भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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और वनकी] समता और विषमता अथवा सुगमता और दुर्गमता दिखायी भी नहीं देती [अर्थात् भरतजीको अयोध्याका सुख प्रतीत नहीं होता और रघुनाथजीको वनका दुःख नहीं जान पड़ता]॥ ४ ॥ [ ८१ ] मोहि भावति, कहि आवति नहि भरतजूकी रहनि । सजल नयन सिथिल बयन प्रभु-गुन-गन कहनि ॥ १ ॥ असन-बसन-अयन-सयन धरम गरुअ गहनि । दिन दिन पन-प्रेम-नेम निरुपाधि निरबहनि ॥ २ ॥ सीता-रघुनाथ-लखन-बिरह-पीर सहनि । तुलसी तजि उभय लोक रामचरन-चहनि ॥ ३ ॥ भरतजीका रहन-सहन मुझे बड़ा प्रिय लगता है, किन्तु कहा नहीं जाता ॥ उनका वह सजल नेत्र और शिथिल वाणीसे प्रभुका गुणगान करना ॥ १ ॥ भोजन, वस्त्र, गृह और शयन-सम्बन्धी कठोर धर्मोंका ग्रहण करना, दिनोंदिन निरुपाधि, प्रतिज्ञा, प्रेम और नियमको निभाना ॥ २ ॥ सीता, राम और लक्ष्मणजीके वियोगकी व्यथा सहन करना तथा लोक-परलोक दोनोंका त्याग कर केवल भगवान् रामके चरणोंकी इच्छा करना [ये सभी अकथनीय हैं] ॥ ३ ॥ [ ८२ ] जानी है संकर-हनुमान-लषन-भरत राम-भगति । कहत सुगम, करत अगम, सुनत मीठी लगति ॥ १ ॥ लहत सकृत, चहत सकल, जुग जुग जगमगत्ति । राम-प्रेम-पथतें कबहूँ डोलति नहिं, डगति ॥ २ ॥ रिद्धि-सिद्धि, बिधि चारि सुगति जा बिनु गति अगति । तुलसी तेहि सनमुख बिनु बिषय-ठगिनि ठगति ॥ ३ ॥