गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २६६ वे कहते थे कि वहाँके पर्वत, नदी, झरने, वन और मुनियोंके निवासस्थान—ये सब हम देख आये हैं। वे सब कहने, सुनने और स्मरण करनेमें भी सुखदायक हैं तथा मनको भी बड़े सुगम और प्रिय जान पड़ते हैं ॥ २ ॥ इसपर कोई अन्य नागरिक कहने लगे— 'देखो, वाम विधाताने (यौवराज्यरूप) बड़े अवलम्बको तोड़कर यह विषम विषाद बढ़ा दिया कि जो मनोहर बालक सिरस-सुमनके समान सुकुमार थे, उन्हें विन्ध्याचलपर चढ़ना पड़ा' ॥ ३ ॥ वे अप्रिय वचन सुनकर अयोध्याके सब नर-नारी अत्यन्त विकल हो गये। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय वे रामकी विरहव्यथाके कारण समझानेसे भी नहीं समझते थे ॥ ४ ॥ [ ८९ ] सुनी मैं सखि ! मंगल चाह सुहाई। सुभ पत्रिका निषादराजकी आजु भरत पहँ आई ॥ १ ॥ कुँवर सो कुसल-छेम अलि ! तेहि पल कुलगुर कहँ पहुँचाई। गुर कृपालु संभ्रम पुर घर घर सादर सबहि सुनाई ॥ २ ॥ बधिबिराध, सुर-साधु सुखी करि, ऋषि-सिख-आसिष पाई। कुंभज-सिष्य समेत संग सिय, मुदित चले दोउ भाई ॥ ३ ॥ बीच बिंध्य रेवा सुपास थल बसे हैं परन-गृह छाई। पंथ-कथा रघुनाथ पथिककी तुलसिदास सुनि गाई ॥ ४ ॥ 'अरी सखि ! मैंने एक मङ्गलमय शुभ समाचार सुना है। आज भरतजीके पास निषादराजकी एक शुभपत्रिका आयी है ॥ १ ॥ हे आली ! वह कुशलक्षेम-पत्रिका कुँवर भरतजीने तुरन्त