गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 263, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२५७ अयोध्याकाण्ड कह सकता हूँ॥ १॥ अब मैं 'भरत राजा हैं और सीता, राम तथा लक्ष्मण वनमें हैं' यह बात सुनकर आनन्दपूर्वक सहन करूँगा तथा नगर, कुटुम्बी लोग और सब माताओंको देखकर सुख एवं सन्तोष पाऊँगा ॥ २ ॥ जिस प्रकार मैं आपकी आज्ञा मानकर वनवासकी अवधिपर्यन्त निर्वाह करूंगा, सो तो प्रभु जानते ही हैं; अब आगेकी विनती उसी समय करूँगा, जब पुनः इन चरणोंको पकडूंगा ॥ ३ ॥ [ ७८ ] प्रभुसों मैं ढीठो बहुत दई है। कीबी छमा, नाथ ! आरतितें कही कुजुगुति नई है॥ १ ॥ यों कहि, बार बार पांयनि परि, पाँवरि पुलकि लई है। अपनो अदिन देखि हौं डरपत, जेहि बिष बेलि बई है॥ २ ॥ आए सदा सुधारि गोसाईं, जनतें बिगरि गई है। थके बचन पैरत सनेह सरि, परचो मानो घोर घई है ॥ ३ ॥ चित्रकूट तेहि समय सबनिकी बुद्धि बिषाद हई है। तुलसी राम-भरतके बिछुरत सिला सप्रेम भई है ॥ ४ ॥ 'इस समय प्रभुके साथ मैंने बहुत ढिठाई की है [ क्योंकि चुप रहनेके बजाय इतना तर्क-वितर्क किया ] । किन्तु हे नाथ ! दुःखके कारण मैंने जो कोई नयी कुयुक्ति कही हो उसे क्षमा करें' ॥ १ ॥ ऐसा कह भरतजीने बारम्बार प्रभुके चरणोंमें गिर पुलकित- शरीर हो उनकी पादुकाएँ उठा लीं [ और कहने लगे— ] 'मैं तो अपना कुसमय देखकर डरता हूँ जिसने इस समय यह सारी विषकी बेलि बोयी है ॥ २ ॥ हे स्वामिन् ! जब-जब दाससे कुछ बिगाड़ हुआ, तब-तब सदासे ही आप सुधारते आये हैं' ऐसा कहकर गी० १७-