भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 267

रामकी भक्तिको तो श्रीमहादेवजी, हनुमान्‌जी, लक्ष्मणजी एवं भरतजीने भी जाना है। यह कहनेमें सुगम है, किन्तु करनेमें बड़ी ही अगम है और सुननेमें भी बड़ी मीठी जान पड़ती है ॥ १ ॥ इसे चाहते तो सब हैं, परन्तु प्राप्त कोई विरले ही करते हैं; फिर भी यह युग-युगमें जगमगाती रहती है। यह रामप्रेमके मार्गसे कभी विलग नहीं होती और न कभी डगमगाती ही है ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, जिसके बिना ऋद्धि-सिद्धि और [सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य एवं सार्टिरूप] चार प्रकारकी सुगतियाँ गतिरूप होकर भी अगति ही हैं, उस भक्तिके सम्मुख हुए बिना विषयरूप अविद्या ठगती ही रहती है ॥ ३ ॥ राग गौरी [ ८३ ] कैकयी करी धौं चतुराई कौन ? राम-लषन-सिय बनहि पठाए, पति पठाए सुरभौन ॥ १ ॥ कहा भलो धौं भयो भरतको, लगे तरुन-तन दोन ॥ पुरबासिन्हके नयन नीर बिनु कबहुँ तो देखति हौं न ॥ २ ॥ कौसल्या दिन राति बिसूरति, बैठि मनहि मन मौन । तुलसी उचित न होइ रोइबो, प्रान गए संग जौ न ॥ ३ ॥ [कौसल्याजी कहती हैं—] 'कैकेयीने भला क्या चतुराई की ? व्यर्थ राम, लक्ष्मण और सीताको वनमें भेजा और पतिको देवलोक पहुँचा दिया ! ॥ १ ॥ इससे भरतका भी क्या भला हुआ ? तरुण अवस्थामें ही उसके शरीरमें (विरहरूप) दावाग्नि लग गयी, इसके सिवा पुरवासियोंके नेत्र भी मुझे कभी अश्रुहीन दिखायी नहीं