपराधिनिको जायो । प्रनतपाल कोमल-सुभाव जिय जानि, सरन तकि आयो ॥ २ ॥ जो मेरे तजि चरन आन गति, कहौँ हृदय कछु राखी । तौ परिहरहु दयालु, दीनहित, प्रभु, अभ्यंतर-साखी ॥ ३ ॥ ताते नाथ ! कहौँ मैं पुनि पुनि, प्रभु पितु, मातु, गोसाईं । 'भजनहीन नरदेह वृथा, खर-स्वान-फेरुकी नाईं ॥ ४ ॥ बंधु-बचन सुनि श्रवन नयन-राजीव नीर भरि आए । तुलसिदास प्रभु परम कृपा गहि बांह भरत उर लाए ॥ ५ ॥ [श्रीभरतजी कहते हैं—] 'रघुनाथजी ! आप मुझे साथ क्यों नहीं लेते ? नाथ ! आप बारम्बार 'तुम अयोध्यापुरीको जाओ' ऐसी आज्ञा क्यों देते हैं ? ॥ १ ॥ यद्यपि मैं बड़ा ही नीच, कुटिल- मति और अपराधिनीके गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ, तो भी आपका कोमल स्वभाव है तथा आप शरणागतवत्सल हैं—ऐसा चित्तमें समझकर मैं आपकी शरण ताककर आया हूँ ॥ २ ॥ यदि मुझे आपके चरणोंको छोड़कर कोई और गति हो अथवा मैं चित्तमें किसी प्रकारका भेद रखकर कहता होऊँ तो हे दीनहितकारी दयामय देव ! आप मुझे त्याग दें; क्योंकि प्रभु सबके अन्तःकरणोंके साक्षी हैं ॥ ३ ॥ हे नाथ ! आप ही हमारे पिता, माता और स्वामी हैं, इसीसे मैं बारम्बार [आपकी सेवामें रहनेके लिये] कह रहा हूँ, क्योंकि यह मनुष्य-शरीर आपका भजन किये बिना तो गधे, कुत्ते और गीदड़के समान वृथा ही है' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, भाई भरतके ये वचन कानोंसे सुनकर प्रभुके नेत्रकमलोंमें जल भर आया और उन्होंने परम कृपावश उन्हें बांह पकड़कर हृदयसे लगा लिया ॥ ५ ॥