गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 265, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२५६ अयोध्याकाण्ड तुलसीदास कहते हैं, ज्यों ज्यों उनके शरीरका तेज (पुष्टता) घटता है, त्यों-त्यों उनकी प्रीति बढ़ती जाती है। संसारमें भरत-जैसे भाई न कभी हुए हैं, न हैं और न भविष्यमें ही कभी होंगे ॥ ४ ॥ राग रामकली [ ८० ] राखो भगति-भलाई भली भाँति भरत । स्वारथ-परमारथ-पथी जय जय जग करत ॥ १ ॥ जो ब्रत मुनिवरनि कठिन मानसँ आचरत । सो ब्रत लिए चातक-ज्यों, सुनत पाप हरत ॥ २ ॥ सिंहासन सुभग राम-चरन-पीठ धरत । चालत सब राजकाज आयसु अनुसरत ॥ ३ ॥ आपु अवध, बिपिन बंधु, सोच-जरनि जरत । तुलसी सम-बिषम, सुगम-अगम लखि न परत ॥ ४ ॥ भरतने भक्ति और भलाईकी बहुत अच्छी तरह रक्षा की है। वे स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही मार्गोंमें चलनेवाले हैं, सारा संसार उनका जय-जयकार करता है ॥ १ ॥ जिस [अनन्य] व्रतका मुनियोंको मनसे भी आचरण करना कठिन है, उसे उन्होंने चातकके समान निभाया, जिसका श्रवण करनेसे ही सब पाप दूर हो जाते हैं ॥ २ ॥ वे भगवान् रामकी चरणपादुकाओंको एक सुन्दर सिंहासनपर रखते हैं और उनकी आज्ञाका अनुसरण करते हुए सब राजकार्यका सञ्चालन करते हैं ॥ ३ ॥ 'आप स्वयं अयोध्यामें हैं और भाई वनमें हैं' इस शोकरूप दाहसे वे जलते रहते हैं। तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार भरत और रघुनाथजीको [अयोध्या-