गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २५८ भरतजीके वचन थकित हो गये, मानो स्नेह-सरितामें तैरते-तैरते वे किसी भयंकर भँवरमें पड़ गये हों ॥ ३ ॥ उस समय चित्रकूटमें सभीकी बुद्धियाँ विषादग्रस्त हो गयीं । तुलसीदासजी कहते हैं, तब राम और भरतका त्रियोग होने देख वहाँकी शिला भी प्रेमवश (द्रवीभूत) हो गयी ॥ ४ ॥ रामविधुरा अयोध्या [ ७९ ] जबतें चित्रकूटतें आए । नंदिग्राम खनि अवनि, डासि कुस, परनकुटी करि छाए ॥ १ ॥ अजिन बसन, फल असन, जटा धरे रहत अवधि चित दीन्हें । प्रभु-पद-प्रेम-नेम-ब्रत निरखत मुनिन्ह नमित मुख कीन्हें ॥ २ ॥ सिंहासनपर पूजि पादुका बारहि बार जोहारे । प्रभु-अनुराग माँगि आयसु पुरजन सब काज सँवारे ॥ ३ ॥ तुलसी ज्यों ज्यों घटत तेज तनु, त्यों त्यों प्रीति अधिकाई । भए, न हैं, न होहिंगे कबहुँ भुवन भरत-से भाई ॥ ४ ॥ जबसे भरतजी चित्रकूटसे लौटकर आये हैं, तबसे नन्दिग्राममें पृथ्वी खोदकर उसमें कुश बिछा, पत्तोंकी कुटी बना, वहीं रहते हैं ॥ १ ॥ वहाँ मृगचर्म धारण किये फलाहार करते सिरपर जटाएँ धारण कर अवधिमें चित्त लगाये हुए हैं । प्रभुके चरणोंमें उनके प्रेम, नियम और व्रतको देखकर तो मुनियोंने भी लज्जावश अपना मस्तक नीचा कर लिया है ॥ २ ॥ वे प्रभुकी पादुकाओंको सिंहासनपर पूजकर बारम्बार उनकी वन्दना करते हैं और प्रभु-प्रेमसे भरकर उनकी आज्ञा ले पुरवासियोंके सब कार्य सँभालते हैं ॥ ३ ॥