गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 271, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२६५ अयोध्याकाण्ड 'हे राघव ! तुम एक बार तो अवश्य लौट आओ। यहाँ अपने इन श्रेष्ठ घोड़ोंको देखकर फिर वनमें चले जाना ॥ १ ॥ जिन्हें तुमने दूध पिलाकर, अपने ही करकमलोंसे पुष्टकर बारम्बार पुचकारा था, ऐ मेरे लाड़िले राम ! वे अब एकाएकी भूल जानेसे कैसे जीवित रह सकेंगे ! ॥ २ ॥ तुम्हारे अत्यन्त प्रिय जानकर यद्यपि भरतजी इनकी सौगुनी सँभाल रखते हैं, तो भी पालेके मारे हुए कमलके समान ये दिन-दिन दुर्बल होते जा रहे हैं ॥ ३ ॥ अरे पथिको ! सुनो, यदि तुम्हें वनमें राम मिल जायें तो तुम उनसे माताका यही सन्देश कहना कि मुझे सबसे बढ़कर इन घोड़ोंकी ही चिन्ता है' ॥ ४ ॥ राग केदारा [ ८८ ] काहूसों काहू समाचार ऐसे पाए। चित्रकूटतें राम-लषन-सिय सुनियत अनत सिधाए ॥ १ ॥ सैल, सरित, निरझर, बन, मुनि-थल देखि-देखि सब आए। कहत सुनत सुमिरत सुखदायक, मानस-सुगम सुहाए ॥ २ ॥ बढ़ अवलंब वाम-विधि विघटित बिषम बिषाद बढ़ाए। सिरिस-सुमन-सुकुमार मनोहर बालक बिंध्य चढ़ाए ॥ ३ ॥ अवध सकल नर-नारि बिकल अति, अकनि बचन अनभाए। तुलसी राम-बियोग-सोग-बस, समुझत नहि समुझाए ॥ ४ ॥ किसीसे किसीने ऐसी खबर पायी है कि राम, लक्ष्मण और सीता चित्रकूटसे कहीं अन्यत्र चले गये—ऐसी सुना जाता है ॥ १ ॥