गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेतें' ॥ २ ॥ इस प्रकार कौसल्याजी दिन-रात चुपचाप बैठी मन- ही-मन खिन्न होती रहती हैं और सोचती हैं कि यदि हमारे प्राण रामके साथ नहीं गये तो रोना तो हमें उचित है नहीं ॥ ३ ॥ [ ८४ ] हाथ मींजिबो हाथ रह्यो । लगौ न संग चित्रकूटहुतें, ह्याँ कहा जात बह्यो ॥ १ ॥ पति सुरपुर, सिय-राम-लषन बन, मुनिव्रत भरत गह्यो । हौं रहि घर मसान-पावक ज्यों मरिबोइ मृतक दह्यो ॥ २ ॥ मेरोइ हिय कठोर करिबे कहँ बिधि कहुँ कुलिस लह्यो । तुलसी बन पहुँचाइ फिरी सुत, क्यौं कछु परत कह्यो ? ॥ ३ ॥ [कौसल्याजी सोचती हैं—] 'मेरे हाथ तो हाथ मलना ही लगा है। भला मेरे बिना यहाँ क्या बहा जाता था (क्या नष्ट हो रहा था) जो मैं चित्रकूटसे भी रामके साथ नहीं लगी ॥ १ ॥ पति सुरलोक सिधार गये; राम, लक्ष्मण और सीता वनमें जा बसे और भरतने भी मुनिव्रत धारण कर लिया, किन्तु मैं श्मशानकी अग्निके समान घरमें ही रह गयी; मैंने तो मानो मृत्युरूप मृतकको ही जला डाला है [ अतः अब मुझे मौत भी नहीं आ सकती ] ॥ २ ॥ विधाताको मेरा ही हृदय कठोर बनानेके लिये कहीं वज्र मिल गया था [अर्थात् मेरा हृदय बनाते समय ब्रह्माकी दृष्टिमें वज्र था, वह उससे भी कोई कठोर वस्तु बनाना चाहता था, फलस्वरूप उसने मेरा हृदय बनाया। तात्पर्य यह कि मेरा हृदय वज्रसे भी कठोर है]। हाय ! मैं पुत्रको वनमें पहुँचाकर लौट आयी। ऐसी अवस्थामें कोई बात कैसे कही जा सकती है?' ॥ ३ ॥