भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 262

गीतावली २५६

तुलसी बीते अवधि प्रथम दिन जो रघुबीर न ऐहौ । तौ प्रभु-चरन सरोज-सपथ जीवत परिजनहि न पैहौ ॥ ४ ॥ [चलते समय] भरतजी हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं—'हे दीनबन्धो ! इस दीनकी दीनता कभी भूलमें न पड़ जाय ॥ १ ॥ हे नाथ ! मेरे लिये आप-जैसे प्रभु तो आप ही हैं; किन्तु आपके लिये मेरे समान सेवक अनेकों हैं—यह जानकर और मेरी आन्तरिक प्रीति पहचानकर आप मेरे अपराध और अवगुण क्षमा करें' ॥ २ ॥ ऐसा कहकर भरतजीने राम और सीताके चरणोंमें गिरकर लक्ष्मणजीको हृदयसे लगाया और फिर पुलकितशरीर हो, नेत्रोंमें जल भरकर प्रेमकी प्रतिज्ञा करके कहने लगे ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, [वह प्रतिज्ञा यह थी—] हे रघुनाथजी ! वनवासकी अवधि समाप्त हो जानेपर यदि आप पहले ही दिन अयोध्यामें न आये तो प्रभुके चरणकमलोंकी सौगन्ध, आप अपने दासको जीवित न पा सकेंगे ॥ ४ ॥ [ ७७ ] अवसि हौं आयसु पाइ रहौंगो । जनमि कैकयी-कोखि कृपानिधि ! क्यों कछु चपरि कहौंगो ॥ १ ॥ 'भरत भूप, सिय-राम-लषन बन,' सुनि सानंद सहौंगो । पुर-परिजन अवलोकि मातु सब सुख-संतोष लहौंगो ॥ २ ॥ प्रभु जानत, जेहि भाँति अवधिलौं बचन पालि निबहौंगो । आगेकी बिनती तुलसी तब, जब फिरि चरन गहौंगो ॥ ३ ॥ 'कृपानिधे ! आपकी आज्ञा पाकर मैं अवश्य अयोध्यामें ही रहूँगा; कैकेयीके गर्भसे जन्म लेकर भला मैं कोई बात बढ़कर कैसे