गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २६४ तुलसी प्रभुके विरह बधिक हठि राजहंस-से जोरे। ऐसेहु दुखित देखि हौं जीवति राम-लखनके घोरे॥ ४ ॥ 'अरी सखि! मैं इन घोड़ोंको कैसे समझाऊँ! देख, जैसे माताके लिये पुत्र व्याकुल रहता है उसी प्रकार इनके हृदयमें बारम्बार अपने स्वामी रामकी प्रीति उमड़ आती है॥ १॥ यदि कोई द्वारपर बोलता है तो ये बारम्बार उसी ओर देखकर हिनहिनाने लगते हैं, क्यों? इन्हें मेरे उन करुणामय प्रिय पुत्रोंने बालकपनसे ही अपने-से हिला- मिला लिया था॥ २॥ इनके नेत्र सदा आँसुओंसे भरे रहते हैं और ये खान-पानको भूलकर सदा सोये हुए से रहते हैं। ये रामका नाम सुनते ही चौंक पड़ते हैं और हृदयमें उनका स्मरण आते ही शोकग्रस्त हो जाते हैं॥ ३॥ ये राम-लक्ष्मणके घोड़े राजहंसोंके जोड़ेके समान हैं, हाय! इन्हें प्रभुके वियोगरूप वधिकसे इस प्रकार हठपूर्वक व्यथित होते देखकर भी मैं जी रही हूँ? ॥ ४॥ [ ८७ ] राघौ! एक बार फिरि आवौ। ए बर बाजि बिलोकि आपने, बहुरौ बन ह सिधावौ॥ १ ॥ जे पय प्याइ, पोखि कर-पंकज, बार बार चुचुकारे। क्यों जीवहिं, मेरे राम लाड़िले! ते अब निपट बिसारे॥ २ ॥ भरत सौगुनी सार करत हैं, अति प्रिय जानि तिहारे। तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे, मनहु कमल हिम-मारे॥ ३ ॥ सुनहु पथिक! जो राम मिलहिं बन, कहियो मात-सँदेसो। तुलसी मोहि और सबहिनतें इन्हको बड़ो अंदेसो॥ ४ ॥