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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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२५५ अयोध्याकाण्ड [ ७५ ] काहेको मानत हानि हिये हौँ ? प्रीति-नीति-गुन-सील-धरम कहँ तुम अवलंब दिये हौ ॥ १ ॥ तात ! जात जानिबे न ए दिन, करि प्रमान पितु-बानी । ऐहौँ बेगि, धरहु धीरज उर कठिन कालगति जानी ॥ २ ॥ तुलसिदास अनुजहि प्रबोधि प्रभु चरनपीठ निज दीन्हें । मनहु सबनिके प्रान-पाहरू भरत सीस धरि लीन्हें ॥ ३ ॥ [भगवान् बोले—] 'भैया ! अपने हृदयमें ऐसी ग्लानि क्यों मानते हो ? तुमने तो प्रीति, नीति, गुण, शील और धर्म—सभीको सहारा दे रखा है ॥ १ ॥ हे तात ! तुम्हें ये दिन तो जाते हुए मालूम भी न होंगे । इतनेहीमें मैं पिताके वचनोंको पूरा कर शीघ्र ही लौट आऊँगा । तुम कालकी गतिको कठिन जानकर हृदयमें धैर्य धारण करो' ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, भाई को इस प्रकार समझाकर भगवान्‌ने उन्हें अपनी चरणपादुकाएँ दे दीं और भरतजीने सबके प्राणोंके प्रहरोरूप उन पादुकाओंको अपने सिरपर लगाते हुए ग्रहण किया ॥ ३ ॥ [ ७६ ] बिनती भरत करत कर जोरे । दीनबंधु ! दीनता दीनकी कबहुँ परै जनि भोरे ॥ १ ॥ तुम्हसे तुम्हहि नाथ मोको, मोसे जन तुमको बहुतेरे । इहै जानि, पहिचानि प्रीति, छमिए अघ-औगुन मेरे ॥ २ ॥ यों कहि सीय-राम-पाँयनि परि लषन लाइ उर लीन्हें । पुलक सरीर, नीर भरि लोचन, कहत प्रेम-पन कीन्हें ॥ ३ ॥

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