गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६३ अयोध्याकाण्ड राग सोरठ [ ८५ ] हौं तो समुझि रही अपनो सो । राम-लषन-सियको सुख मोकहँ भयो, सखी ! सपनो सो ॥ १ ॥ जिनके बिरह-बिषाद बँटावन खग-मृग जीव दुखारी । मोहि कहा सजनी समुझावति, हौं तिन्हकी महतारी ॥ २ ॥ भरत-दसा सुनि, सुमिरि भूपगति, देखि दीन पुरबासी । तुलसी 'राम' कहति हौं सकुचति, ह्वैहै जग उपहाँसी ॥ ३ ॥ 'सखि ! मैं तो अपनी-सी बात समझती हूँ । अरी ! मेरे लिये तो राम, लक्ष्मण और सीताका सुख स्वप्नके समान हो गया ॥ १ ॥ जिनकी विरहव्यथाको बँटानेके लिये आज पशु-पक्षी आदि सभी जीव दुखी हो रहे हैं, अरी सजनी ! उनके विषयमें मुझे क्या समझाती है। मैं तो उनकी माता हूँ ॥ २ ॥ भरतकी दशा सुनकर, महा- राजकी गति स्मरण कर और पुरवासियोंको दीन देखकर मैं तो 'राम' कहनेमें भी सकुचाती हूँ, क्योंकि इससे संसारमें मेरी हँसी होगी [कि देखो, इन दूरके सम्बन्धियोंकी ऐसी दुर्दशा है और स्वयं माता होकर यह जीवन धारण कर रही है] ॥ ३ ॥ [ ८६ ] आली ! हौं इन्हहि बुझावौं कैसे ? लेत हिये भरि भरि पतिको हित, मातुहेतु सुत जैसे ॥ १ ॥ बार बार हिहिनात हेरि उत, जो बोलै कोउ द्वारे । अंग लगाइ लिए बारेतें करुनामय सुत प्यारे ॥ २ ॥ लोचन सजल, सदा सोवत-से, खान-पान बिसराए । चितवत चौंकि नाम सुनि, सोचत राम-सुरति उर आए ॥ ३ ॥