भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

२६७ अरण्यकाण्ड ही कुलगुरु वसिष्ठजीके पास भेज दी थी और कृपालु गुरुजीने उसे हर्ष और आदरके सहित नगरमें घर-घर सबको सुनाया है ॥ २ ॥ [उसमें लिखा है कि] दोनों भाई विराधका वध कर देवता और साधु पुरुषोंको आनन्दित कर, ऋषियोंसे उपदेश और आशीर्वाद पाइ अगस्त्यजीके शिष्य सुतीक्ष्णके साथ सीताजीके सहित आनन्दपूर्वक आगे चले गये हैं ॥ ३ ॥ और इस समय विन्ध्याचल और रेवा (नर्मदा) नदीके बीचमें एक सुभीतेके स्थानपर पत्तोंकी कुटी बना- कर बसे हुए हैं ।' तुलसीदासने भी रघुनाथ बटोहीकी यह पन्थकथा [गुरु और पुराणादिसे] सुनकर गायी है ॥ ४ ॥ अरण्यकाण्ड भगवान्‌का वन-विहार राग मलार [ १ ] देखे राम पथिक नाचत मुदित मोर । मानत मनहु सतड़ित ललित घन, धनु सुरधनु, गरजनि टंकार ॥१॥ कँपै कलाप बर बरहि फिरावत, गावत कल कोकिल-किसोर । जहँ जहँ प्रभु बिचरत, तहँ तहँ सुख, दंडकबन कौतुक न थोर ॥२॥ सघन छांह-तम रुचिर रजनि भ्रम, बदन-चंद चितवत चकोर । तुलसी मुनि खग-मृगनि सराहत, भए हैं सुकृत सब इन्हकी ओर ॥३॥