गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
२६७ अरण्यकाण्ड ही कुलगुरु वसिष्ठजीके पास भेज दी थी और कृपालु गुरुजीने उसे हर्ष और आदरके सहित नगरमें घर-घर सबको सुनाया है ॥ २ ॥ [उसमें लिखा है कि] दोनों भाई विराधका वध कर देवता और साधु पुरुषोंको आनन्दित कर, ऋषियोंसे उपदेश और आशीर्वाद पाइ अगस्त्यजीके शिष्य सुतीक्ष्णके साथ सीताजीके सहित आनन्दपूर्वक आगे चले गये हैं ॥ ३ ॥ और इस समय विन्ध्याचल और रेवा (नर्मदा) नदीके बीचमें एक सुभीतेके स्थानपर पत्तोंकी कुटी बना- कर बसे हुए हैं ।' तुलसीदासने भी रघुनाथ बटोहीकी यह पन्थकथा [गुरु और पुराणादिसे] सुनकर गायी है ॥ ४ ॥ अरण्यकाण्ड भगवान्का वन-विहार राग मलार [ १ ] देखे राम पथिक नाचत मुदित मोर । मानत मनहु सतड़ित ललित घन, धनु सुरधनु, गरजनि टंकार ॥१॥ कँपै कलाप बर बरहि फिरावत, गावत कल कोकिल-किसोर । जहँ जहँ प्रभु बिचरत, तहँ तहँ सुख, दंडकबन कौतुक न थोर ॥२॥ सघन छांह-तम रुचिर रजनि भ्रम, बदन-चंद चितवत चकोर । तुलसी मुनि खग-मृगनि सराहत, भए हैं सुकृत सब इन्हकी ओर ॥३॥
गीतावली २६८ पथिक रामको देखकर मयूर आनन्दित होकर नाचते हैं। वे सीतारामको देखकर मानो उन्हें बिजलीसहित सुन्दर मेघ समझते हैं तथा उनके धनुषको इन्द्रधनुष और उसके टंकारको मेघकी गर्जन जानते हैं ॥ १ ॥ सुन्दर-सुन्दर मोर अपने पिच्छसमूहको हिलाते हुए नाचते हैं और कोकिलशावक सुमधुर गान करते हैं। प्रभु जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहीं-वहीं आनन्द दिखाया पड़ता है, इस प्रकार दण्डक वनमें कुछ कम कुतूहल नहीं है ॥ २ ॥ सघन वृक्षोंकी छायाके अन्धकारमें चाँदनी रातका भ्रम हो जानेसे चकोर प्रभुके मुखरूप चन्द्रमाकी ओर निहारने लगता है। तुलसीदासजी कहते हैं, इस समय मुनिजन भी पशु-पक्षियोंकी सराहना करते हैं और कहते हैं कि सारे सुकृत इन्हींके पक्षमें हैं ॥ ३ ॥ राग कल्याण [ २ ] सुभग सरासन सायक जोरे। खेलत राम फिरत मृगया बन, बसति सो मृदु मूरति मन मोरे ॥१॥ पीत बसन कटि, चारु चारि सर, चलत कोटि नट सो तृन तोरे। स्यामल तनु श्रम-कन राजत, ज्यों नव घन सुधा-सरोवर खोरे ॥२॥ ललित कंध, बर भुज, बिसाल उर, लेहिं कंठ-रेखें चित चोरे। अवलोकत मुख देव परम सुख, लेत सरद-ससिकी छबि छोरे ॥३॥ जटा मुकुट सिर, सारस-नयननि गौहैं तकत सुभौंह सकोरे। सोभा अमित समाति न कानन, उमगि चली चहुँ दिसि मिति फोरे ॥४॥ चितवत चकित कुरंग-कुरंगिनि, सब भए मगन मदनके भोरे। तुलसिदास प्रभु बान न मोचत सहज सुभाय प्रेमबस थोरे ॥५॥
२६६ अरण्यकाण्ड भगवान् राम अपने सुन्दर धनुषपर बाण चढ़ाये वनमें मृगया खेलते फिर रहे हैं। वह मधुर मूर्ति मेरे हृदयमें निवास करती है ॥ १ ॥ उनकी कमरमें पीताम्बर और अति सुन्दर चार बाण हैं। उनकी चालको देखकर करोड़ों नट (नृत्यकार) मुग्ध होकर तण्ह तोड़ते हैं, [जिससे उस चालपर नजर न लगे]। प्रभुके श्याम शरीर- पर पसीनेकी बूंदें ऐसी शोभायमान हैं जैसे कोई नवीन मेघ अमृतके सरोवरमें डुबकी लगाकर निकला हो ॥ २ ॥ प्रभुके कन्धे बड़े सुन्दर हैं, भुजाएँ मनोहर हैं, वक्षःस्थल विशाल है और कण्ठकी रेखाएँ तो चित्तको चुराये लेती हैं। भगवान्का मुख देखनेसे बड़ा ही आनन्द देता है और मानो शरच्चन्द्रकी छबिको छीन लेता है ॥ ३ ॥ प्रभुके सिरपर जटाओंका मुकुट है और जिस समय वे भौंहें सिकोड़कर अपने नयनकमलोंसे निशानेकी ओर ताकते हैं, उस समयकी अपार सोभा तो सारे वनमें भी नहीं समाती; वह मर्यादा छोड़कर मानो चारों दिशाओंमें उमड़कर फैल जाती है ॥ ४ ॥ उस समय मृग और मृगी भी चकित होकर उन्हींकी ओर देखने लगते हैं, मानो सब-के-सब प्रभुको कामदेव समझकर मोहित हो गये हैं। तुलसीदास कहते हैं, किन्तु उस समय प्रभु बाण नहीं छोड़ते, क्योंकि वे स्वभावसे ही थोड़े-से प्रेमके भी वशीभूत हो जानेवाले हैं ॥ ५ ॥ मारीच-वध राग सोरठ [ ३ ] बैंठे हैं राम-लखन अरु सीता। पंचबटी बर परनकुटी तर, कहैं कछु कथा पुनीता ॥ १ ॥
गीता० २७० कपट-कुरंग कनकमनिमय लखि प्रियसों कहति हँसि बाला । आए पालिबे जोग मंजु मृग, मारेहु मंजुल छाला ॥ २ ॥ प्रिया-वचन सुनि बिहँसि प्रेमबस गवहिं चाप-सर लीन्हें । चल्यो भाजि, फिरि फिरि चितवत मुनिमख-रखवारे चीन्हें ॥ ३ ॥ सोहति मधुर मनोहर मूरति हेम हरिनके पाछे । धावनि, नवनि, बिलोकनि, बिनकनि बसे तुलसी उर आछे ॥ ४ ॥ पञ्चवटीमें सुन्दर पर्णकुटीके भीतर राम, लक्ष्मण और सीता बैठे हुए हैं और आपसमें कुछ पवित्र कथाएं कह रहे हैं ॥ १ ॥ इतनेमें ही एक सुवर्ण और मणिमय कपटमृगको देखकर सीताजीने अपने प्रियतमसे हँसकर कहा—'यह मनोहर मृग यदि पकड़ लिया जाय तो पालनेयोग्य है और यदि मारा भी जाय तो भी इसकी मृगछाला बड़ी सुन्दर है' ॥ २ ॥ प्राणप्रियाके ये वचन सुन हँसकर श्रीरघुनाथजीने उसके प्रेमवश धीरेसे हाथमें धनुष-बाण लिये । उन्हें देखकर वह मृग बार-बार पीछेको देखता हुआ दौड़ चला; उसने विश्वामित्र मुनिके यज्ञकी रक्षा करनेवाले भगवान् रामको पहचान लिया ॥ ३ ॥ सुवर्णमय मृगके पीछे भगवान्की अतिशय मधुर और मनोहर मूर्ति बड़ी शोभायमान जान पड़ती है । उस समयका प्रभुका दौड़ना, झुकना, देखना और थककर खड़ा रह जाना तुलसीदासके हृदयमें अच्छी तरह बसा हुआ है ॥ ४ ॥ राग कल्याण [ ४ ] कर सर-धनु, कटि रुचिर निषंग । प्रिया-प्रीति-प्रेरित बन-बीथिन्ह बिचरत कपट-कनक-मृग संग ॥१॥
२७१ अरण्यकाण्ड भुज बिसाल, कमनीय कंध-उर, श्रम-सीकर सोहैं साँवरे अंग। मनु मुकुता मनि मरकतगिरिपर लसत ललित रबि-किरनि प्रसंग ॥२॥ नलिन नयन, सिर जटा-मुकुट, बिच सुमन-माल मनु सिव-सिर गंग। तुलसिदास ऐसी मूरतिकी बलि, छबि बिलोकि लाजैं अमित अनंग ॥३॥ प्रभुके हाथमें धनुष-बाण हैं और कमरमें मनोहर तरकस है। प्रियाकी प्रीतिसे प्रेरित होकर वे वन्यमार्गोंमें कपटमय कनकभृगके साथ-साथ डोल रहे हैं ॥ १ ॥ उनकी भुजाएँ विशाल हैं, कन्धे और वक्षःस्थल सुन्दर हैं तथा साँवले शरीरपर पसीनेकी बूंदें शोभायमान हैं। मानो मरकतमणिके पर्वतपर मनोहर सूर्यकिरणोंका संग पाकर मोती सुशोभित हो रहे हैं ॥ २ ॥ प्रभुके कमलके समान नेत्र हैं, सिरपर जटाओंका मुकुट है और उसके बीचमें पुष्पोंकी माला गूंथी हुई है, जैसे शिवजीके मस्तकपर गङ्गाजी विराजमान हों। तुलसी- दास ऐसी मूर्तिपर बलिहारी है, जिसकी छविको देखकर अनन्त कामदेव भी लज्जित हो जाते हैं ॥ ३ ॥ राग केदारा [ ५ ] राघव, भावति मोहि बिपिनकी बीथिन्ह धावनि। अरुन-कंज-बरन चरन सोकहरन, अंकुस-कुलिस-केतु-अंकित अवनि ॥१॥ सुंदर स्यामल अंग, बसन पीत सुरंग, कटि निषंग परिकर मेरवनि। कनक-कुरंग संग, साजे कर सर-चाप, राजिवनयन इत उत चितवनि ॥२॥ सोहत सिर मुकुट जटा-पटल-निकर, सुमन-लता सहित रची बनवनि। तैसेई श्रम-सीकर रुचिर राजत मुख, तैसिए ललित भृकुटिन्हकी नवनि ॥३॥
गीतावली २७२ देखत खग-निकर, मृग रवनिन्हजुत, थकित बिसारि जहाँ तहाँकी भँवनि । हरि-दरसन-फल पायो है ग्यान बिमल, जांचत भगति, मुनि चाहत जवनि ॥४॥ जिन्हके मन मगन भए हैं रस सगुन, तिन्हके लेखे अगुन मुकुति कवनि। श्रवन-सुखकरनि, भवसरिता-तरनि, गावत तुलसिदास कीरति पवनि ॥५॥ हे राघव ! मुझे आपका वनकी वीथियों दौड़ना बड़ा प्रिय जान पड़ता है, जिससे वहाँकी पृथिवी आपके अरुणकमलवर्ण शोक- हारी चरणोंके अंकुश, वज्र एवं ध्वजा आदि चिह्नोंसे अङ्कित हो रही है ॥ १ ॥ अति सुन्दर श्याम शरीरपर रँगीला पीताम्बर धारण करना, कमरमें तरकस और फेंटा बाँधना, सुवर्णमृगके साथ हाथमें धनुष-बाण लिये दौड़ना, नेत्रकमलोंसे इधर-उधर निहारना ॥ २ ॥ तथा सिरपर पुष्प और लताओंके सहित जटाजूटके मुकुटकी रचना—ये सब बड़े ही शोभायमान जान पड़ते हैं । इसी प्रकार आपके मनोहर मुखारविन्दपर पसीनेके बूँदें शोभाय- मान हैं और उसी तरह मनोहर भ्रुकुटियोंका झुकाव भी है ॥ ३ ॥ उस समय पक्षिसमूह तथा मृगियोंके सहित मृग प्रभुकी सुन्दरता देखकर थकित हो जाते हैं और जहाँ-के-तहाँ भ्रमण करना छोड़ देते हैं। इन्हें प्रभुके दर्शनोंका फलस्वरूप निर्मल ज्ञान तो मिल गया है, अब जिसे मुनिजन भी चाहते हैं, उस अहैतुकी भक्तिकी याचना और करते हैं ॥ ४ ॥ भला जिनके चित्त सगुण- स्वरूपके रसमें डूबे हुए हैं, उनके लिये गुणहीन मुक्ति क्या चीज
२७३ अरण्यकाण्ड है ? तुलसीदास तो प्रभुकी श्रवणसुखदायिनी, संसारसरिन्नित्तारिणी पवित्र कीर्तिका ही गान करता है ॥ ५ ॥ राग सोरठा [ ६ ] रघुबर दूरि जाइ मृग मारयो । लखन पुकारि, राम हरुए कहि, मरतहु बैर सँभारयो ॥ १ ॥ सुनहु तात ! कोउ तुम्हहि पुकारत प्राननाथको नाईं । कह्यो लषन, हत्यो हरिन, कोपि सिय हठि पठयो बरि आईँ ॥ २ ॥ बंधु बिलोकि कहत तुलसी प्रभु 'भाई ! भली न कीन्हीं । मेरे जान जानकी काहू खल छल करि हरि लीन्हीं' ॥ ३ ॥ रघुनाथजीने बड़ी दूर जाकर उस मृगका वध किया। उसने 'हा लक्ष्मण !' ऐसा जोरसे पुकारकर, धीरेसे 'राम' कहा और इस प्रकार मरते समय भी अपनी पूर्व-शत्रुताको याद रक्खा ॥ १ ॥ [तब सीताजीने कहा-] 'लक्ष्मण ! सुनो, तुम्हें प्राणनाथ प्रभु रामके समान कोई पुकार रहा है।' तब लक्ष्मणजीने कहा- 'कुछ नहीं, हरिण मारा गया है।' इसपर सीताजीने कुपित होकर उन्हें हठपूर्वक बलात् भेज दिया ॥ २ ॥ उस समय भाईको आता देख तुलसीदास- के प्रभु भगवान् राम कहने लगे- 'भैया ! तुमने अच्छा नहीं किया; मेरे विचारसे तो किसी दुष्टने इस प्रकार छल करके जानकीको हर लिया है' ॥ ३ ॥ सीता-हरण [ ७ ] आरत बचन कहति बैदेही । बिलपति भूरि बिसूरि 'दूरि गए मृग सँग परम सनेही ॥ १ ॥ गी० १८-
कहे कटु बचन, रेख नाँघी मैं, तात छमा सो कीजै। देखि बधिक-बस राजमरालिनि, लषनलाल ! छिनि लीजै ॥ २ ॥ बनदेवनि सिय कहन कहति यों छल करि नीच हरी हौं। गोमर-कर सुरधेनु, नाथ ! ज्यों त्यों पर-हाथ परी हौं ॥ ३ ॥ तुलसिदास रघुनाथ-नाम-धुनि अकनि गीध धुनि धायो। 'पुत्रि पुत्रि ! जनि डरहि, न जैहै नीचु, मीचु हौं आयो' ॥ ४ ॥ [लक्ष्मणजीके चले जानेपर रावण यतिवेष धारण कर पञ्चवटी- में आया और भिक्षाके मिससे सीताजीको पास बुला, उन्हें रथपर बिठाकर ले चला।] उस समय सीताजी आर्त वचन कहने लगीं और 'हाय ! परमप्रिय भगवान् राम मृगके साथ न जाने कितनी दूर निकल गये' ऐसा कहकर बहुत दुःख करके रोने लगीं ॥ १ ॥ 'लषणलाल ! मैंने तुमसे कठोर वचन कहे और तुम्हारी खींची हुई रेखाको लाँघा, सो हे तात ! तुम क्षमा करो और इस समय इस राजहंसीको बधिकके हाथमें पड़ी देखकर उससे छीन लो' ॥ २ ॥ फिर वनदेवताओंसे वे इस प्रकार संदेशा कहने लगीं-[तुम भगवान् रामसे कहना कि ] 'मुझे नीच रावणने छल करके हर लिया है। हे नाथ ! कसाईके हाथ जैसे कामधेनु पड़ जाय, उसी प्रकार इस समय मैं शत्रुके हाथमें पड़ गयी हूँ' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस समय सीताजीके मुखसे रघुनाथजीके नामकी ध्वनि सुनकर गृध्रराज क्रुद्ध होकर दौड़ा और बोला-'बेटी! डर मत। अब यह नीच बचकर नहीं जा सकता, उसका कालरूप मैं आ गया हूँ' ॥ ४ ॥ जटायु-वध [ ८ ] फिरत न बारहि बार प्रचारचो। चपरि चोंच-चंगुल हय हति, रथ खंड खंड करि डारचो ॥ १ ॥
२७५ अरण्यकाण्ड बिरथ बिकल कियो, छीन लीन्हि सिय, घन घायनि अकुलान्यो ॥ तब असि काढ़ि, काटि पर पाँवर लै प्रभु-प्रिया परान्यो ॥ २ ॥ रामकाज खगराज आजु लरचो, जियत न जानकि त्यागी ॥ तुलसिदास सुर-सिद्ध सराहत, धन्य बिहँग बड़भागी ॥ ३ ॥ जटायुने रावणको बारम्बार फटकारा, परन्तु वह पीछे नहीं फिरा, तब उसने बड़ी फुर्तीसे चोंच और पंजोंसे घोड़ोंको मारकर रथके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ १ ॥ फिर रावणको रथहीन करके व्याकुल कर दिया और सीताजीको छीन लिया। तब नीच रावणने बहुत-से घावोंसे व्यथित हो तलवार निकालकर उसके पंख काट डाले और प्रभुकी प्राणप्रिया सीताजीको लेकर चल दिया ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय देवता और सिद्धगण जटायुकी प्रशंसा करने लगे कि देखो, आज रामकार्यके लिये पक्षिराजने रावणसे युद्ध किया और जीते-जी जानकीको नहीं छोड़ा। बड़भागी जटायु धन्य हैं ॥ ३ ॥ रामकी वियोग-व्यथा राग गौरी [ ९ ] हेमको हरिन हनि फिरे रघुकुल-मनि, लषन ललित कर लिये मृगछाल ॥ आश्रम आवत चले, सगुन न भए भले, फरके बाम बाहु, लोचन बिसाल ॥ १ ॥ सरित-जल मलिन, सरनि सूखे नलिन, अलि न गुंजत, कल कूजें न मराल ॥
गीतावली २७६ कोलिनि-कोल-किरात जहां तहां बिलखात, बन न बिलोकि जात खग-मृग-माल ॥ २ ॥ तरु जे जानकी लाए, ज्याये हरि-करि-कपि, हेरें न हुँकरि, झरें फल न रसाल । जे सुक-सारिका पाले, मातु ज्यों ललकि लाले, तेऊ न पढ़त, न पढ़ावैं मुनिबाल ॥ ३ ॥ समुझि सहमे सुठि, प्रिया तौ न आई उठि, तुलसी बिबरन परन-तृन-साल । औरै सो सब समाजु, कुसल न देखौं आजु, गहबर हिय कहैं कोसलपाल ॥ ४ ॥ इतनेहीमें रघुवंशमणि भगवान् राम कनकमृगको मारकर लौटे। लक्ष्मणजी अपने हाथमें उसकी मनोहर मृगछाला लिये हुए थे। आश्रमको आते समय उन्हें अच्छे शकुन नहीं हुए। उनकी वाम भुजा और विशाल नयन फड़क रहे थे ॥ १ ॥ नदियोंका जल मैला दिखायी देता था। कमल तालाबोंमें भी सूख रहे थे, भ्रमर गुंजार नहीं करते थे और हंस मनोहर शब्द नहीं करते थे। किरात, कोल और कोलिनी जहां-तहां बिलख रहे थे, वनके पक्षी और मृगसमूहकी ओर देखा नहीं जाता था ॥ २ ॥ जानकीजीने जिन वृक्षोंको लगवाया था, वे रसीले फल नहीं देते थे और जिन सिंह, हाथी और वानरोंका उन्होंने पोषण किया था, वे हुंकार भरकर देखते नहीं थे । जिन शुक और सारिकाओंको सीताजीने पाला था और माताके समान बड़े चावसे जिन्हें लाड़ लड़ाया था, वे भी इस समय पढ़ते नहीं थे और न मुनि- बालिकाएँ उन्हें पढ़ाती ही थीं ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, जब
२७७ अरण्यकाण्ड कोसलपाल प्रभु रामने देखा कि प्राणप्रिया सीताजी स्वागत करनेके लिये नहीं आयीं और पर्णकुटी भी विवरण (कान्तिहीन) जान पड़ती है तो वे सब रहस्य जानकर सहम गये और विह्वलहृदयसे कहने लगे—'आज सारा समाज और ही तरहका हो रहा है, मुझे कुशल नहीं जान पड़ती' ॥ ३ ॥ [ १० ] आश्रम निरखि भूले, द्रुम न फले न फूले, अलि-खग-मृग मानो कबहुँ न हे। मुनि न मुनिबधूटी, उजरी परनकुटी, पंचबटी पहिचानि ठाढ़ेइ रहे ॥ १ ॥ उठी न सलिल लिए, प्रेम मुदित हिए, प्रिया न पुलकि प्रिय बचन कहे। पल्लव-सालन हेरी, प्रानबलभा न टेरी, बिरह बिथकि लखि लषन गहे ॥ २ ॥ देखे रघुपति-गति बिबुध बिकल अति, तुलसी गहन बिनु दहन बहे। अनुज दियो भरोसो, तौलौँहै सोचु खरो सो, सिय-समाचार प्रभु जौलौं न लहे ॥ ३ ॥ वे आश्रमको देखकर भी भूल गये, क्योंकि वहाँके वृक्ष न फूले हैं, न फले हैं। भौंरे, पक्षी और मृग तो मानो वहाँ कभी थे ही नहीं; इसके सिवा न वहाँ मुनि थे और न मुनिपत्नियाँ ही। पर्णकुटी भी उजड़ी पड़ी थी। भगवान् पञ्चवटीको पहचानकर खड़े ही रह गये ॥ १ ॥ वे कहने लगे—'आज प्राणप्रिय प्रसन्नचित्तसे जल लेकर नहीं उठी और न उसने कोई प्रिय वचन ही कहे, [और दिकको
गीतावली २७८ तरह] आज पत्तोंके झरोखोंमेंसे देखकर उसने आवाज भी नहीं दी।' इस प्रकार विरह-व्यथासे थकित देखकर उन्हें लक्ष्मणजीने पकड़ लिया ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, रघुनाथजीकी ऐसी दशा देखकर देवतालोग बड़े व्याकुल हो गये और वन अग्निके बिना ही दग्धसे हो गये। तब भाई लक्ष्मणने उन्हें भरोसा दिया कि जबतक प्रभुको सीताजीका समाचार नहीं मिलता तभीतक यह शोक खड़ा- सा रहेगा॥ ३ ॥ राग सोरठ [ ११ ] जबहिं सिय-सुधि सब सुरनि सुनाई। भए सुनि सजग, बिरहसरि पैरत थके थाह-सी पाई ॥ १ ॥ कसि तुनीर-तीर धनु-धर-धुर धीर बीर दोउ भाई। पंचबटी-गोदहि प्रनाम करि, कुटी दाहिनी लाई ॥ २ ॥ चले बूझत बन-बेलि-बिटप, खग-मृग, अलि-अवलि सुहाई। प्रभुकी दसा सो समौ कहिबे को कबि उर आह न आई ॥ ३ ॥ रटनि अकनि पहिचानि गीध फिरे करुनामय रघुराई। तुलसीदासहि प्रिया बिसरि गईं, सुमिरि सनेह-सगाई ॥ ४ ॥ जिस समय देवताओंने सीताकी सारी सुधि कही, उस समय भगवान् उसे सुनकर सचेत हो गये। वे विरहरूप नदीमें तैर रहे थे, सो तैरते-तैरते इस समय उन्हें कुछ सहारा-सा मिल गया ॥ १ ॥ तब धनुर्धरोंमें धुरन्धर दोनों धीर-वीर भाई तीर और तरकस कस, पञ्चवटी और गोदावरीको प्रणाम कर कुटीकी प्रदक्षिणा कर वनके लता, वृक्ष, पक्षी, मृग और सुन्दर भ्रमरनिकरसे पूछते हुए आगे चले।
२७९ : अरण्यकाण्ड उस समयकी प्रभुकी दशाका वर्णन करनेको कविके हृदयमें हिम्मत ही नहीं रही [अर्थात् वे भी शोकके कारण अवाक् रह गये] ॥२-३॥ इतनेमें ही राम-नामकी रटन सुन गृध्रराजको पहचानकर करुणामय प्रभु लौटे। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय जटायुका प्रेम-सम्बन्ध याद आनेसे भगवान् रामको प्रियाका भी स्मरण नहीं रहा ॥४॥ जटायुसे भेंट [१२] मेरे एकौ हाथ न लागी। गयो बपु बीति बादि कानन, ज्यों कल्पलता दव दागी ॥१॥ दसरथसों न प्रेम प्रतिपाल्यो, हुतो जो सकल जग साखी। बरबस हरत निसाचर पतिसों हठि न जानकी राखी ॥२॥ मरत न मैं रघुबीर बिलोके तापस बेष बनाए। चाहत चलन प्रान पाँवर बिनु सिय-सुधि प्रभुहि सुनाए ॥३॥ बारबार कर मीजि, सीस धुनि गीधराज पछिताई। तुलसी प्रभु कृपालु तेहि औसर आइ गए दोउ भाई ॥४॥ [गृध्रराज मन-ही-मन पश्चात्ताप कर रहे हैं] 'हाय ! मेरे हाथ एक भी बात नहीं लगी। सिज प्रकार वनमें कल्पलता—किसीके काम न आकर—दावानलसे दग्ध हो जाय, उसी प्रकार मेरा शरीर भी यों ही समाप्त हो गया ॥ १ ॥ दशरथजीसे हमारा प्रेम था— इसको सारा जगत् जानता है, किन्तु मैं उसे भी नहीं निभा सका, क्योंकि जिस समय राक्षसराज सीताको हरे लिये जाता था, उस समय मैं उसे बलपूर्वक रोक न सका ॥ २ ॥ मरनेके समय भी मैं मुनिवेष- धारी रामको न देख सका; अब प्रभुको सीताजीकी सुधि सुनाये बिना
ही ये पामर प्राण प्रयाण करना चाहते हैं' ॥ ३ ॥ इस प्रकार गृध्रराज बारम्बार हाथ मल सीस धुन-धुनकर पछताते हैं। इसी समय तुलसीदासके प्रभु दोनों कृपालु भाई वहाँ आ गये ॥ ४ ॥ [ १३ ] राघौ गीध गोद करि लीन्हों। नयन-सरोज सनेह-सलिल सुचि मनहु अरघजल दीन्हों ॥ १ ॥ सुनहु, लषन ! खगपतिहि मिले बन मैं पितु-मरन न जान्यौ। सहि न सक्यौ सो कठिन बिधाता, बड़ो पछु आजुहि भान्यौ ॥ २ ॥ बहु बिधि राम कह्यौ तनु राखन, परम धीर नहिं डोल्यौ। रोकि प्रेम, अवलोकि बदन-'वधु, बचन मनोहर बोल्यौ ॥ ३ ॥ तुलसी प्रभु झूठे जीवन लगि समय न धोखो लैहों। जाको नाम मरत मुनि दुरलभ तुमहिं कहाँ पुनि पैहों ? ॥ ४ ॥ रघुनाथजीने गृध्रको गोदमें उठा लिया और अपने नयनकमल- द्वारा सनेहरूप पवित्र जलसे मानो अर्घ्यदान किया ॥ १ ॥ फिर कहने लगे—'लक्ष्मण ! सुनो, वनमें पक्षिराजसे मिल लेनेपर मुझे पिताजीका मरना याद ही नहीं आया। परन्तु कुटिल विधाता मेरे इस सुखको सहन नहीं कर सका; इसीसे आज उसने यह बड़ा प्रबल पक्ष नष्ट कर दिया' ॥ २ ॥ फिर रघुनाथजीने जटायुसे शरीर रखने- के लिये बहुत प्रकारसे कहा; परन्तु वह परम धीर अपने निश्चयसे विचलित नहीं हुआ और अपने प्रेमको रोक, प्रभुका मुखचन्द्र देख- कर ये मनोहर वचन बोला—॥ ३ ॥ 'हे प्रभो ! इस समय झूठे जीवनके लिये मैं धोखा नहीं खाऊँगा। भला, जिनका नाम मरते समय मुनियोंको भी दुर्लभ है उन आपको मैं फिर कहाँ पाऊँगा' ॥४॥
२८१ अरण्यकाण्ड [ १४ ] नीके कै जानत राम हियो हौं। प्रनतपाल, सेवक-कृपालु-चित, पितु-पटतरहि दियो हौं ॥ १ ॥ त्रिजगजोनि-गत गीध, जनम भरि खाइ कुजंतु जियो हौं । महाराज सुकृती-समाज सब-ऊपर आजु कियो हौं ॥ २ ॥ श्रवन, बचन, मुख नाम, रूप चख, राम उछंग लियो हौं । तुलसी मो समान बड़भागी को कह सके बियो हौं ॥ ३ ॥ 'हे राम ! मैं आपके हृदयको अच्छी तरह जानता हूँ। आप शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले और सेवकोंपर कृपालु हैं। इसीलिये मुझे पिताकी तुलना दी है ॥ १ ॥ मैं तिर्यक् योनिके अन्तर्गत गीध जातिमें उत्पन्न हुआ और बहुत-से नीच जन्तुओंको खाकर जगत्में जीवित रहा; उसे महाराज ! आज आपने पुण्यात्माओंके समाजमें सबसे ऊपर कर दिया ! ॥ २ ॥ अहा ! मैं कानोंसे आपके वचन सुन रहा हूँ; मुखसे नाम ले रहा हूँ; नेत्रोंसे रूप निहार रहा हूँ और मुझे आपने स्वयं अपनी गोदमें ले रखा है। फिर बतलाइये, दूसरा ऐसा कौन है जो अपनेको मेरे समान बड़भागी बतला सके ?' ॥ ३ ॥ [ १५ ] मेरे जान तात ! कछू दिन जीजै । देखिय आपु सुवन-सेवासुख, मोहि पितुको सुख दीजै ॥ १ ॥ दिब्य-देह, इच्छा-जीवन जग बिधि मनाइ माँगि लीजै । हरि-हर-सुजस सुनाइ, दरस दै, लोग कृतारथ कीजै ॥ २ ॥ देखि बदन, सुनि बचन, अमिय, तन रामनयन-जल भीजै । बोल्यो बिहग बिहँसि रघुबर ! बलि, कहौं सुभाय, पतीजै ॥ ३ ॥
गीतावली २८२ मेरे मरिबे सम न चारि फल, होंहि तौ, क्यों न कहीजें ? तुलसी प्रभु दियो उतरु मौन हीं, परी मानो प्रेम सहीजें ॥ ४ ॥ [भगवान् राम कहते हैं—] 'हे तात ! मेरे विचारसे तो आप कुछ दिन और जीवित रहिये। आप अपने इस पुत्रकी सेवाका सुख देखिये और मुझे पिताका आनन्द दीजिये ॥ १ ॥ अब विधाता आपपर प्रसन्न हैं; अतः आप दिव्यदेह और संसारमें इच्छाजीवन माँग लीजिये तथा भगवान् विष्णु और शंकरका सुयश सुनाकर अपना दर्शन देते हुए लोगोंको कृतार्थ कीजिये' ॥ २ ॥ तब पक्षिराज भगवान्के मुखकी ओर देखकर उनके अमृतमय वचन सुन तथा शरीरको रामके नयनजलसे भीगा जान हँसकर बोले—'रघुनाथजी! मैं बलिहारी जाऊँ ! आप विश्वास कीजिये, मैं स्वभावसे ही कहता हूँ ॥ ३ ॥ मेरे मरनेके समान तो चारों फल भी नहीं हैं और यदि हों तो बतलाइये।' तुलसीदासजी कहते हैं, इसका उत्तर भगवान्ने मौन ही दिया, इससे मानो गृध्रराजके प्रेमपर सही पड़ गयी ॥ ४ ॥ [ १६ ] मेरो सुनियो, तात ! संदेसो । सीय-हरन जनि कहेहु पितासों, ह्वैहै अधिक अँदेसो ॥ १ ॥ रावरे पुन्यप्रताप-अनल महँ अकप दिननि रिपु दहिहैं। कुलसमेत सुरसभा दसानन समाचार सब कहिहैं ॥ २ ॥ सुनि प्रभु-बचन, राखि उर मूरति, चरन-कमल सिर नाई। चल्यो नभ सुनत राम-कल-कीरति, अरु निज भाग बड़ाई ॥ ३ ॥ पितु-ज्यों गीध-क्रिया करि रघुपति अपने धाम पठायो । ऐसो प्रभु बिसारि तुलसी सठ ! तू चाहत सुख पायो ॥ ४ ॥
२८३ अरण्यकाण्ड [रघुनाथजी बोले—] 'हे तात ! मेरा सन्देश सुनिये । पिताजीसे सीताजीके हरणकी बात मत कहना; क्योंकि इससे उनकी चिन्ता अधिक हो जायगी ॥ १ ॥ आपके पुण्य-प्रतापरूपी अग्निमें सब शत्रु थोड़े ही दिनोंमें दग्ध हो जायेंगे; उस समय से सब समाचार स्वयं रावण अपने कुटुम्बसहित देवसभामें जाकर सुना देगा' ॥ २ ॥ प्रभुके ये वचन सुन गृध्रराज उनकी मधुर मूर्ति हृदयमें धारणकर उनके चरणकमलोंमें सिर नवा रामकी पवित्र कीर्ति तथा अपने भाग्यकी बड़ाई सुनता आकाश-मार्गसे चला गया ॥ ३ ॥ रामचन्द्रजीने गृध्रका पिताके समान संस्कार कर उसे निजधाम भेज दिया । तुलसीदास कहते हैं, रे शठ ! तू ऐसे प्रभुको भूलकर भी सुख पाना चाहता है ? ॥ ४ ॥ शबरीसे भेंट राग सूहो [ १७ ] सबरी सोइ उठी, फरकत बाल बिलोचन-बाहु । सगुन सुहावने सूचत मुनि-मन-अगम उछाहू ॥ मुनि-अगम उर आनंद, लोचन सजल, तनु पुलकावली । तृन-पर्नसाल बनाइ, जल भरि कलस, फल चाहन चली ॥ मंजुल मनोरथ करति, सुमिरति बिप्र-बरबानी भली । ज्यौं कलप-बेलि सकेलि सुकृत सुफूल-फूली सुख फली ॥ १ ॥ आज शबरी सोकर उठी है तो उसका बायाँ नेत्र और बायीं भुजा फड़क रही है । ये सुहावने शकुन मुनियोंके भी मनको अगम उत्साहकी सूचना दे रहे हैं । उसके हृदयमें मुनियोंके लिये भी दुर्लभ
गीतावली २८४ आनन्द है, नेत्रोंमें जल भरा हुआ है और शरीर पुलकित हो रहा है। वह फूसकी पर्णकुटी बना, कलशमें जल भर, अपने शकुनका फल देखनेके लिये चली। वह मङ्गलमय मनोरथ करती है और बारम्बार मुनिवर मतङ्गकी शुभ वाणीका [कि तुझे श्रीरामजीका दर्शन होगा] स्मरण करती है, मानो सुन्दर फूलोंसे फूली हुई कल्पलता सम्पूर्ण सुकृतोंको एकत्र कर आज सुखरूप फलसे युक्त हुई है॥ १ ॥ प्रानप्रिय पाहुने ऐहैं राम-लषन मेरे आजु। जानत जन-जियकी मृदु चित राम गरीवनिवाजु॥ मृदु चित गरीवनिवाज आजु बिराजिहैं गृह आइकै। ब्रह्मादि संकर-गौरि पूजित पूजिहौं अब जाइकै॥ लहि नाथ हौं रघुनाथ-बानको पतितपावन पाइकै। दुहु ओर लाहु अघाइ तुलसी तीसरेहु गुन गाइकै॥ २ ॥ [वह सोचती है—] अहा! आज मेरे प्राणप्यारे पाहुने राम और लक्ष्मण आवेंगे। दीनवत्सल मृदुलचित्त भगवान् राम भक्तोंके अन्तःकरणकी बात जानते हैं। वे मृदुलचित्त गरीवनिवाज आज मेरे घर आकर विराजेंगे। अब मैं ब्रह्मा, शंकर और पार्वती आदि देवेश्वरोंसे पूजित भगवान् रामको जाकर पूजूँगी। रघुनाथजीका पतितपावन बाना पाकर अब मैं उन्हें अपने प्रभुरूपसे देखकर लोक- परलोक दोनों ओरका लाभ अघाकर लूटूँगी; और उनका गुण गाकर तीसरे तुलसीदास भी लाभान्वित होंगे॥ २ ॥ दोना रुचिर रचे पूरन कंद-मूल फल-फूल। अनुपम अमियहुतें अंबक अवलोकत अनुकूल॥ अनुकूल अंबक अंब ज्यों निज डिंब हित सब आनिकै। सुंदर सनेहसुधा सहस जनु सरस राखे सानिकै॥
२८५ अरण्यकाण्डः छन भवन, छन बाहर, बिलोकति पंथ भ्रूपर पानि कैं । दोउ भाइ आये सबरिकाके प्रेम-पन पहिचानिकैं ॥ ३ ॥ फिर शबरीने कन्द, मूल, फल और फूलोंसे भरे हुए सुन्दर दोने बनाये, जो बड़े ही अनुपम, अमृतसे भी अधिक स्वादिष्ट और नेत्रोंसे देखनेमें सुहावने थे। माता जिस प्रकार अपने बालकके लिये अच्छी-अच्छी चीजें रख छोड़ती है, उसी प्रकार उसने वे प्रिय और दर्शनीय फलादि भगवान्के लिये लाकर उन्हें मानो अमृतसे भी हजारों गुने अधिक स्नेहमें डुबोकर रक्खा। वह क्षणमें घरके भीतर चली जाती और क्षणभरमें ही बाहर आकर भृकुटिपर हाथ रखकर मार्गकी ओर ताकने लगती। इसी समय शबरीका ऐसा प्रेम और व्रत जानकर दोनों भाई उसके यहाँ आये ॥ ३ ॥ श्रवन सुनत चली, आवत देखि लषन-रघुराउ । सिथिल सनेह कहै, 'है सपना बिधि, कैधौं सति भाउ' ॥ सति भाउ कैं सपनो ? निहारि कुमार कोसलरायके । गहे चरन, जे अघहरन नत-जन, बचन-मानस-कायके ॥ लघु-भाग-भाजन उदधि उमग्यो लाभ-सुख चित चाय कैं। सो जननि ज्यौं आदरी सानुज, राम भूखे भायकैं ॥ ४ ॥ प्रभुका आगमन कानोंसे सुनकर वह आगे बढ़ी और फिर राम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको देख स्नेहसे शिथिल होकर कहने लगी 'अरे विधाता ! यह कोई स्वप्न है या सच्ची घटना है ?' कोशल- राज महाराज दशरथके पुत्रोंको देखकर उसने 'यह स्वप्न है या सच्ची घटना ?' ऐसे कहते हुए उनके चरण पकड़े, जो विनीत भक्तोंके मन, वचन और शरीरके पापोंको दूर करनेवाले हैं। शबरीके हृदयमें
गीतावली २८६ यह सोचकर कि 'मैं तो छोटे ही सौभाग्यकी पात्री हूँ' इस परम लाभ और सुखको पाकर आनन्दका समुद्र उमड़ आया। भगवान् तो केवल भावके ही भूखे हैं। अतः उन्होंने तो भाई लक्ष्मणके सहित उसका माताके समान आदर किया ॥ ४ ॥ प्रेम-पट पाँवड़े देत, सुअरघ बिलोचन-बारि । आश्रम लै दिए आसन पंकज-पाँय पखारि ॥ पद-पंकजात पखारि पूजे, पंथ-श्रम-बिरहित भये । फल-फूल अंकुर-मूल घरे सुधारि भरि दोना नये ॥ प्रभु खात पुलकित गात, स्वाद सराहि आदर जनु जये । फल चारिहू फल चारि दहि, परचारि-फल सबरी दये ॥ ५ ॥ शबरी प्रेमरूप वस्त्रके पाँवड़े बिछाती और नेत्रजलसे अर्घ्य देती भगवान्को अपने आश्रमपर ले आयी और उनके चरणकमल धोकर उन्हें आसन दिये। भगवान्के चरणकमलोंको धोकर उसने उनका पूजन किया। इससे उनका मार्गका श्रम जाता रहा। फिर उसने फल, फूल, अंकुर और मूल आदि नये-नये दोनोंमें सजाकर भगवान्के आगे रखे और प्रभु उनका स्वाद सराह-सराहकर पुल- कितशरीर हो खाने लगे, मानो वे आदर उत्पन्न करते थे। भगवान् रामने शबरीके इन चार फलोंसे [अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष-इन] चारों फलोंको जलाकर उसे [प्रेमलक्षणा भक्तिरूप] सेवाका फल दिया ॥ ५ ॥ सुमन बरषि हरषे सुर, मुनि मुदित सराहि सिहात । 'केहि रुचि केहि छुधा सानुज मांगि मांगि प्रभु खात !! प्रभु खात माँगत देति सबरी, राम भोगी जागके ।' पुलकत प्रसंसत सिद्ध-सिव-सनकादि भाजन भागके ॥